अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- سَیِّئَةٍ (सैय्यिह): बुराई, क्षति या अपराध।
- مِّثْلُهَا (मिस्लुहा): उसी के बराबर, उसी के समान।
- عَفَا (अफ़ा): क्षमा कर दिया, दरगुज़र कर दिया।
- أَصْلَحَ (अस्लहा): सुधार किया, आपसी मेल-मिलाप और भलाई स्थापित की।
- أَجْرُهُ (अज्रुहु): उसका प्रतिफल, उसका बदला।
- الظَّالِمِینَ (ज़ालिमीन): अत्याचारी, जो दूसरों पर ज़ुल्म करते हैं।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में न्याय और दया के बीच संतुलन सिखाते हैं। यह आयत बताती है कि अगर किसी व्यक्ति के साथ बुराई की जाए, तो उसे बदला लेने का अधिकार है, लेकिन वह बदला उसी बुराई के बराबर होना चाहिए—न अधिक, न अत्याचार के साथ। इस्लाम किसी को भी ज़्यादती या सीमा से आगे बढ़ने की इजाज़त नहीं देता। यह न्याय है।
लेकिन इसके बाद अल्लाह तआला एक ऊँचे और बेहतर रास्ते की ओर इशारा करते हैं—वह है क्षमा और सुधार का रास्ता। जो व्यक्ति अपने ऊपर ज़ुल्म करने वाले को माफ कर दे, और साथ ही आपसी संबंधों को सुधारने की कोशिश करे—यानी दिल से कड़वाहट निकालकर भलाई और मेल-मिलाप का रास्ता अपनाए—तो उसका इनाम अल्लाह के ज़िम्मे है। यह कोई साधारण इनाम नहीं है; यह अल्लाह की ओर से एक महान प्रतिफल है, जिसकी कोई सीमा नहीं। अल्लाह ने इसे "अपने ज़िम्मे" कहकर इसकी अहमियत और बड़ाई को दर्शाया है—यानी जब अल्लाह खुद किसी चीज़ को अपनी ज़िम्मेदारी बनाए, तो समझ लीजिए कि वह कितनी बड़ी नेमत है।
इसके बाद अल्लाह फरमाता है कि वह ज़ालिमों को पसंद नहीं करता। यहाँ दो तरह के लोग ज़ालिम कहलाते हैं: एक वे जो पहले बुराई शुरू करते हैं और दूसरे वे जो बदला लेते समय हद से आगे बढ़ जाते हैं। अल्लाह ऐसे लोगों से नफरत करता है और उन्हें पसंद नहीं करता।
दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):
यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ इंसाफ़ (न्याय) का ही नहीं, बल्कि एहसान (भलाई) और दरगुज़र (क्षमा) का भी धर्म है। अल्लाह तआला हमें बताना चाहते हैं कि अगर आप न्याय चाहते हैं, तो वह आपका हक़ है, लेकिन अगर आप क्षमा कर दें, तो यह आपके लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में बेहतर है। क्षमा करने वाला व्यक्ति दिल से बड़ा होता है, और अल्लाह उसकी इस बड़ाई को कभी बेकार नहीं जाने देता। उसका अज्र अल्लाह के पास सुरक्षित है—ऐसा अज्र जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता।
इसलिए, जब कोई आपके साथ बुराई करे, तो पहले अपने दिल को शांत करें और सोचें—क्या मैं बदला लेकर खुश रहूँगा, या माफ करके अल्लाह की रज़ा पाऊँगा? याद रखिए, माफ करना कमज़ोरी नहीं, बल्कि ईमान की ताक़त है। अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो दूसरों को माफ करते हैं और आपसी संबंधों को सुधारते हैं। यही वह रास्ता है जो आपको अल्लाह के करीब लाता है और आपके दिल को सुकून देता है।
📜 आयत 38-42 — अश-शूरा
अनुवाद — अश-शूरा 40
सूरा अश-शूरा आयत 40 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और बुराई का बदला तो वैसी ही बुराई है उस…सूरा आयत 40/53 — अश-शूरा الشورى (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अश-शूरा सुनें, अश-शूरा अनुवाद, अश-शूरा mp3, अश-शूरा pdf. आयत 38–42. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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