अर-राद · 35/43
अनुवाद उच्चारण — अर-राद
۞ مَّثَلُ الْجَنَّةِ الَّتِي وُعِدَ الْمُتَّقُونَ ۖ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ أُكُلُهَا دَائِمٌ وَظِلُّهَا ۚ تِلْكَ عُقْبَى الَّذِينَ اتَّقَوا ۖ وَّعُقْبَى الْكَافِرِينَ النَّارُ ۝٣٥
Masalul Jannatil latee wu`idal muttaqoona tajree min tahtihal anhaaru ukuluhaa daaa`imunw wa zilluhaa; tilka uqbal lazeenat taqaw wa `uqbal kafireenan Naar
📖 हिंदी अर्थ
जिस बाग़ (बेहश्त) का परहेज़गारों से वायदा किया गया है उसकी सिफत ये है कि उसके नीचे नहरें जारी होगी उसके मेवे सदाबहार और ऐसे ही उसकी छॉव भी ये अन्जाम है उन लोगों को जो (दुनिया में) परहेज़गार थे और काफिरों का अन्जाम (जहन्नुम की) आग है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَثَلُ: यहाँ इसका अर्थ है "विशेषता" या "स्थिति"।
  • أُكُلُهَا: इसके फल और खाद्य पदार्थ।
  • دَائِمٌ: स्थायी, जो कभी समाप्त न हो।
  • ظِلُّهَا: इसकी छाया।
  • عُقْبَى: अंतिम परिणाम या बदला।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस जन्नत का वर्णन कर रही है जिसका वादा अल्लाह ने अपने डर रखने वाले, आज्ञाकारी और पापों से बचने वाले बंदों से किया है। उस जन्नत की विशेषता यह है कि उसके महलों और पेड़ों के नीचे नदियाँ बहती हैं। उसके फल कभी समाप्त नहीं होते और न ही मौसमी होते हैं, बल्कि हमेशा उपलब्ध रहते हैं। उसकी छाया भी स्थायी है, जो कभी घटती नहीं और न ही सूरज की तपिश से समाप्त होती है। यह उन लोगों का अंतिम ठिकाना है जिन्होंने अल्लाह से डरकर उसके आदेशों का पालन किया और उसकी मनाही से बचे। इसके विपरीत, जिन्होंने अल्लाह को नकारा और उसके रसूलों को झुठलाया, उनका अंतिम परिणाम आग (नरक) है, जिसमें वे हमेशा रहेंगे। यह आयत इस बात पर भी ज़ोर देती है कि जन्नत का सुख कभी खत्म नहीं होगा, क्योंकि अल्लाह ने इसे स्थायी बनाया है।

फ़ायदे (सबक):

  1. यह आयत मोमिनों को उस स्थायी सुख की याद दिलाती है जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार किया है, ताकि वे दुनिया की अस्थायी चीज़ों पर मोहित न हों और धैर्य व ईमान पर कायम रहें।
  2. जन्नत की नेमतें सिर्फ शारीरिक नहीं हैं, बल्कि उसमें हर तरह की खुशी और आराम शामिल है, जो कभी समाप्त नहीं होता—यह अल्लाह की रहमत का सबूत है।
  3. अल्लाह का डर (तक़वा) ही वह रास्ता है जो इंसान को जन्नत तक पहुँचाता है, और यह डर इंसान को अच्छे काम करने और बुराई से बचने की ताकत देता है।
  4. यह आयत चेतावनी देती है कि कुफ्र और नाफ़रमानी का अंजाम नरक है, इसलिए इंसान को अपने जीवन में अल्लाह की राह अपनानी चाहिए।
  5. जन्नत की नेमतें स्थायी हैं, जबकि दुनिया की नेमतें अस्थायी हैं—यह बात इंसान को दुनिया से लगाव कम करने और आख़िरत की तैयारी करने की प्रेरणा देती है।


📜 आयत 33-37 — अर-राद

33أَفَمَنْ هُوَ قَائِمٌ عَلَىٰ كُلِّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ ۗ وَجَعَلُوا لِلَّهِ شُرَكَاءَ قُلْ سَمُّوهُمْ ۚ أَمْ تُنَبِّئُونَهُ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِي الْأَرْضِ أَم بِظَاهِرٍ مِّنَ الْقَوْلِ ۗ بَلْ زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا مَكْرُهُمْ وَصُدُّوا عَنِ السَّبِيلِ ۗ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِنْ هَادٍ
क्या जो (ख़ुदा) हर एक शख़्श के आमाल की ख़बर रखता है (उनको युं ही छोड़ देगा हरगिज़ नहीं) और उन लोगों ने ख़ुदा के (दूसरे दूसरे) शरीक ठहराए (ऐ रसूल तुम उनसे कह दो कि तुम आख़िर उनके नाम तो बताओं या तुम ख़ुदा को ऐसे शरीक़ो की ख़बर देते हो जिनको वह जानता तक नहीं कि वह ज़मीन में (किधर बसते) हैं या (निरी ऊपर से बातें बनाते हैं बल्कि (असल ये है कि) काफिरों को उनकी मक्कारियाँ भली दिखाई गई है और वह (गोया) राहे रास्त से रोक दिए गए हैं और जिस शख़्श को ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसका कोई हिदायत करने वाला नहीं
34لَّهُمْ عَذَابٌ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَلَعَذَابُ الْآخِرَةِ أَشَقُّ ۖ وَمَا لَهُم مِّنَ اللَّهِ مِن وَاقٍ
इन लोगों के वास्ते दुनियावी ज़िन्दगी में (भी) अज़ाब है और आख़िरत का अज़ाब तो यक़ीनी और बहुत सख्त खुलने वाला है (और) (फिर) ख़ुदा (के ग़ज़ब) से उनको कोई बचाने वाला (भी) नहीं
35۞ مَّثَلُ الْجَنَّةِ الَّتِي وُعِدَ الْمُتَّقُونَ ۖ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ أُكُلُهَا دَائِمٌ وَظِلُّهَا ۚ تِلْكَ عُقْبَى الَّذِينَ اتَّقَوا ۖ وَّعُقْبَى الْكَافِرِينَ النَّارُ
जिस बाग़ (बेहश्त) का परहेज़गारों से वायदा किया गया है उसकी सिफत ये है कि उसके नीचे नहरें जारी होगी उसके मेवे सदाबहार और ऐसे ही उसकी छॉव भी ये अन्जाम है उन लोगों को जो (दुनिया में) परहेज़गार थे और काफिरों का अन्जाम (जहन्नुम की) आग है
36وَالَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَفْرَحُونَ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْكَ ۖ وَمِنَ الْأَحْزَابِ مَن يُنكِرُ بَعْضَهُ ۚ قُلْ إِنَّمَا أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ وَلَا أُشْرِكَ بِهِ ۚ إِلَيْهِ أَدْعُو وَإِلَيْهِ مَآبِ
और (ए रसूल) जिन लोगों को हमने किताब दी है वह तो जो (एहकाम) तुम्हारे पास नाज़िल किए गए हैं सब ही से खुश होते हैं और बाज़ फिरके उसकी बातों से इन्कार करते हैं तुम (उनसे) कह दो कि (तुम मानो या न मानो) मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मै ख़ुदा ही की इबादत करु और किसी को उसका शरीक न बनाऊ मै (सब को) उसी की तरफ बुलाता हूँ और हर शख़्श को हिर फिर कर उसकी तरफ जाना है
37وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَاهُ حُكْمًا عَرَبِيًّا ۚ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُم بَعْدَمَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ مَا لَكَ مِنَ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا وَاقٍ
और यूँ हमने उस क़ुरान को अरबी (ज़बान) का फरमान नाज़िल फरमाया और (ऐ रसूल) अगर कहीं तुमने इसके बाद को तुम्हारे पास इल्म (क़ुरान) आ चुका उन की नफसियानी ख्वाहिशों की पैरवी कर ली तो (याद रखो कि) फिर ख़ुदा की तरफ से न कोई तुम्हारा सरपरस्त होगा न कोई बचाने वाला
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अनुवाद — अर-राद 35

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Tuesday, August 18, 2026

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