Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- مُبَشِّرِينَ: खुशखबरी देने वाले (जन्नत की खुशखबरी सुनाने वाले)।
- مُنذِرِينَ: डराने वाले (अल्लाह के अज़ाब से सावधान करने वाले)।
- لِيُدْحِضُوا: ताकि वे झूठे तर्कों से सत्य को मिटा दें या उसे पराजित कर दें।
- هُزُوًا: मज़ाक़, ठट्ठा, उपहास।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में अपने रसूलों के भेजे जाने का उद्देश्य बयान कर रहे हैं। वह फ़रमाता है कि हम अपने रसूलों को केवल दो ही कामों के लिए भेजते हैं: एक, ईमानवालों और नेक काम करने वालों को जन्नत की खुशखबरी देना; और दूसरा, काफ़िरों और नाफ़रमानों को अल्लाह के अज़ाब से डराना। रसूलों का काम सिर्फ़ पैग़ाम पहुँचाना है, वे किसी के दिल को ज़बरदस्ती ईमान पर मजबूर नहीं कर सकते। यह अल्लाह का कानून है कि हर ज़माने में उसने अपने बंदों की हिदायत के लिए रसूल भेजे, और सबका पैग़ाम एक ही था — अल्लाह की इबादत करो और उसके अज़ाब से डरो।
इसके बावजूद, काफ़िरों का हाल यह है कि वे सच्चाई के सामने आने के बाद भी झूठे तर्कों और बेकार की बहसों में पड़ जाते हैं। वे रसूलों से ऐसी निशानियाँ माँगते हैं जो उनकी ज़िद और हठ को पूरा करें, और यह सब कुछ इसलिए करते हैं ताकि वे अपने बातिल (झूठे) तरीक़ों से उस हक़ (सत्य) को मिटा दें जो रसूल लेकर आए थे। वे सोचते हैं कि अगर वे ज़्यादा बहस कर लेंगे, तो सच्चाई कमज़ोर पड़ जाएगी, लेकिन वे भूल जाते हैं कि सच्चाई कभी झूठ से नहीं हारती।
इससे भी बढ़कर दुखद बात यह है कि उन्होंने अल्लाह की आयतों (क़ुरआन) को और उन चेतावनियों को, जिनसे उन्हें डराया गया था (यानी क़यामत, अज़ाब, हिसाब), सिर्फ़ मज़ाक़ और ठट्ठा बना लिया। वे इन्हें सुनकर हँसते हैं, उनका उपहास करते हैं, और इन्हें कोई अहमियत नहीं देते। यह उनकी नादानी और सरकशी की इंतिहा है कि जो चीज़ उनके भले के लिए आई, उसे वे हँसी-मज़ाक़ में उड़ा देते हैं।
दावती पहलू (नसीहत):
प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के रसूल और उसकी किताब हमारे लिए रहमत हैं। जब अल्लाह हमें खुशखबरी देता है, तो हमें उस पर यक़ीन करना चाहिए और शुक्र अदा करना चाहिए; और जब वह हमें डराता है, तो हमें उससे सीख लेनी चाहिए और अपनी ज़िंदगी सुधारनी चाहिए। क़ुरआन को मज़ाक़ बनाना, उसकी आयतों पर हँसना, या उन्हें हल्का समझना — यह काफ़िरों की आदत है, और हमें उनके रास्ते से बचना चाहिए। अल्लाह तआला हमें सच्चाई को समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे, और हमें उन लोगों में से न बनाए जो आयतों को ठट्ठे में उड़ाते हैं। आमीन।
📜 आयत 54-58 — सूरा अल-कहफ
अनुवाद — अल-कहफ 56
सूरा अल-कहफ आयत 56 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और हम तो पैग़म्बरों को सिर्फ इसलिए भेजते हैं कि…सूरा आयत 56/110 — सूरा अल-कहफ الكهف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-कहफ सुनें, सूरा अल-कहफ अनुवाद, सूरा अल-कहफ mp3, सूरा अल-कहफ pdf. आयत 54–58. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Thursday, October 1, 2026
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