अल-बकरा · 43/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِعِينَ ۝٤٣
Wa aqeemus salaata wa aatuz zakaata warka`oo ma`ar raaki`een
📖 हिंदी अर्थ
और ज़कात दिया करो और जो लोग (हमारे सामने) इबादत के लिए झुकते हैं उनके साथ तुम भी झुका करो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ: नमाज़ को उसके सही तरीके, समय और शर्तों के साथ स्थापित करो।
  • وَآتُوا الزَّكَاةَ: अपने माल की अनिवार्य ज़कात अदा करो।
  • وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِعِينَ: झुकने वालों (नमाज़ पढ़ने वालों) के साथ झुको, यानी सामूहिक रूप से नमाज़ अदा करो।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला बनी इसराईल को संबोधित करते हुए उन्हें और उनके बाद सभी मुसलमानों को निर्देश देता है कि वे इस्लाम के दीन में पूरी तरह शामिल हो जाएँ। इस आयत में तीन महत्वपूर्ण आदेश दिए गए हैं:

पहला, नमाज़ की स्थापना — यानी नमाज़ को उसके सही तरीके से, उसके निर्धारित समयों पर, उसके सभी रुक्न (स्तंभों), वाजिबात (आवश्यक कर्तव्यों) और सुन्नतों के साथ अदा करना। नमाज़ सिर्फ़ औपचारिकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि दिल की उपस्थिति और खुशू (विनम्रता) के साथ अदा की जानी चाहिए, जैसा कि नबी मुहम्मद ﷺ ने सिखाया।

दूसरा, ज़कात की अदायगी — जो माल अल्लाह ने इंसान को दिया है, उसमें से निर्धारित हिस्सा (ढाई प्रतिशत) अल्लाह के बताए अनुसार ज़रूरतमंदों को देना। यह माल की पवित्रता का ज़रिया है और समाज में समानता व भाईचारे को बढ़ाता है।

तीसरा, रुकू करने वालों के साथ रुकू करना — इसका अर्थ है मुसलमानों की जमात (सामूहिकता) के साथ नमाज़ अदा करना। यह अकेले नमाज़ पढ़ने के बजाय सामूहिक नमाज़ की तरफ़ प्रोत्साहित करता है, क्योंकि जमात के साथ नमाज़ पढ़ने में अल्लाह की रहमत और बरकत अधिक होती है। यह मुसलमानों के बीच एकता और भाईचारे का प्रतीक भी है।

फ़ायदे (सीख):

  1. नमाज़ और ज़कात को एक साथ जोड़ा गया है, जो सिखाता है कि अल्लाह के साथ बंदे का रिश्ता (नमाज़) और बंदों के साथ रिश्ता (ज़कात) दोनों एक साथ ज़रूरी हैं। सिर्फ़ इबादत से काम नहीं चलता, बल्कि समाज की भलाई के लिए भी काम करना चाहिए।
  2. सामूहिक नमाज़ (जमात) की तरफ़ प्रोत्साहन मिलता है, जो मुसलमानों को आपस में जोड़ता है और उनके दिलों में एकता पैदा करता है।
  3. यह आयत इस बात की तरफ़ इशारा करती है कि इस्लाम सिर्फ़ व्यक्तिगत धर्म नहीं है, बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था है जिसमें हर व्यक्ति को दूसरों के साथ मिलकर अल्लाह की इबादत करनी चाहिए और समाज के कमज़ोर लोगों का ख़्याल रखना चाहिए।
  4. नमाज़ और ज़कात की पाबंदी इंसान को पापों से रोकती है और उसके दिल को पवित्र करती है, जिससे वह एक अच्छा इंसान और समाज का उपयोगी सदस्य बनता है।


📜 आयत 41-45 — अल-बकरा

41وَآمِنُوا بِمَا أَنزَلْتُ مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَكُمْ وَلَا تَكُونُوا أَوَّلَ كَافِرٍ بِهِ ۖ وَلَا تَشْتَرُوا بِآيَاتِي ثَمَنًا قَلِيلًا وَإِيَّايَ فَاتَّقُونِ
और जो (कुरान) मैंने नाज़िल किया वह उस किताब (तौरेत) की (भी) तसदीक़ करता हूँ जो तुम्हारे पास है और तुम सबसे चले उसके इन्कार पर मौजूद न हो जाओ और मेरी आयतों के बदले थोड़ी क़ीमत (दुनयावी फायदा) न लो और मुझ ही से डरते रहो
42وَلَا تَلْبِسُوا الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُوا الْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
और हक़ को बातिल के साथ न मिलाओ और हक़ बात को न छिपाओ हालाँकि तुम जानते हो और पाबन्दी से नमाज़ अदा करो
43وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِعِينَ
और ज़कात दिया करो और जो लोग (हमारे सामने) इबादत के लिए झुकते हैं उनके साथ तुम भी झुका करो
44۞ أَتَأْمُرُونَ النَّاسَ بِالْبِرِّ وَتَنسَوْنَ أَنفُسَكُمْ وَأَنتُمْ تَتْلُونَ الْكِتَابَ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
और तुम लोगों से नेकी करने को कहते हो और अपनी ख़बर नहीं लेते हालाँकि तुम किताबे खुदा को (बराबर) रटा करते हो तो तुम क्या इतना भी नहीं समझते
45وَاسْتَعِينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلَاةِ ۚ وَإِنَّهَا لَكَبِيرَةٌ إِلَّا عَلَى الْخَاشِعِينَ
और (मुसीबत के वक्त) सब्र और नमाज़ का सहारा पकड़ो और अलबत्ता नमाज़ दूभर तो है मगर उन ख़ाक़सारों पर (नहीं) जो बख़ूबी जानते हैं
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अनुवाद — अल-बकरा 43

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Tuesday, August 18, 2026

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