नूह · 1/28
अनुवाद उच्चारण — नूह
إِنَّا أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ أَنْ أَنذِرْ قَوْمَكَ مِن قَبْلِ أَن يَأْتِيَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۝١
Innaaa arsalnaa Noohan ilaa qawmihee an anzir qawmaka min qabli any yaatiyahum `azaabun aleem
📖 हिंदी अर्थ
हमने नूह को उसकी क़ौम के पास (पैग़म्बर बनाकर) भेजा कि क़ब्ल उसके कि उनकी क़ौम पर दर्दनाक अज़ाब आए उनको उससे डराओ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • إِنَّا أَرْسَلْنَا – हमने भेजा
  • نُوحًا – नूह (अलैहिस्सलाम)
  • إِلَى قَوْمِهِ – उसकी क़ौम की ओर
  • أَنْ أَنذِرْ – कि तू डरा दे (चेतावनी दे)
  • مِن قَبْلِ – पहले
  • عَذَابٌ أَلِيمٌ – दर्दनाक अज़ाब

तफ़सीर:

अल्लाह तआला ने हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) को उनकी क़ौम की ओर रसूल बनाकर भेजा। यह एक बहुत बड़ी रहमत और मेहरबानी थी कि अल्लाह ने अज़ाब भेजने से पहले अपने नबी को भेजा, ताकि लोगों को चेतावनी मिल जाए और वे अपनी ग़लतियों से तौबा कर लें। अल्लाह ने हज़रत नूह से कहा: "अपनी क़ौम को उस दर्दनाक अज़ाब से पहले डरा दो जो उन पर आने वाला है, अगर वे शिर्क और कुफ़्र पर क़ायम रहे।"

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त कितना कृपालु और दयावान है। वह बंदों पर अज़ाब जल्दी नहीं भेजता, बल्कि पहले नबियों और रसूलों को भेजता है, ताकि लोगों को हिदायत का रास्ता दिखाया जाए। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की दावत का मक़सद सिर्फ़ डराना नहीं था, बल्कि उन्हें सच्चे रास्ते पर लाना और अल्लाह की इबादत की तरफ़ बुलाना था।

इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि हमें भी अपने आस-पास के लोगों को अल्लाह के अज़ाब से डराना चाहिए और उन्हें नेकी की तरफ़ बुलाना चाहिए। अल्लाह ने हमें जो ज़िंदगी दी है, यह एक इम्तिहान है। हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की इबादत में गुज़ारें और उसके हुक्मों का पालन करें। अल्लाह तआला अपने बंदों से मुहब्बत करता है और चाहता है कि वे जहन्नुम के अज़ाब से बचकर जन्नत की नेमतें हासिल करें।

हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की दावत का अंदाज़ बहुत ही नरम और प्यार भरा था। उन्होंने अपनी क़ौम को समझाया कि अगर तुम मेरी बात मान लो और अल्लाह की इबादत करने लगो, तो अल्लाह तुम्हारे गुनाह माफ़ कर देगा और तुम्हारी उम्र में बरकत देगा। यह अल्लाह की रहमत है कि वह तौबा करने वालों को माफ़ कर देता है और उन्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी अता करता है।

इसलिए हमें भी चाहिए कि हम अल्लाह की रहमत से उम्मीद रखें, अपने गुनाहों से तौबा करें और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ ढालें। यही सच्ची कामयाबी है।



📜 आयत 1-3 — नूह

1إِنَّا أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ أَنْ أَنذِرْ قَوْمَكَ مِن قَبْلِ أَن يَأْتِيَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
हमने नूह को उसकी क़ौम के पास (पैग़म्बर बनाकर) भेजा कि क़ब्ल उसके कि उनकी क़ौम पर दर्दनाक अज़ाब आए उनको उससे डराओ
2قَالَ يَا قَوْمِ إِنِّي لَكُمْ نَذِيرٌ مُّبِينٌ
तो नूह (अपनी क़ौम से) कहने लगे ऐ मेरी क़ौम मैं तो तुम्हें साफ़ साफ़ डराता (और समझाता) हूँ
3أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاتَّقُوهُ وَأَطِيعُونِ
कि तुम लोग ख़ुदा की इबादत करो और उसी से डरो और मेरी इताअत करो
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अनुवाद — नूह 1

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Tuesday, August 18, 2026

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