اتَّقَوْا: अल्लाह से डरे, उसकी आज्ञाओं का पालन किया और उसकी मनाही से बचे।
لَمَثُوبَةٌ: अल्लाह की ओर से मिलने वाला पुरस्कार और बदला।
خَيْرٌ: बेहतर और उत्तम।
يَعْلَمُونَ: जानते, समझते।
तफसीर (व्याख्या):
यदि यहूदी वास्तव में अल्लाह पर ईमान लाते और उसका डर रखते, उसकी आज्ञाओं का पालन करते और उसकी मनाही से बचते, तो अल्लाह की ओर से मिलने वाला पुरस्कार उनके लिए उस सबसे कहीं बेहतर होता जो उन्होंने जादू और अन्य गलत कार्यों के माध्यम से हासिल किया था। उन्होंने जादू सीखकर और उसके बदले में दुनियावी लाभ कमाकर अपने आपको धोखे में रखा, जबकि अल्लाह का इनाम और उसकी रहमत उनके लिए सबसे उत्तम थी। यदि वे सच्चे ज्ञान के साथ यह समझ लेते कि ईमान और तक़वा (परहेज़गारी) में कितनी भलाई और बरकत है, तो वे कभी भी जादू और कुफ्र का रास्ता नहीं अपनाते। उनकी नासमझी और अज्ञानता ही उन्हें इस भलाई से वंचित कर गई।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
ईमान और तक़वा ही वास्तविक सफलता का मार्ग है, चाहे दुनिया में कितनी भी मुश्किलें क्यों न हों। अल्लाह का पुरस्कार हर दुनियावी लाभ से बेहतर है।
यह आयत हमें सिखाती है कि ज्ञान और समझ का सही उपयोग करना चाहिए। जो लोग सच्चाई को जानकर भी उसे नहीं अपनाते, वे सबसे बड़े घाटे में रहते हैं।
अल्लाह की रहमत और उसका इनाम उन लोगों के लिए है जो उस पर ईमान रखते हैं और उसके डर से गलत कामों से बचते हैं। यही इंसान को दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी देता है।
इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हमें अपने जीवन में हमेशा अल्लाह की खुशी को प्राथमिकता देनी चाहिए, न कि दुनिया के अस्थायी लाभों को। जो अल्लाह के पास है वही स्थायी और बेहतर है।
और जब उनके पास खुदा की तरफ से रसूल (मोहम्मद) आया और उस किताब (तौरेत) की जो उनके पास है तसदीक़ भी करता है तो उन अहले किताब के एक गिरोह ने किताबे खुदा को अपने पसे पुश्त फेंक दिया गोया वह लोग कुछ जानते ही नहीं और उस मंत्र के पीछे पड़ गए
जिसको सुलेमान के ज़माने की सलतनत में शयातीन जपा करते थे हालाँकि सुलेमान ने कुफ्र नहीं इख़तेयार किया लेकिन शैतानों ने कुफ्र एख़तेयार किया कि वह लोगों को जादू सिखाया करते थे और वह चीज़ें जो हारूत और मारूत दोनों फ़रिश्तों पर बाइबिल में नाज़िल की गई थी हालाँकि ये दोनों फ़रिश्ते किसी को सिखाते न थे जब तक ये न कह देते थे कि हम दोनों तो फ़क़त (ज़रियाए आज़माइश) है पस तो (इस पर अमल करके) बेईमान न हो जाना उस पर भी उनसे वह (टोटके) सीखते थे जिनकी वजह से मिया बीवी में तफ़रक़ा डालते हालाँकि बग़ैर इज्ने खुदावन्दी वह अपनी इन बातों से किसी को ज़रर नहीं पहुँचा सकते थे और ये लोग ऐसी बातें सीखते थे जो खुद उन्हें नुक़सान पहुँचाती थी और कुछ (नफा) पहुँचाती थी बावजूद कि वह यक़ीनन जान चुके थे कि जो शख्स इन (बुराईयों) का ख़रीदार हुआ वह आख़िरत में बेनसीब हैं और बेशुबह (मुआवज़ा) बहुत ही बड़ा है जिसके बदले उन्होंने अपनी जानों को बेचा काश (उसे कुछ) सोचे समझे होते
ऐ ईमानवालों तुम (रसूल को अपनी तरफ मुतावज्जे करना चाहो तो) रआना (हमारी रिआयत कर) न कहा करो बल्कि उनज़ुरना (हम पर नज़रे तवज्जो रख) कहा करो और (जी लगाकर) सुनते रहो और काफिरों के लिए दर्दनाक अज़ाब है
ऐ रसूल अहले किताब में से जिन लोगों ने कुफ्र इख़तेयार किया वह और मुशरेकीन ये नहीं चाहते हैं कि तुम पर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से भलाई (वही) नाज़िल की जाए और (उनका तो इसमें कुछ इजारा नहीं) खुदा जिसको चाहता है अपनी रहमत के लिए ख़ास कर लेता है और खुदा बड़ा फज़ल (करने) वाला है
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