अन-नूर · 36/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
فِي بُيُوتٍ أَذِنَ اللَّهُ أَن تُرْفَعَ وَيُذْكَرَ فِيهَا اسْمُهُ يُسَبِّحُ لَهُ فِيهَا بِالْغُدُوِّ وَالْآصَالِ ۝٣٦
Fee buyootin azinal laahu an turfa`a wa yuzkara feehasmuhoo yusabbihu lahoo feehaa bilghuduwwi wal aasaal
📖 हिंदी अर्थ
(वह क़न्दील) उन घरों में रौशन है जिनकी निस्बत ख़ुदा ने हुक्म दिया कि उनकी ताज़ीम की जाए और उनमें उसका नाम लिया जाए जिनमें सुबह व शाम वह लोग उसकी तस्बीह किया करते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • बुयूत (घर): यहाँ अर्थ मस्जिदें हैं।
  • अज़िना: आदेश दिया, अनुमति दी।
  • तुरफ़अ: ऊँचा किया जाए, सम्मानित किया जाए, बुलंद किया जाए।
  • युसब्बिहु: पवित्रता का वर्णन करते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं, तस्बीह करते हैं।
  • गुदुव्व: सुबह का समय।
  • आसाल: शाम का समय (दोपहर के बाद से रात तक)।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उस नूर (प्रकाश) का वर्णन कर रही है जो अल्लाह ने मोमिनों के दिलों में डाला है, और उस प्रकाश का संबंध उन घरों (मस्जिदों) से है जिन्हें अल्लाह ने स्वयं ऊँचा उठाने का आदेश दिया है। ये वे पवित्र स्थान हैं जिन्हें अल्लाह ने सम्मानित किया है, उनकी बुनियाद को बुलंद किया है, और उन्हें अपनी इबादत के लिए चुना है। इन मस्जिदों में अल्लाह का नाम लिया जाता है—अज़ान के माध्यम से, कुरआन की तिलावत के माध्यम से, और हर प्रकार के ज़िक्र (याद) के माध्यम से। ये वे स्थान हैं जहाँ सुबह और शाम अल्लाह की तस्बीह (पवित्रता का वर्णन) की जाती है, यानी नमाज़ें अदा की जाती हैं—फज्र की नमाज़ सुबह, और ज़ुहर, अस्र, मग़रिब और इशा की नमाज़ें शाम के समय। ये पाँचों नमाज़ें अल्लाह की रज़ा (प्रसन्नता) की तलाश में पढ़ी जाती हैं।

इस आयत में अल्लाह ने मस्जिदों के सम्मान और उनकी देखभाल का विशेष ध्यान रखने की शिक्षा दी है। मस्जिदें सिर्फ़ इमारतें नहीं हैं, बल्कि ये धरती पर अल्लाह के घर हैं, जहाँ बंदे अपने रब के सामने सजदे में झुकते हैं, अपने गुनाहों की माफ़ी माँगते हैं, और अपने दिलों को सुकून देते हैं। जो लोग इन मस्जिदों को आबाद रखते हैं, उनके लिए अल्लाह के पास बड़ा इनाम है। यह आयत हमें बताती है कि मस्जिदों की देखभाल करना, उन्हें साफ़-सुथरा रखना, और उनमें अल्लाह की इबादत के लिए आना—यह ईमान की निशानी है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें यह सिखाती है कि मस्जिदें सिर्फ़ नमाज़ पढ़ने की जगह नहीं हैं, बल्कि ये हमारी ज़िंदगी का केंद्र हैं। जब हम सुबह उठते हैं और फज्र की नमाज़ के लिए मस्जिद जाते हैं, तो हमारा दिन अल्लाह की याद से शुरू होता है, और जब हम शाम को मस्जिद में हाज़िरी देते हैं, तो हमारा दिन भी अल्लाह की याद पर खत्म होता है। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया की परेशानियों से निकालकर अल्लाह की रहमत की तरफ ले जाता है। मस्जिदें हमें भाईचारे, एकता, और आपसी मोहब्बत का पाठ पढ़ाती हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम मस्जिदों से जुड़े रहें, उन्हें आबाद रखें, और अपने बच्चों को भी मस्जिद से जोड़ें। याद रखें, जो लोग मस्जिदों को आबाद रखते हैं, अल्लाह उन्हें क़यामत के दिन अपने अर्श की छाँव में जगह देगा, जब कोई और छाँव नहीं होगी।



📜 आयत 34-38 — अन-नूर

34وَلَقَدْ أَنزَلْنَا إِلَيْكُمْ آيَاتٍ مُّبَيِّنَاتٍ وَمَثَلًا مِّنَ الَّذِينَ خَلَوْا مِن قَبْلِكُمْ وَمَوْعِظَةً لِّلْمُتَّقِينَ
और (ईमानदारों) हमने तो तुम्हारे पास (अपनी) वाज़ेए व रौशन आयतें और जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनकी हालतें और परहेज़गारों के लिए नसीहत (की बाते) नाज़िल की
35۞ اللَّهُ نُورُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ مَثَلُ نُورِهِ كَمِشْكَاةٍ فِيهَا مِصْبَاحٌ ۖ الْمِصْبَاحُ فِي زُجَاجَةٍ ۖ الزُّجَاجَةُ كَأَنَّهَا كَوْكَبٌ دُرِّيٌّ يُوقَدُ مِن شَجَرَةٍ مُّبَارَكَةٍ زَيْتُونَةٍ لَّا شَرْقِيَّةٍ وَلَا غَرْبِيَّةٍ يَكَادُ زَيْتُهَا يُضِيءُ وَلَوْ لَمْ تَمْسَسْهُ نَارٌ ۚ نُّورٌ عَلَىٰ نُورٍ ۗ يَهْدِي اللَّهُ لِنُورِهِ مَن يَشَاءُ ۚ وَيَضْرِبُ اللَّهُ الْأَمْثَالَ لِلنَّاسِ ۗ وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
ख़ुदा तो सारे आसमान और ज़मीन का नूर है उसके नूर की मिसल (ऐसी) है जैसे एक ताक़ (सीना) है जिसमे एक रौशन चिराग़ (इल्मे शरीयत) हो और चिराग़ एक शीशे की क़न्दील (दिल) में हो (और) क़न्दील (अपनी तड़प में) गोया एक जगमगाता हुआ रौशन सितारा (वह चिराग़) जैतून के मुबारक दरख्त (के तेल) से रौशन किया जाए जो न पूरब की तरफ हो और न पश्चिम की तरफ (बल्कि बीचों बीच मैदान में) उसका तेल (ऐसा) शफ्फाफ हो कि अगरचे आग उसे छुए भी नही ताहम ऐसा मालूम हो कि आप ही आप रौशन हो जाएगा (ग़रज़ एक नूर नहीं बल्कि) नूर आला नूर (नूर की नूर पर जोत पड़ रही है) ख़ुदा अपने नूर की तरफ जिसे चाहता है हिदायत करता है और ख़ुदा तो हर चीज़ से खूब वाक़िफ है
36فِي بُيُوتٍ أَذِنَ اللَّهُ أَن تُرْفَعَ وَيُذْكَرَ فِيهَا اسْمُهُ يُسَبِّحُ لَهُ فِيهَا بِالْغُدُوِّ وَالْآصَالِ
(वह क़न्दील) उन घरों में रौशन है जिनकी निस्बत ख़ुदा ने हुक्म दिया कि उनकी ताज़ीम की जाए और उनमें उसका नाम लिया जाए जिनमें सुबह व शाम वह लोग उसकी तस्बीह किया करते हैं
37رِجَالٌ لَّا تُلْهِيهِمْ تِجَارَةٌ وَلَا بَيْعٌ عَن ذِكْرِ اللَّهِ وَإِقَامِ الصَّلَاةِ وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ ۙ يَخَافُونَ يَوْمًا تَتَقَلَّبُ فِيهِ الْقُلُوبُ وَالْأَبْصَارُ
ऐसे लोग जिनको ख़ुदा के ज़िक्र और नमाज़ पढ़ने और ज़कात अदा करने से न तो तिजारत ही ग़ाफिल कर सकती है न (ख़रीद फरोख्त) (का मामला क्योंकि) वह लोग उस दिन से डरते हैं जिसमें ख़ौफ के मारे दिल और ऑंखें उलट जाएँगी
38لِيَجْزِيَهُمُ اللَّهُ أَحْسَنَ مَا عَمِلُوا وَيَزِيدَهُم مِّن فَضْلِهِ ۗ وَاللَّهُ يَرْزُقُ مَن يَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ
(उसकी इबादत इसलिए करते हैं) ताकि ख़ुदा उन्हें उनके आमाल का बेहतर से बेहतर बदला अता फरमाए और अपने फज़ल व करम से कुछ और ज्यादा भी दे और ख़ुदा तो जिसे चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है
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अनुवाद — अन-नूर 36

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Tuesday, August 18, 2026

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