कि कुछ मियाद के लिए उनको क़ैद ही करे दें और यूसुफ के साथ और भी दो जवान आदमी (क़ैद ख़ाने) में दाख़िल हुए (चन्द दिन के बाद) उनमें से एक ने कहा कि मैने ख्वाब में देखा है कि मै (शराब बनाने के वास्ते अंगूर) निचोड़ रहा हूँ और दूसरे ने कहा (मै ने भी ख्वाब में) अपने को देखा कि मै अपने सर पर रोटिया उठाए हुए हूँ और चिड़ियाँ उसे खा रही हैं (यूसुफ) हमको उसकी ताबीर (मतलब) बताओ क्योंकि हम तुमको यक़ीनन नेकी कारों से समझते हैं
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اور ان کے ساتھ دو اور جوان بھی داخل زندان ہوئے۔ ایک نے ان میں سے کہا کہ (میں نے خواب دیکھا ہے) دیکھتا (کیا) ہوں کہ شراب (کے لیے انگور) نچوڑ رہا ہوں۔ دوسرے نے کہا کہ (میں نے بھی خواب دیکھا ہے) میں یہ دیکھتا ہوں کہ اپنے سر پر روٹیاں اٹھائے ہوئے ہوں اور جانور ان میں سے کھا رہے (ہیں تو) ہمیں ان کی تعبیر بتا دیجیئے کہ ہم تمہیں نیکوکار دیکھتے ہیں
أَعْصِرُ خَمْرًا: अंगूर निचोड़ रहा हूँ (अर्थात शराब बनाने के लिए अंगूर दबा रहा हूँ)।
تَأْوِيلِهِ: इसकी व्याख्या, इसका अंतिम परिणाम और अर्थ।
مِنَ الْمُحْسِنِينَ: भलाई करने वालों में से, अच्छे आचरण और ज्ञान वालों में से।
विस्तृत व्याख्या:
जब यूसुफ (अलैहिस्सलाम) को जेल में डाला गया, तो उनके साथ राजा के दो और युवा नौकर भी जेल में आए। ये दोनों राजा के करीबी सेवक थे—एक शराब पिलाने वाला (साक़ी) और दूसरा भोजन बनाने वाला (ख़ब्बाज़)। एक दिन इन दोनों ने सपने देखे और वे उनके अर्थ से अनजान थे।
पहले युवक (साक़ी) ने कहा: "मैंने सपने में देखा कि मैं अंगूर निचोड़ रहा हूँ ताकि शराब बने।" दूसरे युवक (ख़ब्बाज़) ने कहा: "मैंने सपने में देखा कि मैं अपने सिर के ऊपर रोटियाँ लिए हुए हूँ और पक्षी उन्हें खा रहे हैं।" दोनों ने यूसुफ (अलैहिस्सलाम) से कहा: "हमें इन सपनों का अर्थ बताइए, क्योंकि हम आपको नेकी करने वालों और अच्छे ज्ञान वालों में से देखते हैं।"
यूसुफ (अलैहिस्सलाम) ने उनकी बात सुनी और उन्हें सपनों का सही अर्थ बताने का वादा किया। यह घटना उनके ज्ञान और ईमान की गवाही देती है, क्योंकि उन्होंने इस अवसर का उपयोग उन्हें सच्चे धर्म की ओर बुलाने के लिए भी किया (जैसा कि आगे की आयतों में आता है)।
शिक्षाएँ और लाभ:
अच्छे आचरण का प्रभाव: यूसुफ (अलैहिस्सलाम) की नेकी और ईमानदारी का असर यह था कि जेल के कैदी भी उन्हें भला और ज्ञानी व्यक्ति मानते थे। यह हमें सिखाता है कि अच्छा चरित्र और ईमानदारी हर जगह सम्मान दिलाती है, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।
सपनों की व्याख्या का ज्ञान: यह घटना बताती है कि सपनों का सही अर्थ निकालना एक विशेष ज्ञान है जो अल्लाह अपने चुने हुए बंदों को देता है। यह ज्ञान यूसुफ (अलैहिस्सलाम) की नबुव्वत की निशानी थी।
मुसीबत में भी दूसरों की मदद: जेल में होते हुए भी यूसुफ (अलैहिस्सलाम) ने दूसरों की मदद करने से इनकार नहीं किया। यह हमें सिखाता है कि कठिन समय में भी हमें दूसरों के काम आना चाहिए और अपनी परेशानियों को दूसरों की मदद करने में बाधा नहीं बनने देना चाहिए।
अल्लाह की योजना: यह घटना दिखाती है कि अल्लाह कैसे मुसीबत के रास्ते से भी भलाई निकालता है। जेल ही वह जगह बनी जहाँ से यूसुफ (अलैहिस्सलाम) की शान बढ़ी और आगे चलकर वे मिस्र के खज़ाने के मुखिया बने।
सच्चाई की तलाश: दोनों युवकों ने सपनों का अर्थ जानने के लिए सच्चे इंसान की तलाश की और यूसुफ (अलैहिस्सलाम) को पाया। यह हमें सिखाता है कि सच्चे ज्ञान और सही राह की तलाश में हमें उन लोगों की ओर रुख करना चाहिए जो अल्लाह से डरने वाले और नेक हों।
कि कुछ मियाद के लिए उनको क़ैद ही करे दें और यूसुफ के साथ और भी दो जवान आदमी (क़ैद ख़ाने) में दाख़िल हुए (चन्द दिन के बाद) उनमें से एक ने कहा कि मैने ख्वाब में देखा है कि मै (शराब बनाने के वास्ते अंगूर) निचोड़ रहा हूँ और दूसरे ने कहा (मै ने भी ख्वाब में) अपने को देखा कि मै अपने सर पर रोटिया उठाए हुए हूँ और चिड़ियाँ उसे खा रही हैं (यूसुफ) हमको उसकी ताबीर (मतलब) बताओ क्योंकि हम तुमको यक़ीनन नेकी कारों से समझते हैं
कि कुछ मियाद के लिए उनको क़ैद ही करे दें और यूसुफ के साथ और भी दो जवान आदमी (क़ैद ख़ाने) में दाख़िल हुए (चन्द दिन के बाद) उनमें से एक ने कहा कि मैने ख्वाब में देखा है कि मै (शराब बनाने के वास्ते अंगूर) निचोड़ रहा हूँ और दूसरे ने कहा (मै ने भी ख्वाब में) अपने को देखा कि मै अपने सर पर रोटिया उठाए हुए हूँ और चिड़ियाँ उसे खा रही हैं (यूसुफ) हमको उसकी ताबीर (मतलब) बताओ क्योंकि हम तुमको यक़ीनन नेकी कारों से समझते हैं
यूसुफ ने कहा जो खाना तुम्हें (क़ैद ख़ाने से) दिया जाता है वह आने भी न पाएगा कि मै उसके तुम्हारे पास आने के क़ब्ल ही तुम्हे उसकी ताबीर बताऊँगा ये ताबीरे ख्वाब भी उन बातों के साथ है जो मेरे परवरदिगार ने मुझे तालीम फरमाई है मैं उन लोगों का मज़हब छोड़ बैठा हूँ जो ख़ुदा पर ईमान नहीं लाते और वह लोग आख़िरत के भी मुन्किर है
और मैं तो अपने बाप दादा इबराहीम व इसहाक़ व याक़ूब के मज़हब पर चलने वाला हूँ मुनासिब नहीं कि हम ख़ुदा के साथ किसी चीज़ को (उसका) शरीक बनाएँ ये भी ख़ुदा की एक बड़ी मेहरबानी है हम पर भी और तमाम लोगों पर मगर बहुतेरे लोग उसका शुक्रिया (भी) अदा नहीं करते
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