अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- الْإِبِلِ: ऊँट।
- الْبَقَرِ: गाय।
- شُهَدَاءَ: उपस्थित होना, गवाह होना।
- افْتَرَى: झूठ गढ़ना, मनगढ़ंत बात बनाना।
- لِيُضِلَّ: ताकि भटका दे।
तफ़सीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला आठ प्रकार के नर-मादा जानवरों का उल्लेख कर रहा है, जिनमें से चार का ज़िक्र पिछली आयत में हुआ (भेड़ और बकरी), और अब शेष चार का ज़िक्र किया जा रहा है—दो ऊँट (नर और मादा) और दो गाय (नर और मादा)। अल्लाह तआला मुशरिकों से कहता है: "क्या अल्लाह ने इनमें से नर को हराम किया है या मादा को? या उस मादा के पेट में जो बच्चा होता है उसे हराम किया है?" यानी जब अल्लाह ने इनमें से किसी को भी हराम नहीं किया, तो तुम किस आधार पर कहते हो कि अमुक जानवर हराम है?
फिर अल्लाह उनसे पूछता है: "क्या तुम उस समय उपस्थित थे जब अल्लाह ने तुम्हें इन चीज़ों के हराम होने का आदेश दिया था?" यह एक अलंकारिक प्रश्न है, जिसका उद्देश्य उन्हें अज्ञानी और झूठा साबित करना है। यानी तुम्हारे पास न तो कोई वही (प्रकाशना) है, न कोई स्पष्ट प्रमाण, बल्कि तुम केवल अपनी मनगढ़ंत बातों से अल्लाह पर झूठ थोपते हो।
इसके बाद अल्लाह तआला कहता है: "उस व्यक्ति से बड़ा ज़ालिम और कौन होगा जो अल्लाह पर झूठ गढ़े, ताकि लोगों को बिना ज्ञान के सही रास्ते से भटका दे?" यहाँ विशेष रूप से अम्र बिन लुहय्य (जो अरब में बुतपरस्ती की शुरुआत करने वाला था) और उसके अनुयायियों की ओर इशारा है, जिन्होंने अल्लाह पर झूठ बोलकर कुछ जानवरों को हराम ठहराया और लोगों को गुमराह किया। आयत के अंत में अल्लाह फरमाता है: "अल्लाह ऐसे ज़ालिमों को हिदायत नहीं देता" — यानी जो लोग जानबूझकर अल्लाह पर झूठ बोलते हैं और लोगों को गुमराह करते हैं, उन्हें अल्लाह सीधा रास्ता नहीं दिखाता।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
- इस आयत से स्पष्ट होता है कि हलाल और हराम का अधिकार केवल अल्लाह और उसके रसूल को है। किसी को यह अधिकार नहीं कि वह अपनी मर्ज़ी से किसी चीज़ को हराम या हलाल ठहराए।
- अल्लाह पर झूठ बोलना और उसके नाम पर मनगढ़ंत बातें गढ़ना सबसे बड़ा ज़ुल्म है, और यह कार्य व्यक्ति को अल्लाह की हिदायत से महरूम कर देता है।
- इस्लाम में ज्ञान और प्रमाण की अहमियत है। बिना ज्ञान के किसी भी धार्मिक मामले में बोलना या फतवा देना गुनाहे-कबीरा है।
- अल्लाह तआला अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है, उसने उनके लिए पवित्र और अच्छी चीज़ें हलाल कीं और गंदी चीज़ें हराम कीं। इसलिए हमें उसके फैसलों पर राज़ी रहना चाहिए और अपनी मर्ज़ी से किसी चीज़ को हराम या हलाल नहीं ठहराना चाहिए।
- यह आयत हमें सिखाती है कि दूसरों को गुमराह करना और उन्हें सच्चे रास्ते से भटकाना बहुत बड़ा पाप है, और ऐसे लोगों का अंजाम अल्लाह की रहमत से दूर होना है।
📜 आयत 142-146 — अल-अनआम
अनुवाद — अल-अनआम 144
सूरा अल-अनआम आयत 144 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : अगर तुम सच्चे हो तो ज़रा समझ के मुझे बताओ…सूरा आयत 144/165 — अल-अनआम الأنعام (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-अनआम सुनें, अल-अनआम अनुवाद, अल-अनआम mp3, अल-अनआम pdf. आयत 142–146. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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