हूद · 11/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
إِلَّا الَّذِينَ صَبَرُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ أُولَٰئِكَ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ كَبِيرٌ ۝١١
Illal lazeena sabaroo wa `amilus saalihaati ulaaa`ika lahum maghfiratunw wa ajrun kabeer
📖 हिंदी अर्थ
मगर जिन लोगों ने सब्र किया और अच्छे (अच्छे) काम किए (वह ऐसे नहीं) ये वह लोग हैं जिनके वास्ते (ख़ुदा की) बख़्शिस और बहुत बड़ी (खरी) मज़दूरी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • صَبَرُوا: धैर्य रखा, सब्र किया।
  • الصَّالِحَاتِ: अच्छे कर्म, नेक कार्य।
  • مَغْفِرَةٌ: क्षमा, पापों की माफी।
  • أَجْرٌ كَبِيرٌ: बड़ा प्रतिफल, विशाल पुरस्कार।

तफसीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला उन लोगों का ज़िक्र कर रहे हैं जो पिछली आयतों में बताई गई बुरी हालत (अर्थात् मुसीबत में निराशा, नेमत पाकर घमंड और कृतघ्नता) से बचे रहते हैं। ये वे लोग हैं जो धैर्य (सब्र) अपनाते हैं — मुसीबतों पर सब्र करते हैं, अल्लाह की इबादत और आज्ञाकारिता पर सब्र करते हैं, और गुनाहों से बचने पर सब्र करते हैं। वे मुसीबत के समय अल्लाह से उम्मीद नहीं खोते और नेमत पाकर अल्लाह के शुक्रगुज़ार बनते हैं, न कि घमंडी और कृतघ्न। इसके साथ ही वे नेक कर्म करते हैं — अच्छे काम, जैसे नमाज़, ज़कात, भलाई, सच्चाई, और लोगों के साथ अच्छा व्यवहार। यह उनका अल्लाह की नेमतों पर शुक्र अदा करने का तरीका है।

ऐसे लोगों के लिए अल्लाह ने दो चीज़ें तय की हैं: एक माफ़ी (मग़फिरत) — उनके सारे गुनाह और कमियाँ माफ कर दी जाती हैं, और दूसरा बड़ा अज्र (प्रतिफल) — जो जन्नत है, जो हर अच्छे काम का सबसे बड़ा इनाम है। यह अज्र इतना बड़ा है कि किसी ने उसे देखा नहीं, न किसी कान ने सुना और न किसी दिल ने उसकी कल्पना की। यही उनका हाल है — वे निराश नहीं होते, न अल्लाह की नेमतों का इनकार करते हैं, न लोगों पर ज़ुल्म या घमंड करते हैं। उनका अंजाम क्षमा और विशाल पुरस्कार है।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. सब्र और नेक कर्म साथ-साथ चाहिए — सिर्फ़ सब्र काफ़ी नहीं, बल्कि उसके साथ अच्छे कर्म भी ज़रूरी हैं। यही सच्ची ईमानदारी की निशानी है।
  2. मुसीबत में निराशा नहीं — मुसीबत आने पर अल्लाह से उम्मीद नहीं खोनी चाहिए, क्योंकि अल्लाह उन्हीं को माफ़ी और बड़ा इनाम देता है जो सब्र करते हैं।
  3. नेमत पाकर शुक्र अदा करना — जब अल्लाह हमें नेमतें देता है, तो हमें घमंडी नहीं बनना चाहिए, बल्कि अच्छे कामों से उसका शुक्र अदा करना चाहिए।
  4. माफ़ी और जन्नत की उम्मीद — यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत बहुत विशाल है। जो लोग सब्र और नेकी पर क़ायम रहते हैं, उनके लिए माफ़ी और जन्नत तैयार है — यह सबसे बड़ी ख़ुशख़बरी है।
  5. इस्लाम में संतुलन — इस्लाम हमें सिखाता है कि जीवन में संतुलन रखो — मुसीबत में सब्र, और खुशहाली में शुक्र और नेकी। यही सच्चे मुसलमान की पहचान है।


📜 आयत 9-13 — हूद

9وَلَئِنْ أَذَقْنَا الْإِنسَانَ مِنَّا رَحْمَةً ثُمَّ نَزَعْنَاهَا مِنْهُ إِنَّهُ لَيَئُوسٌ كَفُورٌ
और अगर हम इन्सान को अपनी रहमत का मज़ा चखाएं फिर उसको हम उससे छीन लें तो (उस वक्त) यक़ीनन बड़ा बेआस और नाशुक्रा हो जाता है
10وَلَئِنْ أَذَقْنَاهُ نَعْمَاءَ بَعْدَ ضَرَّاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ ذَهَبَ السَّيِّئَاتُ عَنِّي ۚ إِنَّهُ لَفَرِحٌ فَخُورٌ
(और हमारी शिकायत करने लगता है) और अगर हम तकलीफ के बाद जो उसे पहुँचती थी राहत व आराम का जाएक़ा चखाए तो ज़रुर कहने लगता है कि अब तो सब सख्तियाँ मुझसे दफा हो गई इसमें शक़ नहीं कि वह बड़ा (जल्दी खुश) होने येख़ी बाज़ है
11إِلَّا الَّذِينَ صَبَرُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ أُولَٰئِكَ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ كَبِيرٌ
मगर जिन लोगों ने सब्र किया और अच्छे (अच्छे) काम किए (वह ऐसे नहीं) ये वह लोग हैं जिनके वास्ते (ख़ुदा की) बख़्शिस और बहुत बड़ी (खरी) मज़दूरी है
12فَلَعَلَّكَ تَارِكٌ بَعْضَ مَا يُوحَىٰ إِلَيْكَ وَضَائِقٌ بِهِ صَدْرُكَ أَن يَقُولُوا لَوْلَا أُنزِلَ عَلَيْهِ كَنزٌ أَوْ جَاءَ مَعَهُ مَلَكٌ ۚ إِنَّمَا أَنتَ نَذِيرٌ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ وَكِيلٌ
तो जो चीज़ तुम्हारे पास 'वही' के ज़रिए से भेजी है उनमें से बाज़ को (सुनाने के वक्त) यायद तुम फक़त इस ख्याल से छोड़ देने वाले हो और तुम तंग दिल हो कि मुबादा ये लोग कह बैंठें कि उन पर खज़ाना क्यों नहीं नाज़िल किया गया या (उनके तसदीक के लिए) उनके साथ कोई फरिश्ता क्यों न आया तो तुम सिर्फ (अज़ाब से) डराने वाले हो
13أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَاهُ ۖ قُلْ فَأْتُوا بِعَشْرِ سُوَرٍ مِّثْلِهِ مُفْتَرَيَاتٍ وَادْعُوا مَنِ اسْتَطَعْتُم مِّن دُونِ اللَّهِ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
तुम्हें उनका ख्याल न करना चाहिए और ख़ुदा हर चीज़ का ज़िम्मेदार है क्या ये लोग कहते हैं कि उस शख़्श (तुम) ने इस (क़ुरान) को अपनी तरफ से गढ़ लिया है तो तुम (उनसे साफ साफ) कह दो कि अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो तो (ज्यादा नहीं) ऐसे दस सूरे अपनी तरफ से गढ़ के ले आओं
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अनुवाद — हूद 11

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Tuesday, August 18, 2026

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