अल-कहफ · 56/110
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-कहफ
وَمَا نُرْسِلُ الْمُرْسَلِينَ إِلَّا مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ ۚ وَيُجَادِلُ الَّذِينَ كَفَرُوا بِالْبَاطِلِ لِيُدْحِضُوا بِهِ الْحَقَّ ۖ وَاتَّخَذُوا آيَاتِي وَمَا أُنذِرُوا هُزُوًا ۝٥٦
Wa maa nursilul mursaleena illaa mubashshireena wa munzireen; wa yujaadilul lazeena kafaroo bilbaatili liyudhidoo bihil haqqa wattakhazooo Aayaatee wa maaa unziroo huzuwaa
📖 हिंदी अर्थ
और हम तो पैग़म्बरों को सिर्फ इसलिए भेजते हैं कि (अच्छों को निजात की) खुशख़बरी सुनाएंऔर (बदों को अज़ाब से) डराएंऔर जो लोग काफिर हैं झूटी झूटी बातों का सहारा पकड़ के झगड़ा करते है ताकि उसकी बदौलत हक़ को (उसकी जगह से उखाड़ फेकें और उन लोगों ने मेरी आयतों को जिस (अज़ाब से) ये लोग डराए गए हॅसी ठ्ठ्ठा (मज़ाक) बना रखा है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
0:00
0:00
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مُبَشِّرِينَ: खुशखबरी देने वाले (जन्नत की खुशखबरी सुनाने वाले)।
  • مُنذِرِينَ: डराने वाले (अल्लाह के अज़ाब से सावधान करने वाले)।
  • لِيُدْحِضُوا: ताकि वे झूठे तर्कों से सत्य को मिटा दें या उसे पराजित कर दें।
  • هُزُوًا: मज़ाक़, ठट्ठा, उपहास।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने रसूलों के भेजे जाने का उद्देश्य बयान कर रहे हैं। वह फ़रमाता है कि हम अपने रसूलों को केवल दो ही कामों के लिए भेजते हैं: एक, ईमानवालों और नेक काम करने वालों को जन्नत की खुशखबरी देना; और दूसरा, काफ़िरों और नाफ़रमानों को अल्लाह के अज़ाब से डराना। रसूलों का काम सिर्फ़ पैग़ाम पहुँचाना है, वे किसी के दिल को ज़बरदस्ती ईमान पर मजबूर नहीं कर सकते। यह अल्लाह का कानून है कि हर ज़माने में उसने अपने बंदों की हिदायत के लिए रसूल भेजे, और सबका पैग़ाम एक ही था — अल्लाह की इबादत करो और उसके अज़ाब से डरो।

इसके बावजूद, काफ़िरों का हाल यह है कि वे सच्चाई के सामने आने के बाद भी झूठे तर्कों और बेकार की बहसों में पड़ जाते हैं। वे रसूलों से ऐसी निशानियाँ माँगते हैं जो उनकी ज़िद और हठ को पूरा करें, और यह सब कुछ इसलिए करते हैं ताकि वे अपने बातिल (झूठे) तरीक़ों से उस हक़ (सत्य) को मिटा दें जो रसूल लेकर आए थे। वे सोचते हैं कि अगर वे ज़्यादा बहस कर लेंगे, तो सच्चाई कमज़ोर पड़ जाएगी, लेकिन वे भूल जाते हैं कि सच्चाई कभी झूठ से नहीं हारती।

इससे भी बढ़कर दुखद बात यह है कि उन्होंने अल्लाह की आयतों (क़ुरआन) को और उन चेतावनियों को, जिनसे उन्हें डराया गया था (यानी क़यामत, अज़ाब, हिसाब), सिर्फ़ मज़ाक़ और ठट्ठा बना लिया। वे इन्हें सुनकर हँसते हैं, उनका उपहास करते हैं, और इन्हें कोई अहमियत नहीं देते। यह उनकी नादानी और सरकशी की इंतिहा है कि जो चीज़ उनके भले के लिए आई, उसे वे हँसी-मज़ाक़ में उड़ा देते हैं।


दावती पहलू (नसीहत):

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के रसूल और उसकी किताब हमारे लिए रहमत हैं। जब अल्लाह हमें खुशखबरी देता है, तो हमें उस पर यक़ीन करना चाहिए और शुक्र अदा करना चाहिए; और जब वह हमें डराता है, तो हमें उससे सीख लेनी चाहिए और अपनी ज़िंदगी सुधारनी चाहिए। क़ुरआन को मज़ाक़ बनाना, उसकी आयतों पर हँसना, या उन्हें हल्का समझना — यह काफ़िरों की आदत है, और हमें उनके रास्ते से बचना चाहिए। अल्लाह तआला हमें सच्चाई को समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे, और हमें उन लोगों में से न बनाए जो आयतों को ठट्ठे में उड़ाते हैं। आमीन।



📜 आयत 54-58 — सूरा अल-कहफ

54وَلَقَدْ صَرَّفْنَا فِي هَٰذَا الْقُرْآنِ لِلنَّاسِ مِن كُلِّ مَثَلٍ ۚ وَكَانَ الْإِنسَانُ أَكْثَرَ شَيْءٍ جَدَلًا
और हमने तो इस क़ुरान में लोगों (के समझाने) के वास्ते हर तरह की मिसालें फेर बदल कर बयान कर दी है मगर इन्सान तो तमाम मख़लूक़ात से ज्यादा झगड़ालू है
55وَمَا مَنَعَ النَّاسَ أَن يُؤْمِنُوا إِذْ جَاءَهُمُ الْهُدَىٰ وَيَسْتَغْفِرُوا رَبَّهُمْ إِلَّا أَن تَأْتِيَهُمْ سُنَّةُ الْأَوَّلِينَ أَوْ يَأْتِيَهُمُ الْعَذَابُ قُبُلًا
और जब लोगों के पास हिदायत आ चुकी तो (फिर) उनको ईमान लाने और अपने परवरदिगार से मग़फिरत की दुआ माँगने से (उसके सिवा और कौन) अम्र मायने है कि अगलों की सी रीत रस्म उनको भी पेश आई या हमारा अज़ाब उनके सामने से (मौजूद) हो
56وَمَا نُرْسِلُ الْمُرْسَلِينَ إِلَّا مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ ۚ وَيُجَادِلُ الَّذِينَ كَفَرُوا بِالْبَاطِلِ لِيُدْحِضُوا بِهِ الْحَقَّ ۖ وَاتَّخَذُوا آيَاتِي وَمَا أُنذِرُوا هُزُوًا
और हम तो पैग़म्बरों को सिर्फ इसलिए भेजते हैं कि (अच्छों को निजात की) खुशख़बरी सुनाएंऔर (बदों को अज़ाब से) डराएंऔर जो लोग काफिर हैं झूटी झूटी बातों का सहारा पकड़ के झगड़ा करते है ताकि उसकी बदौलत हक़ को (उसकी जगह से उखाड़ फेकें और उन लोगों ने मेरी आयतों को जिस (अज़ाब से) ये लोग डराए गए हॅसी ठ्ठ्ठा (मज़ाक) बना रखा है
57وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن ذُكِّرَ بِآيَاتِ رَبِّهِ فَأَعْرَضَ عَنْهَا وَنَسِيَ مَا قَدَّمَتْ يَدَاهُ ۚ إِنَّا جَعَلْنَا عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ أَكِنَّةً أَن يَفْقَهُوهُ وَفِي آذَانِهِمْ وَقْرًا ۖ وَإِن تَدْعُهُمْ إِلَى الْهُدَىٰ فَلَن يَهْتَدُوا إِذًا أَبَدًا
और उससे बढ़कर और कौन ज़ालिम होगा जिसको ख़ुदा की आयतें याद दिलाई जाए और वह उनसे रद गिरदानी (मुँह फेर ले) करे और अपने पहले करतूतों को जो उसके हाथों ने किए हैं भूल बैठे (गोया) हमने खुद उनके दिलों पर परदे डाल दिए हैं कि वह (हक़ बात को) न समझ सकें और (गोया) उनके कानों में गिरानी पैदा कर दी है कि (सुन न सकें) और अगर तुम उनको राहे रास्त की तरफ़ बुलाओ भी तो ये हरगिज़ कभी रुबरु होने वाले नहीं हैं
58وَرَبُّكَ الْغَفُورُ ذُو الرَّحْمَةِ ۖ لَوْ يُؤَاخِذُهُم بِمَا كَسَبُوا لَعَجَّلَ لَهُمُ الْعَذَابَ ۚ بَل لَّهُم مَّوْعِدٌ لَّن يَجِدُوا مِن دُونِهِ مَوْئِلًا
और (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है अगर उनकी करतूतों की सज़ा में धर पकड़ करता तो फौरन (दुनिया ही में) उन पर अज़ाब नाज़िल कर देता मगर उनके लिए तो एक मियाद (मुक़र्रर) है जिससे खुदा के सिवा कहीें पनाह की जगह न पाएंगें
अल-कहफकुरान सूची
110आयत
मक्कीअवतरण स्थान
56आयत

अनुवाद — अल-कहफ 56

सूरा अल-कहफ आयत 56 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और हम तो पैग़म्बरों को सिर्फ इसलिए भेजते हैं कि…

सूरा आयत 56/110 — सूरा अल-कहफ الكهف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-कहफ सुनें, सूरा अल-कहफ अनुवाद, सूरा अल-कहफ mp3, सूरा अल-कहफ pdf. आयत 54–58. हिंदी अर्थ: اردو.





पवित्र क़ुरआन


Thursday, October 1, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए