अश-शूरा · 40/53
अनुवाद उच्चारण — सूरा अश-शूरा
وَجَزَاءُ سَيِّئَةٍ سَيِّئَةٌ مِّثْلُهَا ۖ فَمَنْ عَفَا وَأَصْلَحَ فَأَجْرُهُ عَلَى اللَّهِ ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِمِينَ ۝٤٠
Wa jazaaa`u saiyi`atin saiyi`tum misluha faman `afaa wa aslaha fa ajruhoo `alal laah; innahoo laa yuhibbuz zaalimeen
📖 हिंदी अर्थ
और बुराई का बदला तो वैसी ही बुराई है उस पर भी जो शख्स माफ कर दे और (मामले की) इसलाह कर दें तो इसका सवाब ख़ुदा के ज़िम्मे है बेशक वह ज़ुल्म करने वालों को पसन्द नहीं करता

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
0:00
0:00
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سَیِّئَةٍ (सैय्यिह): बुराई, क्षति या अपराध।
  • مِّثْلُهَا (मिस्लुहा): उसी के बराबर, उसी के समान।
  • عَفَا (अफ़ा): क्षमा कर दिया, दरगुज़र कर दिया।
  • أَصْلَحَ (अस्लहा): सुधार किया, आपसी मेल-मिलाप और भलाई स्थापित की।
  • أَجْرُهُ (अज्रुहु): उसका प्रतिफल, उसका बदला।
  • الظَّالِمِینَ (ज़ालिमीन): अत्याचारी, जो दूसरों पर ज़ुल्म करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में न्याय और दया के बीच संतुलन सिखाते हैं। यह आयत बताती है कि अगर किसी व्यक्ति के साथ बुराई की जाए, तो उसे बदला लेने का अधिकार है, लेकिन वह बदला उसी बुराई के बराबर होना चाहिए—न अधिक, न अत्याचार के साथ। इस्लाम किसी को भी ज़्यादती या सीमा से आगे बढ़ने की इजाज़त नहीं देता। यह न्याय है।

लेकिन इसके बाद अल्लाह तआला एक ऊँचे और बेहतर रास्ते की ओर इशारा करते हैं—वह है क्षमा और सुधार का रास्ता। जो व्यक्ति अपने ऊपर ज़ुल्म करने वाले को माफ कर दे, और साथ ही आपसी संबंधों को सुधारने की कोशिश करे—यानी दिल से कड़वाहट निकालकर भलाई और मेल-मिलाप का रास्ता अपनाए—तो उसका इनाम अल्लाह के ज़िम्मे है। यह कोई साधारण इनाम नहीं है; यह अल्लाह की ओर से एक महान प्रतिफल है, जिसकी कोई सीमा नहीं। अल्लाह ने इसे "अपने ज़िम्मे" कहकर इसकी अहमियत और बड़ाई को दर्शाया है—यानी जब अल्लाह खुद किसी चीज़ को अपनी ज़िम्मेदारी बनाए, तो समझ लीजिए कि वह कितनी बड़ी नेमत है।

इसके बाद अल्लाह फरमाता है कि वह ज़ालिमों को पसंद नहीं करता। यहाँ दो तरह के लोग ज़ालिम कहलाते हैं: एक वे जो पहले बुराई शुरू करते हैं और दूसरे वे जो बदला लेते समय हद से आगे बढ़ जाते हैं। अल्लाह ऐसे लोगों से नफरत करता है और उन्हें पसंद नहीं करता।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ इंसाफ़ (न्याय) का ही नहीं, बल्कि एहसान (भलाई) और दरगुज़र (क्षमा) का भी धर्म है। अल्लाह तआला हमें बताना चाहते हैं कि अगर आप न्याय चाहते हैं, तो वह आपका हक़ है, लेकिन अगर आप क्षमा कर दें, तो यह आपके लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में बेहतर है। क्षमा करने वाला व्यक्ति दिल से बड़ा होता है, और अल्लाह उसकी इस बड़ाई को कभी बेकार नहीं जाने देता। उसका अज्र अल्लाह के पास सुरक्षित है—ऐसा अज्र जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता।

इसलिए, जब कोई आपके साथ बुराई करे, तो पहले अपने दिल को शांत करें और सोचें—क्या मैं बदला लेकर खुश रहूँगा, या माफ करके अल्लाह की रज़ा पाऊँगा? याद रखिए, माफ करना कमज़ोरी नहीं, बल्कि ईमान की ताक़त है। अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो दूसरों को माफ करते हैं और आपसी संबंधों को सुधारते हैं। यही वह रास्ता है जो आपको अल्लाह के करीब लाता है और आपके दिल को सुकून देता है।



📜 आयत 38-42 — सूरा अश-शूरा

38وَالَّذِينَ اسْتَجَابُوا لِرَبِّهِمْ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَأَمْرُهُمْ شُورَىٰ بَيْنَهُمْ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
और जो अपने परवरदिगार का हुक्म मानते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं और उनके कुल काम आपस के मशवरे से होते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (राहे ख़ुदा में) ख़र्च करते हैं
39وَالَّذِينَ إِذَا أَصَابَهُمُ الْبَغْيُ هُمْ يَنتَصِرُونَ
और (वह ऐसे हैं) कि जब उन पर किसी किस्म की ज्यादती की जाती है तो बस वाजिबी बदला ले लेते हैं
40وَجَزَاءُ سَيِّئَةٍ سَيِّئَةٌ مِّثْلُهَا ۖ فَمَنْ عَفَا وَأَصْلَحَ فَأَجْرُهُ عَلَى اللَّهِ ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِمِينَ
और बुराई का बदला तो वैसी ही बुराई है उस पर भी जो शख्स माफ कर दे और (मामले की) इसलाह कर दें तो इसका सवाब ख़ुदा के ज़िम्मे है बेशक वह ज़ुल्म करने वालों को पसन्द नहीं करता
41وَلَمَنِ انتَصَرَ بَعْدَ ظُلْمِهِ فَأُولَٰئِكَ مَا عَلَيْهِم مِّن سَبِيلٍ
और जिस पर ज़ुल्म हुआ हो अगर वह उसके बाद इन्तेक़ाम ले तो ऐसे लोगों पर कोई इल्ज़ाम नहीं
42إِنَّمَا السَّبِيلُ عَلَى الَّذِينَ يَظْلِمُونَ النَّاسَ وَيَبْغُونَ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ ۚ أُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
इल्ज़ाम तो बस उन्हीं लोगों पर होगा जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और रूए ज़मीन में नाहक़ ज्यादतियाँ करते फिरते हैं उन्हीं लोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब है
अश-शूराकुरान सूची
53आयत
मक्कीअवतरण स्थान
40आयत

अनुवाद — अश-शूरा 40

सूरा अश-शूरा आयत 40 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और बुराई का बदला तो वैसी ही बुराई है उस…

सूरा आयत 40/53 — सूरा अश-शूरा الشورى (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अश-शूरा सुनें, सूरा अश-शूरा अनुवाद, सूरा अश-शूरा mp3, सूरा अश-शूरा pdf. आयत 38–42. हिंदी अर्थ: اردو.





पवित्र क़ुरआन


Saturday, October 3, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए