अल-बकरा · 154/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَلَا تَقُولُوا لِمَن يُقْتَلُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتٌ ۚ بَلْ أَحْيَاءٌ وَلَٰكِن لَّا تَشْعُرُونَ ۝١٥٤
Wa laa taqooloo limai yuqtalu fee sabeelil laahi amwaat; bal ahyaaa`unw wa laakil laa tash`uroon
📖 हिंदी अर्थ
और जो लोग ख़ुदा की राह में मारे गए उन्हें कभी मुर्दा न कहना बल्कि वह लोग ज़िन्दा हैं मगर तुम उनकी ज़िन्दगी की हक़ीकत का कुछ भी शऊर नहीं रखते
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • युक़्तलु फ़ी सबीलिल्लाह: अल्लाह के रास्ते में मारे जाना (शहीद होना)
  • अम्वात: मुर्दे (बहुवचन)
  • अह्याउ: ज़िंदा (बहुवचन)
  • ला तश'उरून: तुम्हें महसूस नहीं होता, तुम समझ नहीं सकते

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमान वालों! तुम उन लोगों के बारे में कभी यह न कहो जो अल्लाह के रास्ते में शहीद हो जाते हैं कि वे मुर्दे हैं। हरगिज़ नहीं! बल्कि वे अपने रब के पास ज़िंदा हैं, जीवित हैं। यह जीवन एक ख़ास जीवन है जो हमारी समझ से परे है — न वह इस दुनिया जैसा जीवन है, न हमारी आँखें उसे देख सकती हैं, न हमारे कान उसे सुन सकते हैं। अल्लाह ने उन्हें अपनी विशेष रहमत से नवाज़ा है और उन्हें ऐसा जीवन प्रदान किया है जिसकी हकीकत को सिर्फ अल्लाह ही जानता है।

यह आयत मुख्य रूप से बद्र के युद्ध में शहीद होने वाले मुसलमानों के बारे में उतरी थी, जब कुछ लोगों ने कहा कि ये लोग मर गए और उनका काम खत्म हो गया। अल्लाह ने इस ग़लतफ़हमी को दूर किया और बताया कि ये शहीद वास्तव में ज़िंदा हैं, बल्कि उन्हें अपने रब के पास रिज़्क़ (आजीविका) मिलती है और वे उस पर खुश हैं।

इस आयत से हमें कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं:

पहला सबक: शहादत कोई आम मौत नहीं है। शहीद अल्लाह के पास ज़िंदा हैं और उन्हें विशेष सम्मान प्राप्त है। यह बात हमारे दिलों में शहादत की अहमियत और उसकी फज़ीलत को बढ़ाती है।

दूसरा सबक: यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के रास्ते में जान देने वालों को कभी मुर्दा न समझें। उनकी कुर्बानी कभी रायगाँ नहीं जाती। अल्लाह उन्हें अपनी रहमत से नवाज़ता है और उन्हें ऐसा मुकाम देता है जो हमारी समझ से परे है।

तीसरा सबक: यह आयत मुसलमानों को जिहाद और अल्लाह के रास्ते में कुर्बानी देने की तरग़ीब देती है। जब हमें यक़ीन हो कि शहीद मरता नहीं, बल्कि ज़िंदा होकर अल्लाह के पास चला जाता है, तो मौत का डर कम हो जाता है और अल्लाह की राह में कुर्बानी का जज़्बा पैदा होता है।

चौथा सबक: "लेकिन तुम्हें इसका एहसास नहीं होता" — यह बताता है कि इंसान की समझ और इंद्रियाँ सीमित हैं। कई चीज़ें ऐसी हैं जो हमारी आँखों से छिपी हैं, लेकिन वे हकीकत में मौजूद हैं। इसलिए हमें अल्लाह की बताई हुई बातों पर ईमान लाना चाहिए, भले ही हम उन्हें देख या महसूस न कर सकें।

पाँचवां सबक: यह आयत क़ब्र के आज़ाब और नेमत की दलील भी देती है, क्योंकि शहीदों की यह ज़िंदगी क़ब्र में ही शुरू होती है। यह हमें याद दिलाती है कि मौत के बाद की ज़िंदगी हकीकत है और हर इंसान को अपने अमल का बदला मिलेगा।

प्यारे मुसलमानों! यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के रास्ते में कुर्बानी देने वालों की अज़मत को कभी कम न समझें। उनके दर्जे को अल्लाह ने बुलंद किया है। हमें चाहिए कि हम उनके इतिहास से सबक लें, उनकी कुर्बानियों को याद रखें और अपनी ज़िंदगी में उनके नक़्शे-क़दम पर चलने की कोशिश करें। याद रखें, यह दुनिया फ़ानी है और आख़िरत की ज़िंदगी ही हमेशा रहने वाली है। जो लोग अल्लाह की राह में अपनी जान कुर्बान कर देते हैं, वे असली कामयाब हैं।

🎧 सुनें

📜 आयत 152-156 — अल-बकरा

152فَاذْكُرُونِي أَذْكُرْكُمْ وَاشْكُرُوا لِي وَلَا تَكْفُرُونِ
पस तुम हमारी याद रखो तो मै भी तुम्हारा ज़िक्र (खैर) किया करुगाँ और मेरा शुक्रिया अदा करते रहो और नाशुक्री न करो
153يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اسْتَعِينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلَاةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ
ऐ ईमानदारों मुसीबत के वक्त सब्र और नमाज़ के ज़रिए से ख़ुदा की मदद माँगों बेशक ख़ुदा सब्र करने वालों ही का साथी है
154وَلَا تَقُولُوا لِمَن يُقْتَلُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتٌ ۚ بَلْ أَحْيَاءٌ وَلَٰكِن لَّا تَشْعُرُونَ
और जो लोग ख़ुदा की राह में मारे गए उन्हें कभी मुर्दा न कहना बल्कि वह लोग ज़िन्दा हैं मगर तुम उनकी ज़िन्दगी की हक़ीकत का कुछ भी शऊर नहीं रखते
155وَلَنَبْلُوَنَّكُم بِشَيْءٍ مِّنَ الْخَوْفِ وَالْجُوعِ وَنَقْصٍ مِّنَ الْأَمْوَالِ وَالْأَنفُسِ وَالثَّمَرَاتِ ۗ وَبَشِّرِ الصَّابِرِينَ
और हम तुम्हें कुछ खौफ़ और भूख से और मालों और जानों और फलों की कमी से ज़रुर आज़माएगें और (ऐ रसूल) ऐसे सब्र करने वालों को ख़ुशख़बरी दे दो
156الَّذِينَ إِذَا أَصَابَتْهُم مُّصِيبَةٌ قَالُوا إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
कि जब उन पर कोई मुसीबत आ पड़ी तो वह (बेसाख्ता) बोल उठे हम तो ख़ुदा ही के हैं और हम उसी की तरफ लौट कर जाने वाले हैं
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अनुवाद — अल-बकरा 154

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Tuesday, August 18, 2026

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