अर-राद · 34/43
अनुवाद उच्चारण — अर-राद
لَّهُمْ عَذَابٌ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَلَعَذَابُ الْآخِرَةِ أَشَقُّ ۖ وَمَا لَهُم مِّنَ اللَّهِ مِن وَاقٍ ۝٣٤
Lahum `azaabun fil hayaatid dunyaa wa la`azaabul Aakhirati ashaaq, wa maa lahum minal laahi min-waaq
📖 हिंदी अर्थ
इन लोगों के वास्ते दुनियावी ज़िन्दगी में (भी) अज़ाब है और आख़िरत का अज़ाब तो यक़ीनी और बहुत सख्त खुलने वाला है (और) (फिर) ख़ुदा (के ग़ज़ब) से उनको कोई बचाने वाला (भी) नहीं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَهُمْ عَذَابٌ: उनके लिए यातना है।
  • فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا: सांसारिक जीवन में।
  • وَلَعَذَابُ الْآخِرَةِ أَشَقُّ: और आख़िरत की यातना अधिक कठिन और भारी है।
  • مِنْ وَاقٍ: कोई बचाने वाला, रक्षा करने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

इन काफ़िरों के लिए जो अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं, दुनिया की ज़िंदगी में भी एक कष्टदायक यातना है — जैसे क़त्ल, क़ैद (बंदी बनाना), और अपमान जो उन्हें मोमिनों के हाथों पहुँचता है। यह उनकी सांसारिक सज़ा है। लेकिन आख़िरत की यातना उससे कहीं अधिक कठोर, भारी और स्थायी है; क्योंकि उसमें दर्द की शिद्दत भी अधिक होगी और वह कभी समाप्त न होने वाली होगी। और उस दिन उनके लिए अल्लाह की ओर से कोई बचाने वाला, रक्षा करने वाला या सिफ़ारिश करने वाला नहीं होगा जो उन्हें उस यातना से छुड़ा सके।


फ़ायदे (लाभ और सबक़):

  1. दुनिया की सज़ा आख़िरत की सज़ा से हल्की है — यह आयत हमें सिखाती है कि अगर किसी गुनाहगार को दुनिया में सज़ा मिल जाए, तो यह उसके लिए रहमत है, क्योंकि इससे आख़िरत की सज़ा कम हो सकती है। लेकिन जो दुनिया में भी नहीं सुधरते, उनके लिए आख़िरत की सज़ा अधिक भयानक है।
  2. अल्लाह से कोई बचा नहीं सकता — जब अल्लाह किसी को सज़ा देना चाहे, तो न कोई ताक़त, न कोई धन-दौलत, न कोई रिश्तेदार और न कोई सिफ़ारिशी उसे बचा सकता है। इसलिए हमें सिर्फ़ अल्लाह की राह पर चलना चाहिए और उसकी नाराज़गी से बचना चाहिए।
  3. कुफ़्र और सत्य के मार्ग में रुकावट डालने का अंजाम — जो लोग दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं या उसमें संदेह पैदा करते हैं, उनके लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में बुरा अंजाम है। यह हमें सिखाता है कि हमें ख़ुद भी सीधे रास्ते पर चलना चाहिए और दूसरों को भी इसकी दावत देनी चाहिए।
  4. अल्लाह की रहमत और अदल का एहसास — यह आयत हमें अल्लाह के न्याय की याद दिलाती है कि वह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि हर किसी को उसके कर्मों का पूरा बदला देगा। यह हमें अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करता है और बुराई से दूर रखता है।


📜 आयत 32-36 — अर-राद

32وَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِّن قَبْلِكَ فَأَمْلَيْتُ لِلَّذِينَ كَفَرُوا ثُمَّ أَخَذْتُهُمْ ۖ فَكَيْفَ كَانَ عِقَابِ
और (ऐ रसूल) तुमसे पहले भी बहुतेरे पैग़म्बरों की हॅसी उड़ाई जा चुकी है तो मैने (चन्द रोज़) काफिरों को मोहलत दी फिर (आख़िर कार) हमने उन्हें ले डाला फिर (तू क्या पूछता है कि) हमारा अज़ाब कैसा था
33أَفَمَنْ هُوَ قَائِمٌ عَلَىٰ كُلِّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ ۗ وَجَعَلُوا لِلَّهِ شُرَكَاءَ قُلْ سَمُّوهُمْ ۚ أَمْ تُنَبِّئُونَهُ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِي الْأَرْضِ أَم بِظَاهِرٍ مِّنَ الْقَوْلِ ۗ بَلْ زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا مَكْرُهُمْ وَصُدُّوا عَنِ السَّبِيلِ ۗ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِنْ هَادٍ
क्या जो (ख़ुदा) हर एक शख़्श के आमाल की ख़बर रखता है (उनको युं ही छोड़ देगा हरगिज़ नहीं) और उन लोगों ने ख़ुदा के (दूसरे दूसरे) शरीक ठहराए (ऐ रसूल तुम उनसे कह दो कि तुम आख़िर उनके नाम तो बताओं या तुम ख़ुदा को ऐसे शरीक़ो की ख़बर देते हो जिनको वह जानता तक नहीं कि वह ज़मीन में (किधर बसते) हैं या (निरी ऊपर से बातें बनाते हैं बल्कि (असल ये है कि) काफिरों को उनकी मक्कारियाँ भली दिखाई गई है और वह (गोया) राहे रास्त से रोक दिए गए हैं और जिस शख़्श को ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसका कोई हिदायत करने वाला नहीं
34لَّهُمْ عَذَابٌ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَلَعَذَابُ الْآخِرَةِ أَشَقُّ ۖ وَمَا لَهُم مِّنَ اللَّهِ مِن وَاقٍ
इन लोगों के वास्ते दुनियावी ज़िन्दगी में (भी) अज़ाब है और आख़िरत का अज़ाब तो यक़ीनी और बहुत सख्त खुलने वाला है (और) (फिर) ख़ुदा (के ग़ज़ब) से उनको कोई बचाने वाला (भी) नहीं
35۞ مَّثَلُ الْجَنَّةِ الَّتِي وُعِدَ الْمُتَّقُونَ ۖ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ أُكُلُهَا دَائِمٌ وَظِلُّهَا ۚ تِلْكَ عُقْبَى الَّذِينَ اتَّقَوا ۖ وَّعُقْبَى الْكَافِرِينَ النَّارُ
जिस बाग़ (बेहश्त) का परहेज़गारों से वायदा किया गया है उसकी सिफत ये है कि उसके नीचे नहरें जारी होगी उसके मेवे सदाबहार और ऐसे ही उसकी छॉव भी ये अन्जाम है उन लोगों को जो (दुनिया में) परहेज़गार थे और काफिरों का अन्जाम (जहन्नुम की) आग है
36وَالَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَفْرَحُونَ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْكَ ۖ وَمِنَ الْأَحْزَابِ مَن يُنكِرُ بَعْضَهُ ۚ قُلْ إِنَّمَا أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ وَلَا أُشْرِكَ بِهِ ۚ إِلَيْهِ أَدْعُو وَإِلَيْهِ مَآبِ
और (ए रसूल) जिन लोगों को हमने किताब दी है वह तो जो (एहकाम) तुम्हारे पास नाज़िल किए गए हैं सब ही से खुश होते हैं और बाज़ फिरके उसकी बातों से इन्कार करते हैं तुम (उनसे) कह दो कि (तुम मानो या न मानो) मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मै ख़ुदा ही की इबादत करु और किसी को उसका शरीक न बनाऊ मै (सब को) उसी की तरफ बुलाता हूँ और हर शख़्श को हिर फिर कर उसकी तरफ जाना है
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अनुवाद — अर-राद 34

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Tuesday, August 18, 2026

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