Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- जुनाह: पाप, गुनाह
- तब्तग़ू: तलाश करना, खोजना
- फ़ज़्ल: कृपा, रिज़्क़ (आजीविका), व्यापार में लाभ
- अफ़ज़्तुम: लौटना, वापस आना (यहाँ अरफ़ात से वापसी का अर्थ है)
- अरफ़ात: हज के दिन (9 ज़िलहिज्जा) हाजियों के ठहरने का स्थान
- मश्अरिल हराम: मुज़दलिफ़ा, जो मक्का के पास एक पवित्र स्थान है
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में अपने बंदों पर अपनी असीम कृपा और दया का पर्दा उठाते हुए फ़रमाते हैं कि हज के दौरान व्यापार करके रिज़्क़ (आजीविका) कमाने में कोई गुनाह या पाप नहीं है। यह एक बहुत बड़ी राहत है, क्योंकि कुछ लोग समझते थे कि हज के दिनों में व्यापार करना और कमाई करना गुनाह है। अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि हज के दौरान अपने रब से रिज़्क़ तलाश करना (व्यापार, नौकरी या किसी भी हलाल काम से) पूरी तरह जायज़ है। यह इस्लाम की आसानी और संतुलन की शिक्षा है — दीन और दुनिया दोनों को साथ लेकर चलना।
इसके बाद अल्लाह ने हाजियों को निर्देश दिया कि जब तुम अरफ़ात (जहाँ 9 ज़िलहिज्जा को ठहरना अनिवार्य है) से लौटो और मुज़दलिफ़ा (जिसे मश्अरिल हराम कहा गया है) पहुँचो, तो वहाँ अल्लाह का ज़िक्र करो — तस्बीह (सुब्हानअल्लाह), तहलील (ला इलाहा इल्लल्लाह), तकबीर (अल्लाहु अकबर) और दुआ के साथ। यह ज़िक्र सिर्फ़ ज़बान से नहीं, बल्कि दिल की गहराई से होना चाहिए, क्योंकि अल्लाह ने तुम्हें हिदायत दी है — सही रास्ता दिखाया है, हज के मनासिक (अनुष्ठान) सिखाए हैं, और अपनी इबादत का तरीका बताया है।
अल्लाह तआला बंदों को याद दिलाते हैं कि तुम इस हिदायत से पहले गुमराही में थे — अल्लाह की इबादत करना, उसका ज़िक्र करना और उसके घर का हज करना नहीं जानते थे। तुम अंधेरे में भटक रहे थे, लेकिन अल्लाह की रहमत ने तुम्हें रोशनी दिखाई। इसलिए जिस अल्लाह ने तुम्हें यह बड़ी नेमत दी है, उसका शुक्र अदा करो और उसकी बड़ाई बयान करो।
यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में न तो दुनिया की कमाई को छोड़ना ज़रूरी है और न ही आख़िरत को भूलना — बल्कि दोनों में संतुलन रखना सिखाया गया है। हज के पवित्र दिनों में भी अल्लाह ने रिज़्क़ की गुंजाइश रखी, ताकि लोगों को तकलीफ़ न हो। साथ ही, हमें यह भी सीख मिलती है कि जब अल्लाह हमें किसी नेमत और हिदायत से नवाज़े, तो हमें उसका ज़िक्र करना चाहिए और उसके एहसान का शुक्र अदा करना चाहिए। अल्लाह की हिदायत सबसे बड़ी नेमत है, और इसका सही तरीका है — उसकी इबादत, उसका ज़िक्र और उसके बताए रास्ते पर चलना।
📜 आयत 196-200 — सूरा अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 198
सूरा अल-बकरा आयत 198 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : इस में कोई इल्ज़ाम नहीं है कि (हज के साथ)…सूरा आयत 198/286 — सूरा अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-बकरा सुनें, सूरा अल-बकरा अनुवाद, सूरा अल-बकरा mp3, सूरा अल-बकरा pdf. आयत 196–200. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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