अन-निसा · 45/176
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-निसा
وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِأَعْدَائِكُمْ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ وَلِيًّا وَكَفَىٰ بِاللَّهِ نَصِيرًا ۝٤٥
Wallaahu a`lamu bi a`daaa`i-kum; wa kafaa billaahi waliyyanw wa kafaa billaahi naseera
📖 हिंदी अर्थ
और ख़ुदा तुम्हारे दुशमनों से ख़ूब वाक़िफ़ है और दोस्ती के लिए बस ख़ुदा काफ़ी है और हिमायत के वास्ते भी ख़ुदा ही काफ़ी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَعْلَمُ: सबसे अधिक जानने वाला।
  • وَلِيًّا: संरक्षक, सहायक, मित्र।
  • نَصِيرًا: सहायता करने वाला, मददगार।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे ईमानवालो! अल्लाह तआला तुम्हारे शत्रुओं के बारे में तुमसे कहीं अधिक जानता है। वह उनके दिलों के राज़, उनकी छिपी चालों और उनकी शत्रुता की गहराई से पूरी तरह अवगत है। उसने तुम्हें उनके बारे में सचेत किया और उनकी वास्तविकता से परिचित कराया, ताकि तुम उनसे सावधान रहो और उनके धोखे में न आओ। अल्लाह तुम्हारा संरक्षक और मित्र होने के लिए पर्याप्त है—वह तुम्हारी रक्षा करेगा, तुम्हारे मामलों को संभालेगा और तुम्हें उनके अत्याचार से बचाएगा। वह तुम्हारी सहायता करने के लिए भी पर्याप्त है—वह तुम्हें उनके मुकाबले में शक्ति प्रदान करेगा, उनकी चालों को निष्फल करेगा और तुम्हें उन पर विजय दिलाएगा। जब अल्लाह तुम्हारा संरक्षक और सहायक हो, तो किसी शत्रु का भय नहीं होना चाहिए।

फ़ायदे (लाभ):

  1. अल्लाह तआला अपने बंदों के शत्रुओं को पूरी तरह जानता है, और यह ज्ञान उसके बंदों के प्रति उसकी दया और मेहरबानी का प्रमाण है कि वह उन्हें उनके शत्रुओं से सचेत करता है।
  2. मोमिन को चाहिए कि वह अल्लाह पर भरोसा करे और उसे ही अपना संरक्षक बनाए, क्योंकि अल्लाह से बेहतर संरक्षक और कोई नहीं।
  3. यह आयत मोमिनों के दिलों में साहस और हिम्मत पैदा करती है—जब अल्लाह उनका साथी है, तो दुनिया की तमाम ताकतें मिलकर भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं।
  4. अल्लाह पर भरोसा करना और उससे सहायता माँगना ही सच्ची कामयाबी का रास्ता है, और यही वह चीज़ है जो मोमिन को हर मुश्किल में क़ायम रखती है।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपने दुश्मनों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उनसे सावधान रहना चाहिए और अपनी सुरक्षा का भरोसा अल्लाह पर रखना चाहिए।


📜 आयत 43-47 — सूरा अन-निसा

43يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَقْرَبُوا الصَّلَاةَ وَأَنتُمْ سُكَارَىٰ حَتَّىٰ تَعْلَمُوا مَا تَقُولُونَ وَلَا جُنُبًا إِلَّا عَابِرِي سَبِيلٍ حَتَّىٰ تَغْتَسِلُوا ۚ وَإِن كُنتُم مَّرْضَىٰ أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ أَوْ جَاءَ أَحَدٌ مِّنكُم مِّنَ الْغَائِطِ أَوْ لَامَسْتُمُ النِّسَاءَ فَلَمْ تَجِدُوا مَاءً فَتَيَمَّمُوا صَعِيدًا طَيِّبًا فَامْسَحُوا بِوُجُوهِكُمْ وَأَيْدِيكُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَفُوًّا غَفُورًا
ऐ ईमानदारों तुम नशे की हालत में नमाज़ के क़रीब न जाओ ताकि तुम जो कुछ मुंह से कहो समझो भी तो और न जिनाबत की हालत में यहॉ तक कि ग़ुस्ल कर लो मगर राह गुज़र में हो (और गुस्ल मुमकिन नहीं है तो अलबत्ता ज़रूरत नहीं) बल्कि अगर तुम मरीज़ हो और पानी नुक़सान करे या सफ़र में हो तुममें से किसी का पैख़ाना निकल आए या औरतों से सोहबत की हो और तुमको पानी न मयस्सर हो (कि तहारत करो) तो पाक मिट्टी पर तैमूम कर लो और (उस का तरीक़ा ये है कि) अपने मुंह और हाथों पर मिट्टी भरा हाथ फेरो तो बेशक ख़ुदा माफ़ करने वाला है (और) बख्श ने वाला है
44أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِّنَ الْكِتَابِ يَشْتَرُونَ الضَّلَالَةَ وَيُرِيدُونَ أَن تَضِلُّوا السَّبِيلَ
(ऐ रसूल) क्या तूमने उन लोगों के हाल पर नज़र नहीं की जिन्हें किताबे ख़ुदा का कुछ हिस्सा दिया गया था (मगर) वह लोग (हिदायत के बदले) गुमराही ख़रीदने लगे उनकी ऐन मुराद यह है कि तुम भी राहे रास्त से बहक जाओ
45وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِأَعْدَائِكُمْ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ وَلِيًّا وَكَفَىٰ بِاللَّهِ نَصِيرًا
और ख़ुदा तुम्हारे दुशमनों से ख़ूब वाक़िफ़ है और दोस्ती के लिए बस ख़ुदा काफ़ी है और हिमायत के वास्ते भी ख़ुदा ही काफ़ी है
46مِّنَ الَّذِينَ هَادُوا يُحَرِّفُونَ الْكَلِمَ عَن مَّوَاضِعِهِ وَيَقُولُونَ سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَاسْمَعْ غَيْرَ مُسْمَعٍ وَرَاعِنَا لَيًّا بِأَلْسِنَتِهِمْ وَطَعْنًا فِي الدِّينِ ۚ وَلَوْ أَنَّهُمْ قَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا وَاسْمَعْ وَانظُرْنَا لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ وَأَقْوَمَ وَلَٰكِن لَّعَنَهُمُ اللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُونَ إِلَّا قَلِيلًا
(ऐ रसूल) यहूद से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बातों में उनके महल व मौक़े से हेर फेर डाल देते हैं और अपनी ज़बानों को मरोड़कर और दीन पर तानाज़नी की राह से तुमसे समेअना व असैना (हमने सुना और नाफ़रमानी की) और वसमअ गैरा मुसमइन (तुम मेरी सुनो ख़ुदा तुमको न सुनवाए) राअना मेरा ख्याल करो मेरे चरवाहे कहा करते हैं और अगर वह इसके बदले समेअना व अताअना (हमने सुना और माना) और इसमाआ (मेरी सुनो) और (राअना) के एवज़ उनजुरना (हमपर निगाह रख) कहते तो उनके हक़ में कहीं बेहतर होता और बिल्कुल सीधी बात थी मगर उनपर तो उनके कुफ़्र की वजह से ख़ुदा की फ़िटकार है
47يَا أَيُّهَا الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ آمِنُوا بِمَا نَزَّلْنَا مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَكُم مِّن قَبْلِ أَن نَّطْمِسَ وُجُوهًا فَنَرُدَّهَا عَلَىٰ أَدْبَارِهَا أَوْ نَلْعَنَهُمْ كَمَا لَعَنَّا أَصْحَابَ السَّبْتِ ۚ وَكَانَ أَمْرُ اللَّهِ مَفْعُولًا
पस उनमें से चन्द लोगों के सिवा और लोग ईमान ही न लाएंगे ऐ अहले किताब जो (किताब) हमने नाज़िल की है और उस (किताब) की भी तस्दीक़ करती है जो तुम्हारे पास है उस पर ईमान लाओ मगर क़ब्ल इसके कि हम कुछ लोगों के चेहरे बिगाड़कर उनके पुश्त की तरफ़ फेर दें या जिस तरह हमने असहाबे सबत (हफ्ते वालों) पर फिटकार बरसायी वैसी ही फिटकार उनपर भी करें
अन-निसाकुरान सूची
176आयत
मदनीअवतरण स्थान
45आयत

अनुवाद — अन-निसा 45

सूरा अन-निसा आयत 45 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और ख़ुदा तुम्हारे दुशमनों से ख़ूब वाक़िफ़ है और दोस्ती…

सूरा आयत 45/176 — सूरा अन-निसा النساء (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अन-निसा सुनें, सूरा अन-निसा अनुवाद, सूरा अन-निसा mp3, सूरा अन-निसा pdf. आयत 43–47. हिंदी अर्थ: اردو.





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Monday, September 28, 2026

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