अल-बकरा · 155/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَلَنَبْلُوَنَّكُم بِشَيْءٍ مِّنَ الْخَوْفِ وَالْجُوعِ وَنَقْصٍ مِّنَ الْأَمْوَالِ وَالْأَنفُسِ وَالثَّمَرَاتِ ۗ وَبَشِّرِ الصَّابِرِينَ ۝١٥٥
Wa lanablu wannakum bishai`im minal khawfi waljoo`i wa naqsim minal amwaali wal anfusi was samaraat; wa bashshiris saabireen
📖 हिंदी अर्थ
और हम तुम्हें कुछ खौफ़ और भूख से और मालों और जानों और फलों की कमी से ज़रुर आज़माएगें और (ऐ रसूल) ऐसे सब्र करने वालों को ख़ुशख़बरी दे दो
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَلَنَبْلُوَنَّكُمْ: हम अवश्य तुम्हें परीक्षा में डालेंगे
  • الْخَوْفِ: भय (शत्रु का भय)
  • الْجُوعِ: भूख (अकाल)
  • نَقْصٍ: कमी
  • الْأَمْوَالِ: धन-संपत्ति
  • الْأَنفُسِ: जानें (प्राण)
  • الثَّمَرَاتِ: फल (फसलें)
  • الصَّابِرِينَ: धैर्य रखने वाले

विस्तृत तफसीर:

अल्लाह तआला इस आयत में अपने ईमानवाले बंदों को बता रहे हैं कि यह दुनिया आराम और चैन की जगह नहीं है, बल्कि यह इम्तिहान (परीक्षा) की जगह है। अल्लाह तआला ने अपनी बेहतरीन हिकमत से यह नियम बनाया है कि वह अपने बंदों को विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों और मुसीबतों से परखता है।

यह परीक्षा कई रूपों में आती है:

  1. भय (खौफ): दुश्मनों का डर, युद्ध की स्थिति, या किसी खतरे का भय
  2. भूख (जू'): अकाल, भोजन की कमी, या कठिनाई से रोज़ी हासिल होना
  3. धन की कमी: संपत्ति का नुकसान, व्यापार में घाटा, या कमाई में कठिनाई
  4. जान का नुकसान: मृत्यु, बीमारी, या अल्लाह की राह में शहादत
  5. फलों की कमी: फसलों का नष्ट होना, बागों को नुकसान, या पैदावार में कमी

यह सारी परीक्षाएँ अल्लाह की ओर से हैं, और इनका उद्देश्य यह नहीं है कि अल्लाह को पता चले कि कौन सच्चा है और कौन झूठा — अल्लाह तो सब कुछ जानता है — बल्कि उद्देश्य यह है कि बंदे का ईमान प्रकट हो, उसका सब्र और शुक्र जाहिर हो, और उसका दर्जा बुलंद हो।

इसके बाद अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को आदेश देते हैं कि वे उन लोगों को खुशखबरी सुनाएँ जो इन मुसीबतों पर धैर्य रखते हैं। यह खुशखबरी क्या है? यह कि धैर्यवानों के लिए दुनिया में भी अच्छा अंजाम है और आख़िरत में भी बेहतरीन इनाम है। अल्लाह तआला उन्हें बिना हिसाब के अज्र देंगे, उनके गुनाह माफ करेंगे, और उन्हें जन्नत में दाखिल करेंगे।

दावत और नसीहत:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि मुसीबतें और परेशानियाँ इस दुनिया में आम बात हैं। जब भी कोई कठिनाई आए, तो हमें घबराना नहीं चाहिए, बल्कि सब्र करना चाहिए। याद रखिए, सब्र का मतलब यह नहीं है कि हम हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएँ, बल्कि सब्र का मतलब है — अल्लाह पर भरोसा रखते हुए, जो कुछ हो रहा है उसे अल्लाह की तरफ से समझें, अपनी ज़ुबान से बुराई न करें, दिल में शिकायत न रखें, और अल्लाह से अच्छे अंजाम की उम्मीद रखें।

जो व्यक्ति सब्र करता है, अल्लाह उसके साथ होता है। अल्लाह कुरआन में फरमाता है: "बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।" (अल-बकरा: 153)

तो आइए, हम सब सब्र करने वालों में शामिल हों, और अल्लाह से उस बेहतरीन इनाम की उम्मीद रखें जो उसने धैर्यवानों के लिए तैयार किया है। यह दुनिया की परीक्षा कुछ दिनों की है, लेकिन उसका इनाम हमेशा हमेशा के लिए है। अल्लाह हम सबको सब्र और शुक्र की तौफीक दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 153-157 — अल-बकरा

153يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اسْتَعِينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلَاةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ
ऐ ईमानदारों मुसीबत के वक्त सब्र और नमाज़ के ज़रिए से ख़ुदा की मदद माँगों बेशक ख़ुदा सब्र करने वालों ही का साथी है
154وَلَا تَقُولُوا لِمَن يُقْتَلُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتٌ ۚ بَلْ أَحْيَاءٌ وَلَٰكِن لَّا تَشْعُرُونَ
और जो लोग ख़ुदा की राह में मारे गए उन्हें कभी मुर्दा न कहना बल्कि वह लोग ज़िन्दा हैं मगर तुम उनकी ज़िन्दगी की हक़ीकत का कुछ भी शऊर नहीं रखते
155وَلَنَبْلُوَنَّكُم بِشَيْءٍ مِّنَ الْخَوْفِ وَالْجُوعِ وَنَقْصٍ مِّنَ الْأَمْوَالِ وَالْأَنفُسِ وَالثَّمَرَاتِ ۗ وَبَشِّرِ الصَّابِرِينَ
और हम तुम्हें कुछ खौफ़ और भूख से और मालों और जानों और फलों की कमी से ज़रुर आज़माएगें और (ऐ रसूल) ऐसे सब्र करने वालों को ख़ुशख़बरी दे दो
156الَّذِينَ إِذَا أَصَابَتْهُم مُّصِيبَةٌ قَالُوا إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
कि जब उन पर कोई मुसीबत आ पड़ी तो वह (बेसाख्ता) बोल उठे हम तो ख़ुदा ही के हैं और हम उसी की तरफ लौट कर जाने वाले हैं
157أُولَٰئِكَ عَلَيْهِمْ صَلَوَاتٌ مِّن رَّبِّهِمْ وَرَحْمَةٌ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُهْتَدُونَ
उन्हीं लोगों पर उनके परवरदिगार की तरफ से इनायतें हैं और रहमत और यही लोग हिदायत याफ्ता है
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अनुवाद — अल-बकरा 155

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Tuesday, August 18, 2026

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