अल-हदीद · 26/29
अनुवाद उच्चारण — अल-हदीद
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا وَإِبْرَاهِيمَ وَجَعَلْنَا فِي ذُرِّيَّتِهِمَا النُّبُوَّةَ وَالْكِتَابَ ۖ فَمِنْهُم مُّهْتَدٍ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ ۝٢٦
Wa laqad arsalnaa Noohanw wa Ibraaheema wa ja`alnaa fee zurriyyatihiman nubuwwata wal Kitaaba faminhum muhtad; wa kaseerum minhum faasiqoon
📖 हिंदी अर्थ
और बेशक हम ही ने नूह और इबराहीम को (पैग़म्बर बनाकर) भेजा और उनही दोनों की औलाद में नबूवत और किताब मुक़र्रर की तो उनमें के बाज़ हिदायत याफ्ता हैं और उन के बहुतेरे बदकार हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • النُّبُوَّةَ: नबुव्वत (पैग़म्बरी), यानी अल्लाह का पैग़ाम लोगों तक पहुँचाने का मक़ाम।
  • الْكِتَابَ: किताब, यानी आसमानी किताबें (तौरात, ज़बूर, इंजील, क़ुरआन)।
  • مُّهْتَدٍ: हिदायत पाने वाला, सीधे रास्ते पर चलने वाला।
  • فَاسِقُونَ: फ़ासिक़, यानी अल्लाह की आज्ञा से निकल जाने वाले, गुनाहगार।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में अपनी बड़ी रहमत और एहसान का ज़िक्र फ़रमाया है। उसने हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) और हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को दुनिया की तरफ़ रसूल बनाकर भेजा। ये दोनों पैग़म्बर उन शुरुआती रसूलों में से थे जिन्होंने तौहीद (एक अल्लाह की इबादत) का पैग़ाम इंसानों तक पहुँचाया। अल्लाह ने इन दोनों की संतान को ख़ास शरफ़ अता किया — उनकी नस्ल में नबुव्वत (पैग़म्बरी) और आसमानी किताबें रखीं। यानी इन्हीं की औलाद में से अधिकतर पैग़म्बर आए और तौरात, ज़बूर, इंजील और क़ुरआन जैसी किताबें इन्हीं की नस्ल में उतारी गईं। यह अल्लाह का बहुत बड़ा एहसान था कि उसने हिदायत का सिलसिला इन्हीं की संतान में जारी रखा।

फिर अल्लाह ने बताया कि इन दोनों पैग़म्बरों की संतान में से कुछ लोग हिदायत पाने वाले थे — यानी उन्होंने अल्लाह के दीन को क़बूल किया और सीधे रास्ते पर चले। लेकिन उनमें से बहुत से लोग फ़ासिक़ थे — यानी अल्लाह की आज्ञा से निकल गए, उसकी इबादत छोड़ दी और गुनाहों में पड़ गए। यह बात हमें सिखाती है कि किसी नेक इंसान की संतान होना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि हर इंसान को ख़ुद अपनी मेहनत से हिदायत हासिल करनी होती है। नस्ल या ख़ानदान किसी को जन्नत में नहीं पहुँचा सकता, जब तक कि वह ख़ुद अल्लाह की इबादत न करे और उसके हुक्मों पर न चले।

दावती पहलू:

यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह ने इंसानों की हिदायत के लिए हर ज़माने में पैग़म्बर और किताबें भेजीं। यह अल्लाह की रहमत है कि उसने हमें क़ुरआन जैसी आख़िरी किताब और हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जैसे आख़िरी रसूल अता किए। हमें चाहिए कि इस नेमत की क़द्र करें, क़ुरआन को पढ़ें, समझें और उस पर अमल करें। अल्लाह ने हिदायत का रास्ता हर इंसान के लिए खोल दिया है — बस ज़रूरत है सच्चे दिल से उसकी तरफ़ रुजू करने की। आज हमें अपने अंदर झाँककर देखना चाहिए कि हम किस क़िस्म के लोगों में हैं — हिदायत पाने वालों में या फ़ासिक़ों में? अल्लाह हमें सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 24-28 — अल-हदीद

24الَّذِينَ يَبْخَلُونَ وَيَأْمُرُونَ النَّاسَ بِالْبُخْلِ ۗ وَمَن يَتَوَلَّ فَإِنَّ اللَّهَ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَمِيدُ
जो ख़ुद भी बुख्ल करते हैं और दूसरे लोगों को भी बुख्ल करना सिखाते हैं और जो शख़्श (इन बातों से) रूगरदानी करे तो ख़ुदा भी बेपरवा सज़ावारे हम्दोसना है
25لَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلَنَا بِالْبَيِّنَاتِ وَأَنزَلْنَا مَعَهُمُ الْكِتَابَ وَالْمِيزَانَ لِيَقُومَ النَّاسُ بِالْقِسْطِ ۖ وَأَنزَلْنَا الْحَدِيدَ فِيهِ بَأْسٌ شَدِيدٌ وَمَنَافِعُ لِلنَّاسِ وَلِيَعْلَمَ اللَّهُ مَن يَنصُرُهُ وَرُسُلَهُ بِالْغَيْبِ ۚ إِنَّ اللَّهَ قَوِيٌّ عَزِيزٌ
हमने यक़ीनन अपने पैग़म्बरों को वाज़े व रौशन मोजिज़े देकर भेजा और उनके साथ किताब और (इन्साफ़ की) तराज़ू नाज़िल किया ताकि लोग इन्साफ़ पर क़ायम रहे और हम ही ने लोहे को नाज़िल किया जिसके ज़रिए से सख्त लड़ाई और लोगों के बहुत से नफे (की बातें) हैं और ताकि ख़ुदा देख ले कि बेदेखे भाले ख़ुदा और उसके रसूलों की कौन मदद करता है बेशक ख़ुदा बहुत ज़बरदस्त ग़ालिब है
26وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا وَإِبْرَاهِيمَ وَجَعَلْنَا فِي ذُرِّيَّتِهِمَا النُّبُوَّةَ وَالْكِتَابَ ۖ فَمِنْهُم مُّهْتَدٍ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ
और बेशक हम ही ने नूह और इबराहीम को (पैग़म्बर बनाकर) भेजा और उनही दोनों की औलाद में नबूवत और किताब मुक़र्रर की तो उनमें के बाज़ हिदायत याफ्ता हैं और उन के बहुतेरे बदकार हैं
27ثُمَّ قَفَّيْنَا عَلَىٰ آثَارِهِم بِرُسُلِنَا وَقَفَّيْنَا بِعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ وَآتَيْنَاهُ الْإِنجِيلَ وَجَعَلْنَا فِي قُلُوبِ الَّذِينَ اتَّبَعُوهُ رَأْفَةً وَرَحْمَةً وَرَهْبَانِيَّةً ابْتَدَعُوهَا مَا كَتَبْنَاهَا عَلَيْهِمْ إِلَّا ابْتِغَاءَ رِضْوَانِ اللَّهِ فَمَا رَعَوْهَا حَقَّ رِعَايَتِهَا ۖ فَآتَيْنَا الَّذِينَ آمَنُوا مِنْهُمْ أَجْرَهُمْ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ
फिर उनके पीछे ही उनके क़दम ब क़दम अपने और पैग़म्बर भेजे और उनके पीछे मरियम के बेटे ईसा को भेजा और उनको इन्जील अता की और जिन लोगों ने उनकी पैरवी की उनके दिलों में यफ़क्क़त और मेहरबानी डाल दी और रहबानियत (लज्ज़ात से किनाराकशी) उन लोगों ने ख़ुद एक नयी बात निकाली थी हमने उनको उसका हुक्म नहीं दिया था मगर (उन लोगों ने) ख़ुदा की ख़ुशनूदी हासिल करने की ग़रज़ से (ख़ुद ईजाद किया) तो उसको भी जैसा बनाना चाहिए था न बना सके तो जो लोग उनमें से ईमान लाए उनको हमने उनका अज्र दिया उनमें के बहुतेरे तो बदकार ही हैं
28يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَآمِنُوا بِرَسُولِهِ يُؤْتِكُمْ كِفْلَيْنِ مِن رَّحْمَتِهِ وَيَجْعَل لَّكُمْ نُورًا تَمْشُونَ بِهِ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
ऐ ईमानदारों ख़ुदा से डरो और उसके रसूल (मोहम्मद) पर ईमान लाओ तो ख़ुदा तुमको अपनी रहमत के दो हिस्से अज्र अता फरमाएगा और तुमको ऐसा नूर इनायत फ़रमाएगा जिस (की रौशनी) में तुम चलोगे और तुमको बख्श भी देगा और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
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अनुवाद — अल-हदीद 26

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Tuesday, August 18, 2026

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