Mishary Rashid Alafasy
✓
Mahmoud Khalil Al-Husary
✓
Abdurrahman As-Sudais
✓
Mohamed Siddiq Al-Minshawi
✓
Abdul Basit Abdul Samad
✓
Ali Al-Hudhaify
✓
Ahmed ibn Ali al-Ajamy
✓
Abu Bakr Ash-Shaatree
✓
Muhammad Ayyoub
✓
Abdullah Basfar
✓
Abdullah Al-Juhani
✓
Maher Al Muaiqly
✓
अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- كُتِبَ: फ़र्ज़ किया गया, अनिवार्य किया गया।
- حَضَرَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ: मौत के कारण और उसके निशान (जैसे गंभीर बीमारी) सामने आ जाएँ।
- خَيْرًا: माल और धन।
- الْوَصِيَّةُ: वसीयत (जो व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद अपने माल से करे)।
- بِالْمَعْرُوفِ: न्याय और भलाई के साथ, जो शरई तौर पर उचित हो।
- حَقًّا: स्थिर और अनिवार्य अधिकार।
- الْمُتَّقِينَ: अल्लाह से डरने वाले और उसकी नाफ़रमानी से बचने वाले लोग।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला ने अपने बंदों पर यह फ़र्ज़ ठहराया है कि जब उनमें से किसी के सामने मौत के निशान और उसके कारण (जैसे गंभीर बीमारी) आ जाएँ, और उसने माल छोड़ा हो, तो उसे चाहिए कि वह अपने माता-पिता और रिश्तेदारों के लिए वसीयत करे। यह वसीयत न्याय और भलाई के साथ होनी चाहिए—यानी उसमें किसी ग़रीब को छोड़कर अमीर को न दिया जाए, और माल का एक तिहाई से अधिक भी न हो। यह एक स्थिर और अनिवार्य अधिकार है, जो उन लोगों पर है जो अल्लाह से डरते हैं और उसकी इताअत करते हैं।
यह हुक्म इस्लाम के शुरुआती दौर में फ़र्ज़ था, जब वसीयत के ज़रिए माता-पिता और रिश्तेदारों के लिए हिस्सा मुक़र्रर किया जाता था। लेकिन बाद में अल्लाह ने वारसी (मीरास) की आयतें नाज़िल कीं, जिनमें हर वारिस का हिस्सा स्पष्ट रूप से बयान कर दिया गया। इसलिए यह वसीयत का हुक्म उन आयतों से मंसूख़ (रद्द) हो गया, और अब वारिसों को उनके निर्धारित हिस्से मीरास के ज़रिए मिलते हैं। हालाँकि, ग़ैर-वारिसों के लिए वसीयत करना अब भी जायज़ और अच्छा काम है, बशर्ते वह एक तिहाई से अधिक न हो।
यह आयत हमें सिखाती है कि मौत से पहले अपने पीछे छोड़े जाने वाले माल के बारे में सोचना चाहिए। एक मुसलमान को चाहिए कि वह अपने रिश्तेदारों और माता-पिता के साथ भलाई करे, और अपनी मृत्यु से पहले उनके हक़ का ख़्याल रखे। यही तक़वा (अल्लाह का डर) है—कि इंसान अल्लाह के हुक्मों को पूरा करे और अपने पीछे किसी को नुक़सान या बेइंसाफ़ी का शिकार न बनाए।
अल्लाह ने इस आयत में वसीयत को "हक़" कहा है, यानी यह कोई साधारण सलाह नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी है। जो लोग अल्लाह से डरते हैं, वे इस हुक्म को पूरा करने में कसर नहीं करते। यह आयत हमें यह भी बताती है कि इस्लाम में रिश्तेदारों और माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार कितना अहम है—यहाँ तक कि मौत के समय भी उनके हक़ का ख़्याल रखने का हुक्म दिया गया।
आज हमें इससे सबक़ लेना चाहिए कि अपने माता-पिता और रिश्तेदारों के साथ भलाई करें, उनके हक़ अदा करें, और अपनी मृत्यु से पहले अपने माल का सही इंतज़ाम करें ताकि किसी का हक़ मारा न जाए। यही अल्लाह की रज़ा का ज़रिया है और यही तक़वा की निशानी है। अल्लाह हमें इस तौफ़ीक़ दे कि हम अपने फ़राइज़ को पूरा करें और अपने रिश्तेदारों के साथ भलाई करें। आमीन।
📜 आयत 178-182 — सूरा अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 180
सूरा अल-बकरा आयत 180 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (मुसलमानों) तुम को हुक्म दिया जाता है कि जब तुम…सूरा आयत 180/286 — सूरा अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-बकरा सुनें, सूरा अल-बकरा अनुवाद, सूरा अल-बकरा mp3, सूरा अल-बकरा pdf. आयत 178–182. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, September 29, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए


