अल-बकरा · 241/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَلِلْمُطَلَّقَاتِ مَتَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ ۝٢٤١
Wa lilmutallaqaati mataa`um bilma`roofi haqqan `alal muttaqeen
📖 हिंदी अर्थ
और जिन औरतों को ताअय्युन मेहर और हाथ लगाए बगैर तलाक़ दे दी जाए उनके साथ जोड़े रुपए वगैरह से सुलूक करना लाज़िम है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • मुतल्लक़ात (المطلقات): वे औरतें जिन्हें तलाक़ दिया जा चुका हो।
  • मताअ (متاع): वह सामान या राशि जो तलाक़ के बाद औरत को दी जाए, जैसे कपड़े, खर्च या नकदी।
  • बिल-मारूफ़ (بالمعروف): शरियत और समाज के सही मानकों के अनुसार, जो उचित और न्यायसंगत हो।
  • हक़्क़न (حقًا): यह एक स्थापित और अनिवार्य अधिकार है।
  • अल-मुत्तक़ीन (المتقين): वे लोग जो अल्लाह से डरते हैं और उसके आदेशों का पालन करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस पवित्र आयत में अल्लाह तआला तलाक़शुदा औरतों के अधिकारों की रक्षा करते हुए फ़रमाता है कि जिन औरतों को तलाक़ दिया गया है, उनके लिए एक उचित और मुनासिब मताअ (सामान या राशि) देना अनिवार्य है। यह मताअ उनकी टूटी हुई भावनाओं को सांत्वना देने और उनके दिलों को जोड़ने के लिए है, ताकि तलाक़ के बाद उन्हें महसूस न हो कि उन्हें अकेला छोड़ दिया गया या उनकी कोई क़द्र नहीं।

यह मताअ "बिल-मारूफ़" होना चाहिए, यानी शरियत और समाज के सही मानकों के अनुसार, जिसमें शौहर की हैसियत और माली हालत का ख़याल रखा जाए। अगर शौहर अमीर है तो उसके हिसाब से और अगर ग़रीब है तो उसकी क़ुदरत के मुताबिक़, ताकि किसी पर ज़ुल्म न हो और न ही किसी को नुक़सान उठाना पड़े।

यह हुक्म सिर्फ़ एक नसीहत या सलाह नहीं है, बल्कि अल्लाह तआला इसे "हक़्क़न" यानी एक स्थापित और अनिवार्य अधिकार बताता है, जो उन लोगों पर लागू होता है जो अल्लाह से डरते हैं और उसके आदेशों का पालन करते हैं। यानी असली मुत्तक़ी (परहेज़गार) वही है जो अल्लाह के इस हुक्म को पूरा करे और तलाक़शुदा औरत के साथ अच्छा सुलूक करे।

दावती पहलू:

यह आयत हमें इस्लाम की उस खूबसूरत तालीमात से रूबरू कराती है जो औरतों के अधिकारों की पूरी रक्षा करती है। इस्लाम ने तलाक़ जैसे नाज़ुक मौक़े पर भी औरत को उसका हक़ देना सिखाया और उसकी इज़्ज़त को बचाए रखा। यह हमारे दीन की रहमत और इंसाफ़ की सबसे बड़ी मिसाल है। अल्लाह तआला हमें सिखाता है कि दुश्मनी या नाराज़गी के बावजूद भी इंसाफ़ और अच्छाई का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए। जो लोग अल्लाह से डरते हैं, वे दूसरों के साथ भलाई करते हैं, ख़ासकर उनके साथ जो कमज़ोर हालत में हों। यही तक़वा (परहेज़गारी) की असली पहचान है। आओ हम सब इस तालीम पर अमल करें और अपने समाज में औरतों के अधिकारों का पूरा ख़याल रखें, ताकि हम अल्लाह की रहमत के हक़दार बनें।



📜 आयत 239-243 — अल-बकरा

239فَإِنْ خِفْتُمْ فَرِجَالًا أَوْ رُكْبَانًا ۖ فَإِذَا أَمِنتُمْ فَاذْكُرُوا اللَّهَ كَمَا عَلَّمَكُم مَّا لَمْ تَكُونُوا تَعْلَمُونَ
और पूरी नमाज़ न पढ़ सको तो सवार या पैदल जिस तरह बन पड़े पढ़ लो फिर जब तुम्हें इत्मेनान हो तो जिस तरह ख़ुदा ने तुम्हें (अपने रसूल की मआरफत इन बातों को सिखाया है जो तुम नहीं जानते थे
240وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا وَصِيَّةً لِّأَزْوَاجِهِم مَّتَاعًا إِلَى الْحَوْلِ غَيْرَ إِخْرَاجٍ ۚ فَإِنْ خَرَجْنَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِي مَا فَعَلْنَ فِي أَنفُسِهِنَّ مِن مَّعْرُوفٍ ۗ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
उसी तरह ख़ुदा को याद करो और तुम में से जो लोग अपनी बीवियों को छोड़ कर मर जाएँ उन पर अपनी बीबियों के हक़ में साल भर तक के नान व नुफ्के (रोटी कपड़ा) और (घर से) न निकलने की वसीयत करनी (लाज़िम) है पस अगर औरतें ख़ुद निकल खड़ी हो तो जायज़ बातों (निकाह वगैरह) से कुछ अपने हक़ में करे उसका तुम पर कुछ इल्ज़ाम नही है और ख़ुदा हर यै पर ग़ालिब और हिक़मत वाला है
241وَلِلْمُطَلَّقَاتِ مَتَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ
और जिन औरतों को ताअय्युन मेहर और हाथ लगाए बगैर तलाक़ दे दी जाए उनके साथ जोड़े रुपए वगैरह से सुलूक करना लाज़िम है
242كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
(ये भी) परहेज़गारों पर एक हक़ है उसी तरह ख़ुदा तुम लोगों की हिदायत के वास्ते अपने एहक़ाम साफ़ साफ़ बयान फरमाता है
243۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ خَرَجُوا مِن دِيَارِهِمْ وَهُمْ أُلُوفٌ حَذَرَ الْمَوْتِ فَقَالَ لَهُمُ اللَّهُ مُوتُوا ثُمَّ أَحْيَاهُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ
ताकि तुम समझो (ऐ रसूल) क्या तुम ने उन लोगों के हाल पर नज़र नही की जो मौत के डर के मारे अपने घरों से निकल भागे और वह हज़ारो आदमी थे तो ख़ुदा ने उन से फरमाया कि सब के सब मर जाओ (और वह मर गए) फिर ख़ुदा न उन्हें जिन्दा किया बेशक ख़ुदा लोगों पर बड़ा मेहरबान है मगर अक्सर लोग उसका शुक्र नहीं करते
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अनुवाद — अल-बकरा 241

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Tuesday, August 18, 2026

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