अल-हुजुरात · 1/18
अनुवाद उच्चारण — अल-हुजुरात
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيِ اللَّهِ وَرَسُولِهِ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ۝١
Yaa ayyuhal lazeena aamanoo la tuqaddimoo baina yada yil laahi wa Rasoolihee wattaqul laah; innal laaha samee`un `Aleem
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों ख़ुदा और उसके रसूल के सामने किसी बात में आगे न बढ़ जाया करो और ख़ुदा से डरते रहो बेशक ख़ुदा बड़ा सुनने वाला वाक़िफ़कार है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لَا تُقَدِّمُوا – आगे न बढ़ो, जल्दबाज़ी मत करो
  • بَيْنَ يَدَيِ – सामने, आगे
  • وَاتَّقُوا – डरो, परहेज़गारी अपनाओ
  • سَمِيعٌ – सब कुछ सुनने वाला
  • عَلِيمٌ – सब कुछ जानने वाला

तफ़सीर:

ऐ ईमान लाने वालों! अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के आगे जल्दबाज़ी मत करो। यानी किसी भी मामले में अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के फ़ैसले से पहले अपनी राय, अपनी बात या अपना फ़ैसला पेश न करो। दीन के मामलों में कोई नया क़ानून, नया तरीक़ा या नई रस्म न बनाओ, क्योंकि दीन का हुक्म सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल ﷺ का है। जो इंसान अपनी तरफ़ से दीन में नई चीज़ें जोड़ता है या अल्लाह के हुक्म से पहले अपनी राय चलाता है, वह हद से आगे बढ़ जाता है।

यह आयत मोमिनों को सिखाती है कि उन्हें हर मामले में अल्लाह और रसूल ﷺ की इताअत (आज्ञाकारिता) को सबसे आगे रखना चाहिए। किसी भी काम को करने से पहले यह देखना चाहिए कि क्या अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने उसकी इजाज़त दी है या नहीं। अगर किसी काम में अल्लाह और रसूल ﷺ का हुक्म सामने आ जाए, तो अपनी राय, अपनी पसंद या अपनी इच्छा को पीछे छोड़ देना चाहिए।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और अल्लाह से डरो" यानी अल्लाह के हुक्म की ख़िलाफ़वरी से बचो, उसकी नाफ़रमानी से डरो। अपनी ज़ुबान और अपने अमल में अल्लाह से डरते हुए रहो, ताकि तुम कभी उसकी नाराज़गी का शिकार न हो जाओ।

आख़िर में अल्लाह फ़रमाता है: "बेशक अल्लाह सब कुछ सुनने वाला और सब कुछ जानने वाला है" यानी अल्लाह तुम्हारी हर बात सुनता है, चाहे वह ज़ुबान से निकले या दिल में हो। वह तुम्हारे हर अमल, हर नीयत और हर हालत को जानता है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है। वह तुम्हारे अच्छे और बुरे हर काम का हिसाब लेगा और उसका बदला देगा।

दावती पहलू:

यह आयत मोमिन के लिए एक बहुत बड़ी तालीम है कि उसकी ज़िंदगी का हर पहलू अल्लाह और रसूल ﷺ की इताअत के ताबे हो। जब इंसान अपने हर मामले में अल्लाह और उसके रसूल ﷺ को आगे रखता है, तो उसकी ज़िंदगी में बरकत आती है, उसका दिल सुकून पाता है और उसे अल्लाह की मदद और हिफ़ाज़त हासिल होती है। यही रास्ता कामयाबी का है — कि हम अपनी राय को अल्लाह की रज़ा पर क़ुर्बान कर दें, क्योंकि अल्लाह ही सबसे बेहतर जानता है कि हमारे लिए क्या बेहतर है। जो लोग अल्लाह और रसूल ﷺ के आगे सर झुकाते हैं, अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत में इज़्ज़त देता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 1-3 — अल-हुजुरात

1يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيِ اللَّهِ وَرَسُولِهِ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
ऐ ईमानदारों ख़ुदा और उसके रसूल के सामने किसी बात में आगे न बढ़ जाया करो और ख़ुदा से डरते रहो बेशक ख़ुदा बड़ा सुनने वाला वाक़िफ़कार है
2يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ
ऐ ईमानदारों (बोलने में) अपनी आवाज़े पैग़म्बर की आवाज़ से ऊँची न किया करो और जिस तरह तुम आपस में एक दूसरे से ज़ोर (ज़ोर) से बोला करते हो उनके रूबरू ज़ोर से न बोला करो (ऐसा न हो कि) तुम्हारा किया कराया सब अकारत हो जाए और तुमको ख़बर भी न हो
3إِنَّ الَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصْوَاتَهُمْ عِندَ رَسُولِ اللَّهِ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ امْتَحَنَ اللَّهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوَىٰ ۚ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ
बेशक जो लोग रसूले ख़ुदा के सामने अपनी आवाज़ें धीमी कर लिया करते हैं यही लोग हैं जिनके दिलों को ख़ुदा ने परहेज़गारी के लिए जाँच लिया है उनके लिए (आख़ेरत में) बख़्शिस और बड़ा अज्र है
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अनुवाद — अल-हुजुरात 1

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Tuesday, August 18, 2026

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