अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- قَفَّيْنَا: हमने पीछे-पीछे भेजा, अनुगमन कराया।
- آثَارِهِم: उनके निशानों पर (अर्थात् पिछले पैग़म्बरों के मार्ग पर)।
- رَأْفَةً: अत्यधिक दया, कोमलता।
- رَحْمَةً: करुणा, सहानुभूति।
- رَهْبَانِيَّةً: संन्यास, दुनिया से किनारा करके इबादत में मशगूल होना (जो ईसाइयों ने स्वयं गढ़ लिया था)।
- ابْتَدَعُوهَا: उन्होंने इसे स्वयं नया रूप देकर अपने ऊपर लाज़िम कर लिया।
- مَا كَتَبْنَاهَا عَلَيْهِمْ: हमने उन पर इसे फ़र्ज़ नहीं किया था।
- رَعَوْهَا: उन्होंने इसका पालन किया।
- فَاسِقُونَ: आज्ञा से निकल जाने वाले, अवज्ञाकारी।
तफ़सीर:
फिर हमने उन (नूह और इब्राहीम अलैहिस्सलाम) के निशानों पर अपने रसूलों को लगातार भेजा, और उन्हीं के सिलसिले में ईसा इब्ने मरियम (अलैहिस्सलाम) को भेजा। हमने उन्हें इंजील की किताब अता की, और उनके अनुयायियों के दिलों में नरमी, दया और करुणा पैदा की, जिससे वे आपस में मोहब्बत और रहमत के साथ रहते थे। लेकिन उन्होंने अपनी तरफ़ से रहबानियत (संन्यास और दुनिया से अलग होकर अत्यधिक इबादत) गढ़ ली — यह कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जो हमने उन पर फ़र्ज़ की हो, बल्कि उन्होंने खुद इसे अल्लाह की रज़ा हासिल करने की ख्वाहिश में इख्तियार किया। मगर अफ़सोस! उन्होंने इसका सही पालन नहीं किया, न ही इसे वैसा हक़ अदा किया जैसा अदा करना चाहिए था। चुनाँचे हमने उनमें से उन लोगों को, जो सच्चे दिल से ईमान लाए (अल्लाह और उसके रसूलों पर), उनका पूरा अज्र अता किया। और उनमें से बहुत से लोग आज्ञा से निकल जाने वाले (फ़ासिक़) हो गए, जिन्होंने हक़ को ठुकराया और अपनी मनमानी पर चले।
दावती पहलू:
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला ने कभी भी इंसानों पर ऐसी मुश्किलें फ़र्ज़ नहीं कीं जो उनकी ताक़त से बाहर हों। दीन हमेशा आसानी और मध्यमार्ग पर आधारित रहा है। ईसाइयों ने खुद अपने ऊपर सख्तियाँ लाद लीं, फिर उन्हें पूरा भी नहीं कर सके। यह हमारे लिए एक बड़ी सबक़ है कि इस्लाम में न तो दुनिया को छोड़कर भागना है, न ही दुनिया में डूब जाना है — बल्कि दुनिया और आख़िरत के बीच संतुलन रखना है। अल्लाह हमसे सिर्फ़ इतना चाहता है कि हम उसकी रज़ा के लिए ईमान लाएँ, उसके रसूल की पैरवी करें, और अपने दिलों में रहमत और मोहब्बत पैदा करें। यही वह रास्ता है जो हमें कामयाबी तक पहुँचाता है — न कि ज़ुल्म और ग़ुलू (अतिशयता) का रास्ता। आज हमें चाहिए कि हम अपने दिलों को नरमी, दया और आपसी भाईचारे से भरें, क्योंकि यही अल्लाह की पसंदीदा आदत है। और याद रखें, अल्लाह उन्हीं को अज्र देता है जो सच्चे दिल से ईमान लाते हैं और अपने अमल को उसकी रज़ा के मुताबिक़ बनाते हैं।
📜 आयत 25-29 — अल-हदीद
अनुवाद — अल-हदीद 27
सूरा अल-हदीद आयत 27 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : फिर उनके पीछे ही उनके क़दम ब क़दम अपने और…सूरा आयत 27/29 — अल-हदीद الحديد (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-हदीद सुनें, अल-हदीद अनुवाद, अल-हदीद mp3, अल-हदीद pdf. आयत 25–29. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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