अल-अनआम · 48/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
وَمَا نُرْسِلُ الْمُرْسَلِينَ إِلَّا مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ ۖ فَمَنْ آمَنَ وَأَصْلَحَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ۝٤٨
Wa maa nursilul mursaleena illaa mubashshireena wa munzireena faman aamana wa aslaha falaa khawfun `alaihim wa laa hum yahzanoon
📖 हिंदी अर्थ
और हम तो रसूलों को सिर्फ इस ग़रज़ से भेजते हैं कि (नेको को जन्नत की) खुशख़बरी दें और (बदो को अज़ाब जहन्नुम से) डराएं फिर जिसने ईमान कुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए तो ऐसे लोगों पर (क़यामत में) न कोई ख़ौफ होगा और न वह ग़मग़ीन होगें
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مُبَشِّرِينَ: शुभ सूचना देने वाले (अर्थात, आज्ञाकारियों को स्वर्ग की खुशखबरी सुनाने वाले)।
  • مُنذِرِينَ: डराने वाले (अर्थात, अवज्ञाकारियों को आग के अज़ाब से सावधान करने वाले)।
  • آمَنَ: ईमान लाया (अर्थात, अल्लाह और उसके रसूलों को सच्चे दिल से स्वीकार किया)।
  • أَصْلَحَ: सुधार किया (अर्थात, अपने आचरण और कर्मों को सही किया, जो बिगड़ा हुआ था उसे ठीक किया)।
  • خَوْفٌ: डर (यहाँ अर्थ है अल्लाह की यातना और उसकी पकड़ से डर)।
  • يَحْزَنُونَ: शोक करना, दुखी होना (यहाँ अर्थ है सांसारिक सुखों के छूट जाने पर पछतावा और अफसोस)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने रसूलों के भेजे जाने के उद्देश्य और उसके परिणाम को स्पष्ट कर रहा है। वह फ़रमाता है कि हम अपने रसूलों को केवल दो ही कार्यों के लिए भेजते हैं: एक, वे ईमानवालों और आज्ञाकारियों को उस स्थायी नेमत (स्वर्ग) की शुभ सूचना देते हैं जो कभी समाप्त नहीं होती; और दूसरे, वे काफ़िरों और अवज्ञाकारियों को हमारे कठोर अज़ाब से डराते हैं। यही रसूलों की मिशनरी ज़िम्मेदारी है — खुशखबरी और चेतावनी।

इसके बाद अल्लाह फ़रमाता है कि जो व्यक्ति इन रसूलों पर ईमान लाया और अपने कर्मों को सुधार लिया — यानी अपने अंदर के बुरे गुणों को अच्छाई से बदल दिया, अपने कर्तव्यों को पूरा किया और अल्लाह की बताई हुई सीमाओं का पालन किया — तो ऐसे लोगों के लिए कोई डर नहीं है। वे न तो आख़िरत में अल्लाह की यातना से डरेंगे, और न ही उन्हें इस बात का शोक होगा कि उन्होंने दुनिया के कौन से सुख और लाभ खो दिए। क्योंकि उन्होंने दुनिया की अस्थायी चीज़ों को आख़िरत की स्थायी नेमतों के बदले में दे दिया, और यही सबसे बड़ी सफलता है।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह के रसूलों का आना पूरी मानवता के लिए रहमत है — वे लोगों को अंधकार से प्रकाश की ओर लाने के लिए आए, न कि उन्हें डराने या परेशान करने के लिए। उनका उद्देश्य हमेशा भलाई और मार्गदर्शन होता है।
  2. ईमान के साथ अच्छे कर्मों का होना आवश्यक है। केवल मुँह से ईमान का दावा करना काफ़ी नहीं है, बल्कि अपने जीवन को सुधारना और अच्छे कर्म करना भी ज़रूरी है। यही वास्तविक सफलता का मार्ग है।
  3. यह आयत मोमिनों को एक बड़ी खुशखबरी देती है कि उन्हें किसी बात का डर या शोक नहीं होगा। इससे मुसलमानों के दिलों में सुकून और आत्मविश्वास पैदा होता है कि अगर वे ईमान और अच्छे कर्मों पर स्थिर रहें, तो उनका अंजाम हमेशा बेहतर होगा।
  4. इस आयत से यह भी पता चलता है कि अल्लाह की रहमत उसके अज़ाब से पहले है — वह पहले खुशखबरी देता है, फिर डराता है। यह अल्लाह की दया और करुणा का प्रमाण है कि उसने लोगों को सीधा रास्ता दिखाने के लिए रसूल भेजे, ताकि कोई बहाना न बना सके।
🎧 सुनें

📜 आयत 46-50 — अल-अनआम

46قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِنْ أَخَذَ اللَّهُ سَمْعَكُمْ وَأَبْصَارَكُمْ وَخَتَمَ عَلَىٰ قُلُوبِكُم مَّنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُم بِهِ ۗ انظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ الْآيَاتِ ثُمَّ هُمْ يَصْدِفُونَ
(कि क़िस्सा पाक हुआ) (ऐ रसूल) उनसे पूछो तो कि क्या तुम ये समझते हो कि अगर ख़ुदा तुम्हारे कान और तुम्हारी ऑंखे लें ले और तुम्हारे दिलों पर मोहर कर दे तो ख़ुदा के सिवा और कौन मौजूद है जो (फिर) तुम्हें ये नेअमतें (वापस) दे (ऐ रसूल) देखो तो हम किस किस तरह अपनी दलीले बयान करते हैं इस पर भी वह लोग मुँह मोडे ज़ाते हैं
47قُلْ أَرَأَيْتَكُمْ إِنْ أَتَاكُمْ عَذَابُ اللَّهِ بَغْتَةً أَوْ جَهْرَةً هَلْ يُهْلَكُ إِلَّا الْقَوْمُ الظَّالِمُونَ
(ऐ रसूल) उनसे पूछो कि क्या तुम ये समझते हो कि अगर तुम्हारे सर पर ख़ुदा का अज़ाब बेख़बरी में या जानकारी में आ जाए तो क्या गुनाहगारों के सिवा और लोग भी हलाक़ किए जाएंगें (हरगिज़ नहीं)
48وَمَا نُرْسِلُ الْمُرْسَلِينَ إِلَّا مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ ۖ فَمَنْ آمَنَ وَأَصْلَحَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
और हम तो रसूलों को सिर्फ इस ग़रज़ से भेजते हैं कि (नेको को जन्नत की) खुशख़बरी दें और (बदो को अज़ाब जहन्नुम से) डराएं फिर जिसने ईमान कुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए तो ऐसे लोगों पर (क़यामत में) न कोई ख़ौफ होगा और न वह ग़मग़ीन होगें
49وَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا يَمَسُّهُمُ الْعَذَابُ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ
और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया तो चूंकि बदकारी करते थे (हमारा) अज़ाब उनको पलट जाएगा
50قُل لَّا أَقُولُ لَكُمْ عِندِي خَزَائِنُ اللَّهِ وَلَا أَعْلَمُ الْغَيْبَ وَلَا أَقُولُ لَكُمْ إِنِّي مَلَكٌ ۖ إِنْ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰ إِلَيَّ ۚ قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الْأَعْمَىٰ وَالْبَصِيرُ ۚ أَفَلَا تَتَفَكَّرُونَ
(ऐ रसूल) उनसे कह दो कि मै तो ये नहीं कहता कि मेरे पास ख़ुदा के ख़ज़ाने हैं (कि ईमान लाने पर दे दूंगा) और न मै गैब के (कुल हालात) जानता हूँ और न मै तुमसे ये कहता हूँ कि मै फरिश्ता हूँ मै तो बस जो (ख़ुदा की तरफ से) मेरे पास वही की जाती है उसी का पाबन्द हूँ (उनसे पूछो तो) कि अन्धा और ऑंख वाला बराबर हो सकता है तो क्या तुम (इतना भी) नहीं सोचते
अल-अनआमकुरान सूची
165आयत
मक्कीRevelation
48आयत

अनुवाद — अल-अनआम 48

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Tuesday, August 18, 2026

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