आल-इमरान · 141/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَلِيُمَحِّصَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَيَمْحَقَ الْكَافِرِينَ ۝١٤١
Wa liyumahhisal laahul lazeena aamanoo wa yamhaqal kaafireen
📖 हिंदी अर्थ
और ये (भी मंजूर था) कि सच्चे ईमानदारों को (साबित क़दमी की वजह से) निरा खरा अलग कर ले और नाफ़रमानों (भागने वालों) का मटियामेट कर दे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لِيُمَحِّصَ: परखना, शुद्ध करना, छानना। अर्थात् किसी चीज़ को उसके दोषों से अलग करके खालिस कर देना।
  • يَمْحَقَ: नष्ट करना, मिटा देना, सत्यानाश कर देना।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने उहुद के मैदान में मुसलमानों को जो कठिनाई और परीक्षा दी, उसके पीछे कई बड़ी हिकमतें (गूढ़ रहस्य) थीं। उनमें से एक यह थी कि अल्लाह ईमानवालों को अच्छी तरह परखे और उन्हें उनके गुनाहों से पाक कर दे। जिस प्रकार सुनार सोने को आग में डालकर उसकी मिलावट को अलग करता है, उसी प्रकार यह परीक्षा मोमिनों के दिलों को शुद्ध करने और उनके नफ़्स को गुनाहों की मैल से साफ करने का ज़रिया बनी। साथ ही, इस परीक्षा से मुनाफ़िक़ीन (दिखावटी मुसलमानों) की असलियत भी खुल गई, जो अपने ईमान में कमज़ोर थे और जिनके दिलों में बीमारी थी। इस तरह मुसलमानों की सफ़ (कतार) खालिस मोमिनों की बन गई।

दूसरी ओर, यही घटना काफ़िरों के लिए विनाश और सत्यानाश का कारण बनी। अल्लाह ने उन्हें उनके कु़फ़्र और सरकशी की वजह से धीरे-धीरे नष्ट किया और उनका अंत तबाही पर ही हुआ। चाहे मुसलमान उनसे शहीद हुए हों, यह शहादत मोमिनों के लिए रहमत और मग़फ़िरत का ज़रिया बनी, और चाहे मुसलमानों ने उन्हें क़त्ल किया हो, यह काफ़िरों के लिए जहन्नुम का रास्ता साफ करने वाला बना। इस प्रकार, हर हाल में मोमिनों का भला हुआ और काफ़िरों का नुक़सान।

फ़ायदे (सबक़):

  1. मुसीबतें और कठिनाइयाँ मोमिन के लिए रहमत होती हैं, क्योंकि इनसे उसके गुनाह माफ़ होते हैं और उसका दर्जा बुलंद होता है।
  2. परीक्षा के समय ही सच्चे और झूठे ईमान की पहचान होती है; यह मुनाफ़िक़ीन को बेनक़ाब करने का ज़रिया है।
  3. अल्लाह का क़ानून है कि वह मोमिनों को पाक करता है और काफ़िरों को धीरे-धीरे तबाही की तरफ ले जाता है, चाहे वह तुरंत नज़र न आए।
  4. मोमिन को चाहिए कि हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखे, क्योंकि जो चीज़ उसे बुरी लगती है, उसमें भी अल्लाह ने उसके लिए भलाई रखी होती है।
  5. यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि जीत और हार का फ़ैसला अल्लाह के हाथ में है; हार के बाद भी निराश न हों, क्योंकि यही परीक्षा उन्हें आगे की कामयाबी के लिए तैयार करती है।


📜 आयत 139-143 — आल-इमरान

139وَلَا تَهِنُوا وَلَا تَحْزَنُوا وَأَنتُمُ الْأَعْلَوْنَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
और मुसलमानों काहिली न करो और (इस) इत्तफ़ाक़ी शिकस्त (ओहद से) कुढ़ो नहीं (क्योंकि) अगर तुम सच्चे मोमिन हो तो तुम ही ग़ालिब और वर रहोगे
140إِن يَمْسَسْكُمْ قَرْحٌ فَقَدْ مَسَّ الْقَوْمَ قَرْحٌ مِّثْلُهُ ۚ وَتِلْكَ الْأَيَّامُ نُدَاوِلُهَا بَيْنَ النَّاسِ وَلِيَعْلَمَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَيَتَّخِذَ مِنكُمْ شُهَدَاءَ ۗ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِمِينَ
अगर (जंगे ओहद में) तुमको ज़ख्म लगा है तो उसी तरह (बदर में) तुम्हारे फ़रीक़ (कुफ्फ़ार को) भी ज़ख्म लग चुका है (उस पर उनकी हिम्मत तो न टूटी) ये इत्तफ़ाक़ाते ज़माना हैं जो हम लोगों के दरमियान बारी बारी उलट फेर किया करते हैं और ये (इत्तफ़ाक़ी शिकस्त इसलिए थी) ताकि ख़ुदा सच्चे ईमानदारों को (ज़ाहिरी) मुसलमानों से अलग देख लें और तुममें से बाज़ को दरजाए शहादत पर फ़ायज़ करें और ख़ुदा (हुक्मे रसूल से) सरताबी करने वालों को दोस्त नहीं रखता
141وَلِيُمَحِّصَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَيَمْحَقَ الْكَافِرِينَ
और ये (भी मंजूर था) कि सच्चे ईमानदारों को (साबित क़दमी की वजह से) निरा खरा अलग कर ले और नाफ़रमानों (भागने वालों) का मटियामेट कर दे
142أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَعْلَمِ اللَّهُ الَّذِينَ جَاهَدُوا مِنكُمْ وَيَعْلَمَ الصَّابِرِينَ
(मुसलमानों) क्या तुम ये समझते हो कि सब के सब बहिश्त में चले ही जाओगे और क्या ख़ुदा ने अभी तक तुममें से उन लोगों को भी नहीं पहचाना जिन्होंने जेहाद किया और न साबित क़दम रहने वालों को ही पहचाना
143وَلَقَدْ كُنتُمْ تَمَنَّوْنَ الْمَوْتَ مِن قَبْلِ أَن تَلْقَوْهُ فَقَدْ رَأَيْتُمُوهُ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ
तुम तो मौत के आने से पहले (लड़ाई में) मरने की तमन्ना करते थे बस अब तुमने उसको अपनी ऑख से देख लिया और तुम अब भी देख रहे हो
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अनुवाद — आल-इमरान 141

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सूरा आयत 141/200 — आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: आल-इमरान सुनें, आल-इमरान अनुवाद, आल-इमरान mp3, आल-इमरान pdf. आयत 139–143. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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