आल-इमरान · 142/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَعْلَمِ اللَّهُ الَّذِينَ جَاهَدُوا مِنكُمْ وَيَعْلَمَ الصَّابِرِينَ ۝١٤٢
Am hasibtum an tadkhulul Jannnata wa lammaa ya`lamil laahul lazeena jaahadoo minkum wa ya`lamas saabireen
📖 हिंदी अर्थ
(मुसलमानों) क्या तुम ये समझते हो कि सब के सब बहिश्त में चले ही जाओगे और क्या ख़ुदा ने अभी तक तुममें से उन लोगों को भी नहीं पहचाना जिन्होंने जेहाद किया और न साबित क़दम रहने वालों को ही पहचाना
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَمْ حَسِبْتُمْ – क्या तुमने समझ लिया / क्या तुमने यह गुमान कर लिया
  • وَلَمَّا يَعْلَمِ اللهُ – जबकि अल्लाह ने अभी तक (तुम्हारी परीक्षा करके) जाना नहीं है
  • جَاهَدُوا – जिन्होंने जिहाद किया (अल्लाह के मार्ग में संघर्ष किया)
  • الصَّابِرِينَ – धैर्य रखने वाले (सब्र करने वाले)

विस्तृत तफ़सीर:

ऐ ईमान वालो! क्या तुमने यह समझ लिया है कि तुम बिना किसी परीक्षा और आज़माइश के सीधे जन्नत में चले जाओगे? हरगिज़ नहीं! यह ख़याल बिल्कुल ग़लत है। अल्लाह तआला ने अपनी रहमत और हिकमत से यह क़ानून बनाया है कि जन्नत का रास्ता आसानी से नहीं मिलता, बल्कि उसके लिए कुर्बानियाँ देनी पड़ती हैं, मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और सब्र का इम्तिहान देना पड़ता है।

यह आयत मुसलमानों को उस वक़्त की याद दिलाती है जब उन्होंने उहुद की जंग में मुश्किलात का सामना किया था। कुछ लोगों के दिलों में यह ख़याल आया कि शायद हमें जन्नत मिल जाए बग़ैर किसी परेशानी के। अल्लाह ने फ़रमाया: "क्या तुमने यह गुमान कर लिया है कि तुम जन्नत में दाखिल हो जाओगे, हालाँकि अभी अल्लाह ने तुममें से मुजाहिदीन (जिहाद करने वालों) को और सब्र करने वालों को ज़ाहिर नहीं किया?"

यानी जन्नत की राह में लड़ाई-जंग, मुश्किलें, तकलीफें और आज़माइशें आएँगी ही। इन हालात में जो लोग अल्लाह के मार्ग में जिहाद करेंगे, अपनी जान और माल से कुर्बानी देंगे, और मुश्किलों पर सब्र करेंगे, वही असल में जन्नत के हक़दार हैं। अल्लाह तआला चाहता है कि सच्चे और झूठे लोग अलग हो जाएँ, ईमान वाले और मुनाफ़िक़ सामने आ जाएँ, और हर शख्स का असली रूप ज़ाहिर हो जाए।

यह बात हमें सिखाती है कि जन्नत कोई सस्ती चीज़ नहीं है। यह उन लोगों को मिलती है जो अल्लाह की राह में अपना सब कुछ लुटा देते हैं, जो मुश्किल वक़्त में भी डटे रहते हैं, और जो अल्लाह पर भरोसा करके सब्र करते हैं। अल्लाह तआला हमें यह तालीम देता है कि ज़िंदगी की आज़माइशों से भागो मत, बल्कि उनका सामना करो, क्योंकि यही आज़माइशें तुम्हें बुलंदी की मंज़िल तक पहुँचाएँगी।

प्यारे मुसलमानों! याद रखो, जन्नत के दरवाज़े उन्हीं के लिए खुलते हैं जो अल्लाह की राह में जिहाद करते हैं और मुश्किलों पर सब्र करते हैं। यह आयत हमें हौसला देती है कि मुश्किलों से घबराओ नहीं, क्योंकि यही रास्ता जन्नत तक पहुँचाता है। अल्लाह तआला हम सबको सच्चे मुजाहिद और साबिरीन (सब्र करने वालों) में शामिल फ़रमाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 140-144 — आल-इमरान

140إِن يَمْسَسْكُمْ قَرْحٌ فَقَدْ مَسَّ الْقَوْمَ قَرْحٌ مِّثْلُهُ ۚ وَتِلْكَ الْأَيَّامُ نُدَاوِلُهَا بَيْنَ النَّاسِ وَلِيَعْلَمَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَيَتَّخِذَ مِنكُمْ شُهَدَاءَ ۗ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِمِينَ
अगर (जंगे ओहद में) तुमको ज़ख्म लगा है तो उसी तरह (बदर में) तुम्हारे फ़रीक़ (कुफ्फ़ार को) भी ज़ख्म लग चुका है (उस पर उनकी हिम्मत तो न टूटी) ये इत्तफ़ाक़ाते ज़माना हैं जो हम लोगों के दरमियान बारी बारी उलट फेर किया करते हैं और ये (इत्तफ़ाक़ी शिकस्त इसलिए थी) ताकि ख़ुदा सच्चे ईमानदारों को (ज़ाहिरी) मुसलमानों से अलग देख लें और तुममें से बाज़ को दरजाए शहादत पर फ़ायज़ करें और ख़ुदा (हुक्मे रसूल से) सरताबी करने वालों को दोस्त नहीं रखता
141وَلِيُمَحِّصَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَيَمْحَقَ الْكَافِرِينَ
और ये (भी मंजूर था) कि सच्चे ईमानदारों को (साबित क़दमी की वजह से) निरा खरा अलग कर ले और नाफ़रमानों (भागने वालों) का मटियामेट कर दे
142أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَعْلَمِ اللَّهُ الَّذِينَ جَاهَدُوا مِنكُمْ وَيَعْلَمَ الصَّابِرِينَ
(मुसलमानों) क्या तुम ये समझते हो कि सब के सब बहिश्त में चले ही जाओगे और क्या ख़ुदा ने अभी तक तुममें से उन लोगों को भी नहीं पहचाना जिन्होंने जेहाद किया और न साबित क़दम रहने वालों को ही पहचाना
143وَلَقَدْ كُنتُمْ تَمَنَّوْنَ الْمَوْتَ مِن قَبْلِ أَن تَلْقَوْهُ فَقَدْ رَأَيْتُمُوهُ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ
तुम तो मौत के आने से पहले (लड़ाई में) मरने की तमन्ना करते थे बस अब तुमने उसको अपनी ऑख से देख लिया और तुम अब भी देख रहे हो
144وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِ الرُّسُلُ ۚ أَفَإِن مَّاتَ أَوْ قُتِلَ انقَلَبْتُمْ عَلَىٰ أَعْقَابِكُمْ ۚ وَمَن يَنقَلِبْ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ فَلَن يَضُرَّ اللَّهَ شَيْئًا ۗ وَسَيَجْزِي اللَّهُ الشَّاكِرِينَ
(फिर लड़ाई से जी क्यों चुराते हो) और मोहम्मद तो सिर्फ रसूल हैं (ख़ुदा नहीं) इनसे पहले बहुतेरे पैग़म्बर गुज़र चुके हैं फिर क्या अगर मोहम्मद अपनी मौत से मर जॉए या मार डाले जाएं तो तुम उलटे पॉव (अपने कुफ़्र की तरफ़) पलट जाओगे और जो उलटे पॉव फिरेगा (भी) तो (समझ लो) हरगिज़ ख़ुदा का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा और अनक़रीब ख़ुदा का शुक्र करने वालों को अच्छा बदला देगा
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अनुवाद — आल-इमरान 142

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Tuesday, August 18, 2026

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