अल-बकरा · 216/286
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बकरा
كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِتَالُ وَهُوَ كُرْهٌ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰ أَن تَكْرَهُوا شَيْئًا وَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰ أَن تُحِبُّوا شَيْئًا وَهُوَ شَرٌّ لَّكُمْ ۗ وَاللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ ۝٢١٦
Kutiba alaikumulqitaalu wa huwa kurhullakum wa `asaaa an takrahoo shai`anw wa huwa khairullakum wa `asaaa an tuhibbo shai`anw wa huwa sharrullakum; wallaahu ya`lamu wa antum laa ta`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
(मुसलमानों) तुम पर जिहाद फर्ज क़िया गया अगरचे तुम पर शाक़ ज़रुर है और अजब नहीं कि तुम किसी चीज़ (जिहाद) को नापसन्द करो हालॉकि वह तुम्हारे हक़ में बेहतर हो और अजब नहीं कि तुम किसी चीज़ को पसन्द करो हालॉकि वह तुम्हारे हक़ में बुरी हो और ख़ुदा (तो) जानता ही है मगर तुम नही जानते हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • كُتِبَ: अनिवार्य किया गया, फ़र्ज़ किया गया।
  • الْقِتَالُ: जिहाद, यानी काफ़िरों से युद्ध।
  • كُرْهٌ: कठिन, भारी, जो मन को नागवार हो।
  • عَسَى: आशा या संभावना का शब्द है, यहाँ इसका अर्थ है "हो सकता है"।
  • تَكْرَهُوا: तुम नापसंद करो।
  • تُحِبُّوا: तुम पसंद करो।
  • شَرٌّ: बुराई, हानि।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमानवालो! अल्लाह ने तुम पर काफ़िरों से युद्ध (जिहाद) को फ़र्ज़ (अनिवार्य) कर दिया है, हालाँकि यह तुम्हारे स्वभाव को भारी और कठिन लगता है, क्योंकि इसमें जान और माल की क़ुर्बानी देनी पड़ती है, और ख़तरे भी होते हैं। लेकिन यह मत समझो कि जो चीज़ तुम्हें नापसंद है, वह तुम्हारे लिए बुरी ही होगी। हो सकता है कि तुम किसी चीज़ को नापसंद करो, जबकि वह वास्तव में तुम्हारे लिए भलाई का कारण हो — जैसे जिहाद, जिसमें अल्लाह की राह में लड़ने का बड़ा सवाब है, दुश्मन पर फ़तह मिलती है, और अल्लाह का कलिमा (बोलबाला) बुलंद होता है। इसी तरह, हो सकता है कि तुम किसी चीज़ को पसंद करो — जैसे जिहाद से पीछे रहना, आराम और सुख-चैन की ज़िंदगी — जबकि वह तुम्हारे लिए बुराई और हानि का सबब हो, क्योंकि उसमें अल्लाह की मदद से महरूम रहना, दुश्मनों का दबदबा और बड़े अज्र (पुण्य) से वंचित रहना शामिल है। अल्लाह तआला हर चीज़ की हक़ीक़त और अंजाम को जानता है, जबकि तुम नहीं जानते। इसलिए उसके हुक्म को क़बूल करो, क्योंकि उसी में तुम्हारी भलाई है।


फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह पर भरोसा: यह आयत सिखाती है कि इंसान की समझ नाकिस (अधूरी) है। जो चीज़ बाहर से बुरी लगती है, वह अंदर से अच्छी हो सकती है, और जो अच्छी लगती है, वह बुरी हो सकती है। इसलिए अल्लाह के फ़ैसले पर पूरा भरोसा रखना चाहिए।
  2. जिहाद की अहमियत: जिहाद सिर्फ़ युद्ध नहीं, बल्कि अल्लाह की राह में अपनी जान और माल ख़र्च करने का सबसे बड़ा अमल है। यह इंसान को दुनिया की मोहब्बत से निकालकर आख़िरत की तरफ़ ले जाता है।
  3. सब्र और रज़ा-ब-रज़ा: मुश्किलों और कठिनाइयों में सब्र करना और अल्लाह के हुक्म पर राज़ी रहना ईमान की निशानी है। अल्लाह जो चाहता है, उसमें हिकमत (बुद्धिमत्ता) होती है, भले ही हमें वह समझ न आए।
  4. इल्म की कमी: इंसान का इल्म बहुत सीमित है, जबकि अल्लाह का इल्म हर चीज़ पर हावी है। इसलिए अपनी अक़्ल से बड़े फ़ैसले करने के बजाय अल्लाह की हिदायत को मानना बेहतर है।
  5. दुनिया की आज़माइश: यह आयत बताती है कि दुनिया में इंसान को उस चीज़ से आज़माया जाता है जो उसे नागवार हो, ताकि उसका ईमान और सब्र परखा जाए। जो इस आज़माइश में कामयाब होता है, उसके लिए अल्लाह के पास बड़ा इनाम है।


📜 आयत 214-218 — सूरा अल-बकरा

214أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَأْتِكُم مَّثَلُ الَّذِينَ خَلَوْا مِن قَبْلِكُم ۖ مَّسَّتْهُمُ الْبَأْسَاءُ وَالضَّرَّاءُ وَزُلْزِلُوا حَتَّىٰ يَقُولَ الرَّسُولُ وَالَّذِينَ آمَنُوا مَعَهُ مَتَىٰ نَصْرُ اللَّهِ ۗ أَلَا إِنَّ نَصْرَ اللَّهِ قَرِيبٌ
क्या तुम ये ख्याल करते हो कि बेहश्त में पहुँच ही जाओगे हालॉकि अभी तक तुम्हे अगले ज़माने वालों की सी हालत नहीं पेश आयी कि उन्हें तरह तरह की तक़लीफों (फाक़ा कशी मोहताजी) और बीमारी ने घेर लिया था और ज़लज़ले में इस क़दर झिंझोडे ग़ए कि आख़िर (आज़िज़ हो के) पैग़म्बर और ईमान वाले जो उन के साथ थे कहने लगे देखिए ख़ुदा की मदद कब (होती) है देखो (घबराओ नहीं) ख़ुदा की मदद यक़ीनन बहुत क़रीब है
215يَسْأَلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَ ۖ قُلْ مَا أَنفَقْتُم مِّنْ خَيْرٍ فَلِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ ۗ وَمَا تَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ بِهِ عَلِيمٌ
(ऐ रसूल) तुमसे लोग पूछते हैं कि हम ख़ुदा की राह में क्या खर्च करें (तो तुम उन्हें) जवाब दो कि तुम अपनी नेक कमाई से जो कुछ खर्च करो तो (वह तुम्हारे माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजो और परदेसियों का हक़ है और तुम कोई नेक सा काम करो ख़ुदा उसको ज़रुर जानता है
216كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِتَالُ وَهُوَ كُرْهٌ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰ أَن تَكْرَهُوا شَيْئًا وَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰ أَن تُحِبُّوا شَيْئًا وَهُوَ شَرٌّ لَّكُمْ ۗ وَاللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
(मुसलमानों) तुम पर जिहाद फर्ज क़िया गया अगरचे तुम पर शाक़ ज़रुर है और अजब नहीं कि तुम किसी चीज़ (जिहाद) को नापसन्द करो हालॉकि वह तुम्हारे हक़ में बेहतर हो और अजब नहीं कि तुम किसी चीज़ को पसन्द करो हालॉकि वह तुम्हारे हक़ में बुरी हो और ख़ुदा (तो) जानता ही है मगर तुम नही जानते हो
217يَسْأَلُونَكَ عَنِ الشَّهْرِ الْحَرَامِ قِتَالٍ فِيهِ ۖ قُلْ قِتَالٌ فِيهِ كَبِيرٌ ۖ وَصَدٌّ عَن سَبِيلِ اللَّهِ وَكُفْرٌ بِهِ وَالْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَإِخْرَاجُ أَهْلِهِ مِنْهُ أَكْبَرُ عِندَ اللَّهِ ۚ وَالْفِتْنَةُ أَكْبَرُ مِنَ الْقَتْلِ ۗ وَلَا يَزَالُونَ يُقَاتِلُونَكُمْ حَتَّىٰ يَرُدُّوكُمْ عَن دِينِكُمْ إِنِ اسْتَطَاعُوا ۚ وَمَن يَرْتَدِدْ مِنكُمْ عَن دِينِهِ فَيَمُتْ وَهُوَ كَافِرٌ فَأُولَٰئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ ۖ وَأُولَٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
(ऐ रसूल) तुमसे लोग हुरमत वाले महीनों की निस्बत पूछते हैं कि (आया) जिहाद उनमें जायज़ है तो तुम उन्हें जवाब दो कि इन महीनों में जेहाद बड़ा गुनाह है और ये भी याद रहे कि ख़ुदा की राह से रोकना और ख़ुदा से इन्कार और मस्जिदुल हराम (काबा) से रोकना और जो उस के अहल है उनका मस्जिद से निकाल बाहर करना (ये सब) ख़ुदा के नज़दीक इस से भी बढ़कर गुनाह है और फ़ितना परदाज़ी कुश्ती ख़़ून से भी बढ़ कर है और ये कुफ्फ़ार हमेशा तुम से लड़ते ही चले जाएँगें यहाँ तक कि अगर उन का बस चले तो तुम को तुम्हारे दीन से फिरा दे और तुम में जो शख्स अपने दीन से फिरा और कुफ़्र की हालत में मर गया तो ऐसों ही का किया कराया सब कुछ दुनिया और आखेरत (दोनों) में अकारत है और यही लोग जहन्नुमी हैं (और) वह उसी में हमेशा रहेंगें
218إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَالَّذِينَ هَاجَرُوا وَجَاهَدُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أُولَٰئِكَ يَرْجُونَ رَحْمَتَ اللَّهِ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
बेशक जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और ख़ुदा की राह में हिजरत की और जिहाद किया यही लोग रहमते ख़ुदा के उम्मीदवार हैं और ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
अल-बकराकुरान सूची
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216आयत

अनुवाद — अल-बकरा 216

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Wednesday, September 30, 2026

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