अश-शूरा · 41/53
अनुवाद उच्चारण — अश-शूरा
وَلَمَنِ انتَصَرَ بَعْدَ ظُلْمِهِ فَأُولَٰئِكَ مَا عَلَيْهِم مِّن سَبِيلٍ ۝٤١
Wa lamanin tasara ba`da zulmihee fa ulaaa`ika maa `alaihim min sabeel
📖 हिंदी अर्थ
और जिस पर ज़ुल्म हुआ हो अगर वह उसके बाद इन्तेक़ाम ले तो ऐसे लोगों पर कोई इल्ज़ाम नहीं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • انتَصَرَ: बदला लेना, प्रतिशोध करना
  • ظُلْمِهِ: उस पर किए गए अत्याचार (ज़ुल्म) के बाद
  • سَبِيلٍ: कोई रास्ता, कोई दोष, कोई पकड़ या मुख़ालफ़त का रास्ता

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में उन लोगों के बारे में बता रहे हैं जिन पर ज़ुल्म किया गया हो और वे उस ज़ुल्म के बाद अपना हक़ लेने के लिए खड़े हों। यहाँ अल्लाह फ़रमा रहा है कि जो शख़्स ज़ुल्म का शिकार होने के बाद अपने ज़ालिम से बदला लेता है या अपना हक़ वापस लेता है, तो ऐसे लोगों पर कोई दोष नहीं है, न ही उन्हें मुज़्मिर (दोषी) ठहराया जा सकता है और न ही उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की जा सकती है।

यानी जिस इंसान पर ज़ुल्म हुआ हो, उसे पूरा हक़ है कि वह अपने ज़ालिम से अपना हक़ ले, बशर्ते कि वह उतना ही ले जितना उस पर ज़ुल्म हुआ था, उससे ज़्यादा नहीं। यह अल्लाह का इंसाफ़ है कि उसने मज़लूम (अत्याचारित) को यह अधिकार दिया है कि वह अपनी इज़्ज़त और हक़ की हिफ़ाज़त करे।

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम कमज़ोरों और मज़लूमों का दीन है। इस्लाम में इंसाफ़ और अदल का बोलबाला है। अल्लाह तआला ने मज़लूम को यह ताक़त दी है कि वह चुप न रहे, बल्कि अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाए। लेकिन साथ ही यह भी याद रखे कि बदला लेते वक़्त भी इंसाफ़ की हद से आगे न बढ़े, क्योंकि अगला क़दम अल्लाह ने माफ़ी और सब्र का बताया है जो और भी बेहतर है।

इस आयत से हमें यह पैग़ाम मिलता है कि हम अपने हक़ के लिए खड़े हों, ज़ुल्म के सामने चुप न रहें, लेकिन साथ ही दिल में यह भी रखें कि माफ़ करने वाला और सब्र करने वाला अल्लाह के यहाँ बहुत बड़ा अज्र पाता है। यही इस्लाम का सुनहरा तालीम है — एक तरफ़ इंसाफ़, दूसरी तरफ़ रहमत।

🎧 सुनें

📜 आयत 39-43 — अश-शूरा

39وَالَّذِينَ إِذَا أَصَابَهُمُ الْبَغْيُ هُمْ يَنتَصِرُونَ
और (वह ऐसे हैं) कि जब उन पर किसी किस्म की ज्यादती की जाती है तो बस वाजिबी बदला ले लेते हैं
40وَجَزَاءُ سَيِّئَةٍ سَيِّئَةٌ مِّثْلُهَا ۖ فَمَنْ عَفَا وَأَصْلَحَ فَأَجْرُهُ عَلَى اللَّهِ ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِمِينَ
और बुराई का बदला तो वैसी ही बुराई है उस पर भी जो शख्स माफ कर दे और (मामले की) इसलाह कर दें तो इसका सवाब ख़ुदा के ज़िम्मे है बेशक वह ज़ुल्म करने वालों को पसन्द नहीं करता
41وَلَمَنِ انتَصَرَ بَعْدَ ظُلْمِهِ فَأُولَٰئِكَ مَا عَلَيْهِم مِّن سَبِيلٍ
और जिस पर ज़ुल्म हुआ हो अगर वह उसके बाद इन्तेक़ाम ले तो ऐसे लोगों पर कोई इल्ज़ाम नहीं
42إِنَّمَا السَّبِيلُ عَلَى الَّذِينَ يَظْلِمُونَ النَّاسَ وَيَبْغُونَ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ ۚ أُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
इल्ज़ाम तो बस उन्हीं लोगों पर होगा जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और रूए ज़मीन में नाहक़ ज्यादतियाँ करते फिरते हैं उन्हीं लोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब है
43وَلَمَن صَبَرَ وَغَفَرَ إِنَّ ذَٰلِكَ لَمِنْ عَزْمِ الْأُمُورِ
और जो सब्र करे और कुसूर माफ़ कर दे तो बेशक ये बड़े हौसले के काम हैं
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अनुवाद — अश-शूरा 41

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Tuesday, August 18, 2026

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