अल-बकरा · 179/286
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बकरा
وَلَكُمْ فِي الْقِصَاصِ حَيَاةٌ يَا أُولِي الْأَلْبَابِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ۝١٧٩
Wa lakum fil qisaasi hayaatuny yaaa ulil albaabi la `allakum tattaqoon
📖 हिंदी अर्थ
और ऐ अक़लमनदों क़सास (के क़वाएद मुक़र्रर कर देने) में तुम्हारी ज़िन्दगी है (और इसीलिए जारी किया गया है ताकि तुम ख़ूंरेज़ी से) परहेज़ करो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • القصاص (क़िसास): बदला लेना, अर्थात हत्या के मामले में हत्यारे को उसी के बराबर सज़ा देना।
  • حياة (हयात): जीवन, सुरक्षा, बचाव।
  • أُولِي الأَلْبَاب (उलिल-अल्बाब): बुद्धि और समझ वाले लोग।
  • تَتَّقُونَ (तत्तक़ून): डरना, बचना, परहेज़गार बनना।

विस्तृत तफ़सीर:

अल्लाह तआला ने इस आयत में क़िसास (बदले) के क़ानून को लोगों के लिए जीवन का ज़रिया बताया है। यानी जब क़िसास का क़ानून लागू होता है, तो समाज में जान-माल की हिफ़ाज़त होती है, ख़ून-ख़राबा रुकता है, और लोग एक-दूसरे की जान के दुश्मन नहीं बनते। अगर क़िसास का क़ानून न हो, तो कमज़ोर लोगों की जानें खतरे में पड़ जाएँ, हत्यारे निडर हो जाएँ, और समाज में अराजकता फैल जाए। इसलिए अल्लाह ने फ़रमाया कि इस क़ानून में तुम्हारे लिए जीवन और सुरक्षा है।

यह बात ख़ास तौर पर उन लोगों के लिए कही गई है जो अक़्ल और समझ रखते हैं, क्योंकि वही इस हिकमत को समझ सकते हैं कि सज़ा का ख़ौफ़ इंसान को जुर्म से रोकता है। जब कोई यह सोचेगा कि अगर मैंने किसी की जान ली, तो मेरी भी जान ली जाएगी, तो वह हत्या जैसे गुनाह से बचेगा। इस तरह क़िसास का क़ानून एक तरफ़ मज़लूम का हक़ अदा करता है, और दूसरी तरफ़ पूरे समाज के लिए अमन और सलामती का ज़रिया बनता है।

इस आयत का मक़सद सिर्फ़ सज़ा देना नहीं, बल्कि लोगों को तक़वा (अल्लाह का डर) अपनाने की तरफ़ राह दिखाना है। अल्लाह चाहता है कि इंसान अपनी अक़्ल से काम ले, अल्लाह के हुक्म के आगे सर झुकाए, और हत्या जैसे बड़े गुनाह से बचे। जब समाज में तक़वा आएगा, तो लोग एक-दूसरे के हक़ों का ख़याल रखेंगे, और इसी में दुनिया और आख़िरत की भलाई है।

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम का क़ानून इंसानों की भलाई के लिए आया है। यह कठोरता सिर्फ़ ज़ालिमों के लिए है, ताकि मज़लूमों को इंसाफ़ मिले और समाज में रहमत और मुहब्बत का माहौल बने। अल्लाह ने जो भी हुक्म दिया है, उसमें इंसान के लिए भलाई ही भलाई है। हमें चाहिए कि हम इन हुक्मों को समझें, उन पर अमल करें, और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ बनाएँ। यही सच्ची कामयाबी है, और यही तक़वा है जो हमें जहन्नुम के अज़ाब से बचाकर जन्नत की तरफ़ ले जाता है।



📜 आयत 177-181 — सूरा अल-बकरा

177۞ لَّيْسَ الْبِرَّ أَن تُوَلُّوا وُجُوهَكُمْ قِبَلَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ وَلَٰكِنَّ الْبِرَّ مَنْ آمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالْكِتَابِ وَالنَّبِيِّينَ وَآتَى الْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ وَالسَّائِلِينَ وَفِي الرِّقَابِ وَأَقَامَ الصَّلَاةَ وَآتَى الزَّكَاةَ وَالْمُوفُونَ بِعَهْدِهِمْ إِذَا عَاهَدُوا ۖ وَالصَّابِرِينَ فِي الْبَأْسَاءِ وَالضَّرَّاءِ وَحِينَ الْبَأْسِ ۗ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ صَدَقُوا ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُتَّقُونَ
नेकी कुछ यही थोड़ी है कि नमाज़ में अपने मुँह पूरब या पश्चिम की तरफ़ कर लो बल्कि नेकी तो उसकी है जो ख़ुदा और रोज़े आख़िरत और फ़रिश्तों और ख़ुदा की किताबों और पैग़म्बरों पर ईमान लाए और उसकी उलफ़त में अपना माल क़राबत दारों और यतीमों और मोहताजो और परदेसियों और माँगने वालों और लौन्डी ग़ुलाम (के गुलू खलासी) में सर्फ करे और पाबन्दी से नमाज़ पढे और ज़कात देता रहे और जब कोई एहद किया तो अपने क़ौल के पूरे हो और फ़क्र व फाक़ा रन्ज और घुटन के वक्त साबित क़दम रहे यही लोग वह हैं जो दावए ईमान में सच्चे निकले और यही लोग परहेज़गार है
178يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِصَاصُ فِي الْقَتْلَى ۖ الْحُرُّ بِالْحُرِّ وَالْعَبْدُ بِالْعَبْدِ وَالْأُنثَىٰ بِالْأُنثَىٰ ۚ فَمَنْ عُفِيَ لَهُ مِنْ أَخِيهِ شَيْءٌ فَاتِّبَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ وَأَدَاءٌ إِلَيْهِ بِإِحْسَانٍ ۗ ذَٰلِكَ تَخْفِيفٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَرَحْمَةٌ ۗ فَمَنِ اعْتَدَىٰ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَلَهُ عَذَابٌ أَلِيمٌ
ऐ मोमिनों जो लोग (नाहक़) मार डाले जाएँ उनके बदले में तुम को जान के बदले जान लेने का हुक्म दिया जाता है आज़ाद के बदले आज़ाद और ग़ुलाम के बदले ग़ुलाम और औरत के बदले औरत पस जिस (क़ातिल) को उसके ईमानी भाई तालिबे केसास की तरफ से कुछ माफ़ कर दिया जाये तो उसे भी उसके क़दम ब क़दम नेकी करना और ख़ुश मआमलती से (ख़ून बहा) अदा कर देना चाहिए ये तुम्हारे परवरदिगार की तरफ आसानी और मेहरबानी है फिर उसके बाद जो ज्यादती करे तो उस के लिए दर्दनाक अज़ाब है
179وَلَكُمْ فِي الْقِصَاصِ حَيَاةٌ يَا أُولِي الْأَلْبَابِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ
और ऐ अक़लमनदों क़सास (के क़वाएद मुक़र्रर कर देने) में तुम्हारी ज़िन्दगी है (और इसीलिए जारी किया गया है ताकि तुम ख़ूंरेज़ी से) परहेज़ करो
180كُتِبَ عَلَيْكُمْ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ إِن تَرَكَ خَيْرًا الْوَصِيَّةُ لِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ بِالْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ
(मुसलमानों) तुम को हुक्म दिया जाता है कि जब तुम में से किसी के सामने मौत आ खड़ी हो बशर्ते कि वह कुछ माल छोड़ जाएं तो माँ बाप और क़राबतदारों के लिए अच्छी वसीयत करें जो ख़ुदा से डरते हैं उन पर ये एक हक़ है
181فَمَن بَدَّلَهُ بَعْدَمَا سَمِعَهُ فَإِنَّمَا إِثْمُهُ عَلَى الَّذِينَ يُبَدِّلُونَهُ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
फिर जो सुन चुका उसके बाद उसे कुछ का कुछ कर दे तो उस का गुनाह उन्हीं लोगों की गरदन पर है जो उसे बदल डालें बेशक ख़ुदा सब कुछ जानता और सुनता है
अल-बकराकुरान सूची
286आयत
मदनीअवतरण स्थान
179आयत

अनुवाद — अल-बकरा 179

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Monday, September 28, 2026

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