अल-कहफ · 30/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ إِنَّا لَا نُضِيعُ أَجْرَ مَنْ أَحْسَنَ عَمَلًا ۝٣٠
Innal lazeena aamanoo wa `amilus saalihaati innaa laa nudee`u ajra man ahsana `amalaa
📖 हिंदी अर्थ
इसमें शक़ नहीं कि जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया और अच्छे अच्छे काम करते रहे तो हम हरगिज़ अच्छे काम वालो के अज्र को अकारत नहीं करते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آمَنُوا: ईमान लाए, विश्वास किया।
  • عَمِلُوا الصَّالِحَاتِ: अच्छे और नेक कर्म किए।
  • لَا نُضِيعُ: हम बर्बाद नहीं करते, अकारण नहीं जाने देते।
  • أَجْرَ: बदला, प्रतिफल, पुरस्कार।
  • أَحْسَنَ عَمَلًا: जिसने अपना काम बहुत अच्छे तरीके से किया, ख़ालिस और सही ढंग से किया।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने उन बंदों को खुशखबरी सुना रहा है जो ईमान लाते हैं और नेक कर्म करते हैं। यहाँ ईमान से मुराद सिर्फ़ ज़ुबान से कहना नहीं, बल्कि दिल से पक्का यक़ीन और अल्लाह और उसके रसूल ﷺ पर पूरा भरोसा है। और "नेक कर्म" से मुराद वे सभी अच्छे काम हैं जो अल्लाह की रज़ा के लिए किए जाएँ — चाहे वो नमाज़, रोज़ा, ज़कात, सच्चाई, ईमानदारी, माता-पिता की सेवा, या लोगों की मदद हों।

अल्लाह फ़रमाता है: "हम उन लोगों का अज्र (बदला) हरगिज़ बर्बाद नहीं करते जिन्होंने अच्छा काम किया।" यानी जो बंदा अपने कर्मों को ख़ालिस अल्लाह के लिए करता है, उसे सही तरीके से अंजाम देता है, और उसमें रिया (दिखावा) और नफ़ाक़ नहीं मिलाता — तो अल्लाह उसकी मेहनत को कभी ज़ाया नहीं करता। बल्कि वो उसे पूरा-पूरा बदला देता है, कम नहीं करता, और उस पर और भी फज़ल (कृपा) करता है।

यह आयत मोमिनीन के लिए एक बहुत बड़ी तसल्ली और उम्मीद की बात है। इंसान कभी-कभी सोचता है कि मेरे अच्छे कामों का कोई फल नहीं मिलेगा, या लोगों ने मेरी क़द्र नहीं की — तो अल्लाह तआला फ़रमाता है कि तेरा अज्र मेरे पास सुरक्षित है। मैं किसी का हक़ नहीं मारता, बल्कि अपने रहम से और बढ़ाकर देता हूँ।

इस आयत में एक प्यारा पैग़ाम है कि अल्लाह की राह में किया गया छोटा-से-छोटा नेक काम भी अल्लाह के यहाँ महफ़ूज़ है। जैसे एक किसान बीज बोता है और फसल काटता है, वैसे ही मोमिन इस दुनिया में नेकियों के बीज बोता है और आख़िरत में उसकी फसल काटेगा — और अल्लाह उस फसल को कभी ख़राब नहीं होने देता।

यह आयत हमें सिखाती है कि हम अपने अमल को अच्छा करें — यानी सिर्फ़ मात्रा (संख्या) पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता (ख़ुलूस और सही तरीके) पर ध्यान दें। क्योंकि अल्लाह को वो अमल पसंद है जो ख़ालिस और सही हो। और जब हमारा अमल अच्छा होगा, तो अल्लाह का वादा है कि वो उसे ज़ाया नहीं करेगा — बल्कि उसका अज्र हमें पूरा-पूरा देगा, और अपनी तरफ़ से और भी नवाज़ेगा।

तो इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि हम ईमान को मज़बूत करें, अमल को अच्छा बनाएँ, और अल्लाह पर भरोसा रखें — क्योंकि वो कभी किसी का हक़ नहीं मारता। यही सच्ची कामयाबी का रास्ता है।



📜 आयत 28-32 — अल-कहफ

28وَاصْبِرْ نَفْسَكَ مَعَ الَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُم بِالْغَدَاةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيدُونَ وَجْهَهُ ۖ وَلَا تَعْدُ عَيْنَاكَ عَنْهُمْ تُرِيدُ زِينَةَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَلَا تُطِعْ مَنْ أَغْفَلْنَا قَلْبَهُ عَن ذِكْرِنَا وَاتَّبَعَ هَوَاهُ وَكَانَ أَمْرُهُ فُرُطًا
और (ऐ रसूल) जो लोग अपने परवरदिगार को सुबह सवेरे और झटपट वक्त शाम को याद करते हैं और उसकी खुशनूदी के ख्वाहाँ हैं उनके उनके साथ तुम खुद (भी) अपने नफस पर जब्र करो और उनकी तरफ से अपनी नज़र (तवज्जो) न फेरो कि तुम दुनिया में ज़िन्दगी की आराइश चाहने लगो और जिसके दिल को हमने (गोया खुद) अपने ज़िक्र से ग़ाफिल कर दिया है और वह अपनी ख्वाहिशे नफसानी के पीछे पड़ा है और उसका काम सरासर ज्यादती है उसका कहना हरगिज़ न मानना
29وَقُلِ الْحَقُّ مِن رَّبِّكُمْ ۖ فَمَن شَاءَ فَلْيُؤْمِن وَمَن شَاءَ فَلْيَكْفُرْ ۚ إِنَّا أَعْتَدْنَا لِلظَّالِمِينَ نَارًا أَحَاطَ بِهِمْ سُرَادِقُهَا ۚ وَإِن يَسْتَغِيثُوا يُغَاثُوا بِمَاءٍ كَالْمُهْلِ يَشْوِي الْوُجُوهَ ۚ بِئْسَ الشَّرَابُ وَسَاءَتْ مُرْتَفَقًا
और (ऐ रसूल) तुम कह दों कि सच्ची बात (कलमए तौहीद) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से (नाज़िल हो चुकी है) बस जो चाहे माने और जो चाहे न माने (मगर) हमने ज़ालिमों के लिए वह आग (दहका के) तैयार कर रखी है जिसकी क़नातें उन्हें घेर लेगी और अगर वह लोग दोहाई करेगें तो उनकी फरियाद रसी खौलते हुए पानी से की जाएगी जो मसलन पिघले हुए ताबें की तरह होगा (और) वह मुँह को भून डालेगा क्या बुरा पानी है और (जहन्नुम भी) क्या बुरी जगह है
30إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ إِنَّا لَا نُضِيعُ أَجْرَ مَنْ أَحْسَنَ عَمَلًا
इसमें शक़ नहीं कि जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया और अच्छे अच्छे काम करते रहे तो हम हरगिज़ अच्छे काम वालो के अज्र को अकारत नहीं करते
31أُولَٰئِكَ لَهُمْ جَنَّاتُ عَدْنٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهِمُ الْأَنْهَارُ يُحَلَّوْنَ فِيهَا مِنْ أَسَاوِرَ مِن ذَهَبٍ وَيَلْبَسُونَ ثِيَابًا خُضْرًا مِّن سُندُسٍ وَإِسْتَبْرَقٍ مُّتَّكِئِينَ فِيهَا عَلَى الْأَرَائِكِ ۚ نِعْمَ الثَّوَابُ وَحَسُنَتْ مُرْتَفَقًا
ये वही लोग हैं जिनके (रहने सहने के) लिए सदाबहार (बेहश्त के) बाग़ात हैं उनके (मकानात के) नीचे नहरें जारी होगीं वह उन बाग़ात में दमकते हुए कुन्दन के कंगन से सँवारे जाँएगें और उन्हें बारीक रेशम (क्रेब) और दबीज़ रेश्म (वाफते)के धानी जोड़े पहनाए जाएँगें और तख्तों पर तकिए लगाए (बैठे) होगें क्या ही अच्छा बदला है और (बेहश्त भी आसाइश की) कैसी अच्छी जगह है
32۞ وَاضْرِبْ لَهُم مَّثَلًا رَّجُلَيْنِ جَعَلْنَا لِأَحَدِهِمَا جَنَّتَيْنِ مِنْ أَعْنَابٍ وَحَفَفْنَاهُمَا بِنَخْلٍ وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمَا زَرْعًا
और (ऐ रसूल) इन लोगों से उन दो शख़्शों की मिसाल बयान करो कि उनमें से एक को हमने अंगूर के दो बाग़ दे रखे है और हमने चारो ओर खजूर के पेड़ लगा दिये है और उन दोनों बाग़ के दरमियान खेती भी लगाई है
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अनुवाद — अल-कहफ 30

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Tuesday, August 18, 2026

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