यूसुफ · 37/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
قَالَ لَا يَأْتِيكُمَا طَعَامٌ تُرْزَقَانِهِ إِلَّا نَبَّأْتُكُمَا بِتَأْوِيلِهِ قَبْلَ أَن يَأْتِيَكُمَا ۚ ذَٰلِكُمَا مِمَّا عَلَّمَنِي رَبِّي ۚ إِنِّي تَرَكْتُ مِلَّةَ قَوْمٍ لَّا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَهُم بِالْآخِرَةِ هُمْ كَافِرُونَ ۝٣٧
Qaala laa yaateekumaa ta`aamun turzaqaaniheee illaa nabbaatukumaa bitaaweelihee qabla any yaatiyakumaa; zaali kumaa mimmaa `allamanee rabbee; innee taraktu millata qawmil laa yu`minoona billaahi wahum bil aakhirati hum kaafiroon
📖 हिंदी अर्थ
यूसुफ ने कहा जो खाना तुम्हें (क़ैद ख़ाने से) दिया जाता है वह आने भी न पाएगा कि मै उसके तुम्हारे पास आने के क़ब्ल ही तुम्हे उसकी ताबीर बताऊँगा ये ताबीरे ख्वाब भी उन बातों के साथ है जो मेरे परवरदिगार ने मुझे तालीम फरमाई है मैं उन लोगों का मज़हब छोड़ बैठा हूँ जो ख़ुदा पर ईमान नहीं लाते और वह लोग आख़िरत के भी मुन्किर है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَأْوِيلِهِ: इसका अर्थ है उसका स्वरूप, उसकी वास्तविकता और उसका परिणाम।
  • مِلَّةَ: धर्म, पद्धति या रीति-रिवाज।
  • لَا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ: जो अल्लाह पर ईमान नहीं रखते।

विस्तृत व्याख्या:

यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने दोनों साथियों (राजा के ख़ानसामा और शराब बनाने वाले) से कहा: "जो भी भोजन तुम्हें दिया जाएगा और जो रोज़ी तुम्हें मिलेगी, उसके आने से पहले ही मैं तुम्हें उसका स्वरूप और उसकी वास्तविकता बता दूँगा। यह कोई कहानी या अटकल नहीं है, बल्कि यह वह ज्ञान है जो मेरे रब ने मुझे सिखाया है। मैंने उस धर्म को त्याग दिया है जिसे मेरे लोग (क़ौम) मानते थे, क्योंकि वे अल्लाह पर ईमान नहीं रखते और आख़िरत (परलोक) के दिन को भी नहीं मानते। वे पूरी तरह से उस दिन के इनकार करने वाले हैं।"

यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने यह बात इसलिए कही ताकि वे समझें कि यह ज्ञान किसी ज्योतिष या कुंडली से नहीं, बल्कि अल्लाह की ओर से दिया गया है। उन्होंने अपने ईमान और एकेश्वरवाद को स्पष्ट किया और बताया कि उन्होंने अपने पूर्वजों के उस धर्म को छोड़ दिया है जो अल्लाह के साथ किसी को साझीदार ठहराता था और आख़िरत के दिन को झुठलाता था। यह उनके दृढ़ विश्वास और पवित्रता का प्रमाण था।


फ़ायदे (लाभ):

  1. ईमान की दृढ़ता: यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने जेल में भी अपने ईमान को नहीं छोड़ा और हर अवसर पर अल्लाह की याद और उसके ज्ञान का प्रचार किया। यह हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी हमें अपने ईमान पर कायम रहना चाहिए।
  2. ज्ञान का स्रोत: सच्चा ज्ञान केवल अल्लाह की ओर से आता है। यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने ज्ञान का श्रेय अल्लाह को दिया, न कि अपनी योग्यता को। यह हमें सिखाता है कि हर अच्छी चीज़ के लिए अल्लाह का शुक्रिया अदा करना चाहिए।
  3. अच्छे आचरण का प्रचार: यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने जेल में भी लोगों को सच्चाई और ईमान की ओर बुलाया। यह दर्शाता है कि हमें हर जगह और हर हालत में अच्छाई का संदेश फैलाना चाहिए।
  4. आख़िरत पर ईमान: यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने आख़िरत के दिन पर ईमान रखने की अहमियत बताई। यह हमें याद दिलाता है कि यह दुनिया अस्थायी है और असली जीवन आख़िरत का है, इसलिए हमें उसी के लिए तैयारी करनी चाहिए।


📜 आयत 35-39 — यूसुफ

35ثُمَّ بَدَا لَهُم مِّن بَعْدِ مَا رَأَوُا الْآيَاتِ لَيَسْجُنُنَّهُ حَتَّىٰ حِينٍ
फिर (अज़ीज़ मिस्र और उसके लोगों ने) बावजूद के (यूसुफ की पाक दामिनी की) निशानियाँ देख ली थी उसके बाद भी उनको यही मुनासिब मालूम हुआ
36وَدَخَلَ مَعَهُ السِّجْنَ فَتَيَانِ ۖ قَالَ أَحَدُهُمَا إِنِّي أَرَانِي أَعْصِرُ خَمْرًا ۖ وَقَالَ الْآخَرُ إِنِّي أَرَانِي أَحْمِلُ فَوْقَ رَأْسِي خُبْزًا تَأْكُلُ الطَّيْرُ مِنْهُ ۖ نَبِّئْنَا بِتَأْوِيلِهِ ۖ إِنَّا نَرَاكَ مِنَ الْمُحْسِنِينَ
कि कुछ मियाद के लिए उनको क़ैद ही करे दें और यूसुफ के साथ और भी दो जवान आदमी (क़ैद ख़ाने) में दाख़िल हुए (चन्द दिन के बाद) उनमें से एक ने कहा कि मैने ख्वाब में देखा है कि मै (शराब बनाने के वास्ते अंगूर) निचोड़ रहा हूँ और दूसरे ने कहा (मै ने भी ख्वाब में) अपने को देखा कि मै अपने सर पर रोटिया उठाए हुए हूँ और चिड़ियाँ उसे खा रही हैं (यूसुफ) हमको उसकी ताबीर (मतलब) बताओ क्योंकि हम तुमको यक़ीनन नेकी कारों से समझते हैं
37قَالَ لَا يَأْتِيكُمَا طَعَامٌ تُرْزَقَانِهِ إِلَّا نَبَّأْتُكُمَا بِتَأْوِيلِهِ قَبْلَ أَن يَأْتِيَكُمَا ۚ ذَٰلِكُمَا مِمَّا عَلَّمَنِي رَبِّي ۚ إِنِّي تَرَكْتُ مِلَّةَ قَوْمٍ لَّا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَهُم بِالْآخِرَةِ هُمْ كَافِرُونَ
यूसुफ ने कहा जो खाना तुम्हें (क़ैद ख़ाने से) दिया जाता है वह आने भी न पाएगा कि मै उसके तुम्हारे पास आने के क़ब्ल ही तुम्हे उसकी ताबीर बताऊँगा ये ताबीरे ख्वाब भी उन बातों के साथ है जो मेरे परवरदिगार ने मुझे तालीम फरमाई है मैं उन लोगों का मज़हब छोड़ बैठा हूँ जो ख़ुदा पर ईमान नहीं लाते और वह लोग आख़िरत के भी मुन्किर है
38وَاتَّبَعْتُ مِلَّةَ آبَائِي إِبْرَاهِيمَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ ۚ مَا كَانَ لَنَا أَن نُّشْرِكَ بِاللَّهِ مِن شَيْءٍ ۚ ذَٰلِكَ مِن فَضْلِ اللَّهِ عَلَيْنَا وَعَلَى النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ
और मैं तो अपने बाप दादा इबराहीम व इसहाक़ व याक़ूब के मज़हब पर चलने वाला हूँ मुनासिब नहीं कि हम ख़ुदा के साथ किसी चीज़ को (उसका) शरीक बनाएँ ये भी ख़ुदा की एक बड़ी मेहरबानी है हम पर भी और तमाम लोगों पर मगर बहुतेरे लोग उसका शुक्रिया (भी) अदा नहीं करते
39يَا صَاحِبَيِ السِّجْنِ أَأَرْبَابٌ مُّتَفَرِّقُونَ خَيْرٌ أَمِ اللَّهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ
ऐ मेरे कैद ख़ाने के दोनो रफीक़ों (साथियों) (ज़रा ग़ौर तो करो कि) भला जुदा जुदा माबूद अच्छे या ख़ुदाए यकता ज़बरदस्त (अफसोस)
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अनुवाद — यूसुफ 37

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Tuesday, August 18, 2026

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