अर-राद · 36/43
अनुवाद उच्चारण — अर-राद
وَالَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَفْرَحُونَ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْكَ ۖ وَمِنَ الْأَحْزَابِ مَن يُنكِرُ بَعْضَهُ ۚ قُلْ إِنَّمَا أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ وَلَا أُشْرِكَ بِهِ ۚ إِلَيْهِ أَدْعُو وَإِلَيْهِ مَآبِ ۝٣٦
Wallazeena aatainaa humul Kitaaba yafrahoona bimaa unzila ilaika wa minal Ahzaabi mai yunkiru ba`dah; qul innamaa umirtu an a`budal laaha wa laaa ushrika bih; ilaihi ad`oo wa ilaihi maab
📖 हिंदी अर्थ
और (ए रसूल) जिन लोगों को हमने किताब दी है वह तो जो (एहकाम) तुम्हारे पास नाज़िल किए गए हैं सब ही से खुश होते हैं और बाज़ फिरके उसकी बातों से इन्कार करते हैं तुम (उनसे) कह दो कि (तुम मानो या न मानो) मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मै ख़ुदा ही की इबादत करु और किसी को उसका शरीक न बनाऊ मै (सब को) उसी की तरफ बुलाता हूँ और हर शख़्श को हिर फिर कर उसकी तरफ जाना है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَفْرَحُونَ: वे खुश होते हैं, प्रसन्न होते हैं।
  • الْأَحْزَابِ: वे गिरोह जो आपके विरुद्ध एकत्र हुए, विशेषकर यहूदी और ईसाइयों के वे समूह जिन्होंने आपका विरोध किया।
  • يُنكِرُ بَعْضَهُ: उस (क़ुरआन) के कुछ भाग का इनकार करता है।
  • مَآبِ: मेरी वापसी का स्थान, मेरा अंतिम पड़ाव।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों के दो अलग-अलग समूहों का वर्णन करती है जिन्हें पहले की किताबें (तौरात और इंजील) दी गई थीं। पहला समूह वह है जो ईमान लाया और आप (ﷺ) पर उतारे गए क़ुरआन को देखकर खुशी महसूस करता है, क्योंकि यह उनकी अपनी किताबों में मौजूद सच्चाई की पुष्टि करता है। इनमें अब्दुल्लाह बिन सलाम और नजाशी जैसे लोग शामिल थे, जिन्होंने आपके नबी होने को पहचाना और उस पर ईमान लाए। दूसरा समूह वह है जो आपके विरुद्ध एकजुट हुआ — जैसे नजरान के ईसाई नेता और कुछ यहूदी — और वे क़ुरआन के कुछ हिस्सों का इनकार करते हैं, विशेषकर उन आयतों का जो उनकी मनमानी और उनके द्वारा की गई तहरीफ़ (विकृति) के विपरीत हैं।

अल्लाह आपको (ﷺ) निर्देश देता है कि आप उनसे कहें: "मुझे केवल यही आदेश दिया गया है कि मैं अकेले अल्लाह की इबादत करूँ और उसके साथ किसी को साझी न बनाऊँ। मैं लोगों को उसी की ओर बुलाता हूँ, और उसी की ओर मेरी वापसी है।" यह उन सभी विवादों का अंतिम और स्पष्ट उत्तर है — कि दीन का सार केवल अल्लाह की एकता और उसकी इबादत है, न कि सांप्रदायिक झगड़े या धार्मिक पूर्वाग्रह।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. सच्चाई को पहचानने वाले हर व्यक्ति का दिल क़ुरआन पर खुशी महसूस करता है, चाहे वह किसी भी पिछली किताब या समुदाय से क्यों न आया हो। यह क़ुरआन की सच्चाई और उसकी सार्वभौमिकता का प्रमाण है।
  2. विरोध और इनकार केवल हठधर्मिता और मनमानी से पैदा होता है, न कि सच्चाई की खोज से। जो लोग सच्चाई को दबाना चाहते हैं, वे उसके कुछ हिस्सों को नकारते हैं।
  3. इस्लाम का मूल संदेश अत्यंत सरल और स्पष्ट है: केवल अल्लाह की इबादत, उसके साथ किसी को साझी न बनाना, उसी की ओर बुलाना और उसी की ओर लौटना। यही वह सच्चाई है जिस पर सभी नबी एक थे।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि विरोधियों के साथ भी स्पष्टता और दृढ़ता से पेश आना चाहिए, और अपने ईमान और आदर्शों पर अडिग रहना चाहिए, चाहे कितने ही विरोधी क्यों न हों।
  5. अल्लाह की ओर बुलाना और उसकी इबादत को अपना जीवन-लक्ष्य बनाना ही सच्ची सफलता है, और यही वह रास्ता है जो हमें उसकी ओर लौटाता है।


📜 आयत 34-38 — अर-राद

34لَّهُمْ عَذَابٌ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَلَعَذَابُ الْآخِرَةِ أَشَقُّ ۖ وَمَا لَهُم مِّنَ اللَّهِ مِن وَاقٍ
इन लोगों के वास्ते दुनियावी ज़िन्दगी में (भी) अज़ाब है और आख़िरत का अज़ाब तो यक़ीनी और बहुत सख्त खुलने वाला है (और) (फिर) ख़ुदा (के ग़ज़ब) से उनको कोई बचाने वाला (भी) नहीं
35۞ مَّثَلُ الْجَنَّةِ الَّتِي وُعِدَ الْمُتَّقُونَ ۖ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ أُكُلُهَا دَائِمٌ وَظِلُّهَا ۚ تِلْكَ عُقْبَى الَّذِينَ اتَّقَوا ۖ وَّعُقْبَى الْكَافِرِينَ النَّارُ
जिस बाग़ (बेहश्त) का परहेज़गारों से वायदा किया गया है उसकी सिफत ये है कि उसके नीचे नहरें जारी होगी उसके मेवे सदाबहार और ऐसे ही उसकी छॉव भी ये अन्जाम है उन लोगों को जो (दुनिया में) परहेज़गार थे और काफिरों का अन्जाम (जहन्नुम की) आग है
36وَالَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَفْرَحُونَ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْكَ ۖ وَمِنَ الْأَحْزَابِ مَن يُنكِرُ بَعْضَهُ ۚ قُلْ إِنَّمَا أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ وَلَا أُشْرِكَ بِهِ ۚ إِلَيْهِ أَدْعُو وَإِلَيْهِ مَآبِ
और (ए रसूल) जिन लोगों को हमने किताब दी है वह तो जो (एहकाम) तुम्हारे पास नाज़िल किए गए हैं सब ही से खुश होते हैं और बाज़ फिरके उसकी बातों से इन्कार करते हैं तुम (उनसे) कह दो कि (तुम मानो या न मानो) मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मै ख़ुदा ही की इबादत करु और किसी को उसका शरीक न बनाऊ मै (सब को) उसी की तरफ बुलाता हूँ और हर शख़्श को हिर फिर कर उसकी तरफ जाना है
37وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَاهُ حُكْمًا عَرَبِيًّا ۚ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُم بَعْدَمَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ مَا لَكَ مِنَ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا وَاقٍ
और यूँ हमने उस क़ुरान को अरबी (ज़बान) का फरमान नाज़िल फरमाया और (ऐ रसूल) अगर कहीं तुमने इसके बाद को तुम्हारे पास इल्म (क़ुरान) आ चुका उन की नफसियानी ख्वाहिशों की पैरवी कर ली तो (याद रखो कि) फिर ख़ुदा की तरफ से न कोई तुम्हारा सरपरस्त होगा न कोई बचाने वाला
38وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلًا مِّن قَبْلِكَ وَجَعَلْنَا لَهُمْ أَزْوَاجًا وَذُرِّيَّةً ۚ وَمَا كَانَ لِرَسُولٍ أَن يَأْتِيَ بِآيَةٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۗ لِكُلِّ أَجَلٍ كِتَابٌ
और हमने तुमसे पहले और (भी) बहुतेरे पैग़म्बर भेजे और हमने उनको बीवियाँ भी दी और औलाद (भी अता की) और किसी पैग़म्बर की ये मजाल न थी कि कोई मौजिज़ा ख़ुदा की इजाज़त के बगैर ला दिखाए हर एक वक्त (मौऊद) के लिए (हमारे यहाँ) एक (क़िस्म की) तहरीर (होती) है
अर-रादकुरान सूची
43आयत
मदनीRevelation
36आयत

अनुवाद — अर-राद 36

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Tuesday, August 18, 2026

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