अल-बकरा · 44/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
۞ أَتَأْمُرُونَ النَّاسَ بِالْبِرِّ وَتَنسَوْنَ أَنفُسَكُمْ وَأَنتُمْ تَتْلُونَ الْكِتَابَ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ۝٤٤
Ataamuroonan naasa bilbirri wa tansawna anfusakum wa antum tatloonal Kitaab; afalaa ta`qiloon
📖 हिंदी अर्थ
और तुम लोगों से नेकी करने को कहते हो और अपनी ख़बर नहीं लेते हालाँकि तुम किताबे खुदा को (बराबर) रटा करते हो तो तुम क्या इतना भी नहीं समझते
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • अल-बिर्र (الْبِرّ): नेकी, भलाई, ईमान और आज्ञाकारिता।
  • तन्सौन (تَنْسَوْنَ): तुम भूल जाते हो — अर्थात अपने आप को छोड़ देते हो, उस पर अमल नहीं करते।
  • तत्लून (تَتْلُونَ): तुम पढ़ते हो (तिलावत करते हो)।
  • अफ़ला तअ़्क़िलून (أَفَلَا تَعْقِلُونَ): क्या तुम अक़्ल (समझ-बूझ) का इस्तेमाल नहीं करते?

तफ़सीर:

यह आयत उन लोगों को नसीहत करती है जो दूसरों को भलाई का हुक्म देते हैं, लेकिन खुद उस पर अमल नहीं करते। अल्लाह तआला फ़रमाता है: “क्या तुम लोगों को नेकी का हुक्म देते हो और अपने आप को भूल जाते हो, हालाँकि तुम किताब (तौरात) पढ़ते हो? क्या तुम अक़्ल नहीं रखते?”

यह आयत यहूदी विद्वानों के बारे में उतरी, जो अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से कहते थे कि मुहम्मद ﷺ के दीन पर साबित रहो, उनका दीन हक़ है और उनकी बात सच्ची है — लेकिन वे खुद उन पर ईमान नहीं लाते थे। वे तौरात पढ़ते थे, जिसमें मुहम्मद ﷺ की निशानियाँ और गुण मौजूद थे, फिर भी वे उनका अनुसरण करने से मुँह मोड़ते थे।

अल्लाह तआला उन्हें उनके इस बुरे काम पर टोकते हुए फ़रमाता है: “क्या तुम अक़्ल का इस्तेमाल नहीं करते?” यानी अगर तुम सच में समझदार होते, तो पहले खुद उस हक़ को क़बूल करते जिसकी तरफ़ दूसरों को बुलाते हो। यह एक बहुत बड़ी नसीहत है — इंसान को चाहिए कि वह दूसरों को भलाई की दावत देने से पहले खुद उस पर अमल करे, क्योंकि अमल के बिना सिर्फ़ ज़बान से कहना लोगों पर असर नहीं डालता।

यह आयत हमें सिखाती है कि दावत और नसीहत का सबसे बड़ा सबूत खुद हमारा अमल है। जब हम दूसरों को नेकी की तरफ़ बुलाते हैं, तो हमें सबसे पहले खुद उस पर चलना चाहिए। अल्लाह तआला ने इस आयत में उन लोगों की मज़म्मत (निंदा) की है जो दूसरों को भलाई का हुक्म देते हैं लेकिन खुद उससे ग़ाफ़िल रहते हैं।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमारे लिए एक आईना है। हमें चाहिए कि हम दूसरों को नेकी की दावत दें, लेकिन साथ ही अपनी ज़िंदगी को भी उसी नेकी पर ढालें। जब हमारा अमल हमारी बात की तस्दीक़ करेगा, तो हमारी दावत ज़्यादा असरदार होगी। अल्लाह तआला हमें अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए — आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 42-46 — अल-बकरा

42وَلَا تَلْبِسُوا الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُوا الْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
और हक़ को बातिल के साथ न मिलाओ और हक़ बात को न छिपाओ हालाँकि तुम जानते हो और पाबन्दी से नमाज़ अदा करो
43وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِعِينَ
और ज़कात दिया करो और जो लोग (हमारे सामने) इबादत के लिए झुकते हैं उनके साथ तुम भी झुका करो
44۞ أَتَأْمُرُونَ النَّاسَ بِالْبِرِّ وَتَنسَوْنَ أَنفُسَكُمْ وَأَنتُمْ تَتْلُونَ الْكِتَابَ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
और तुम लोगों से नेकी करने को कहते हो और अपनी ख़बर नहीं लेते हालाँकि तुम किताबे खुदा को (बराबर) रटा करते हो तो तुम क्या इतना भी नहीं समझते
45وَاسْتَعِينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلَاةِ ۚ وَإِنَّهَا لَكَبِيرَةٌ إِلَّا عَلَى الْخَاشِعِينَ
और (मुसीबत के वक्त) सब्र और नमाज़ का सहारा पकड़ो और अलबत्ता नमाज़ दूभर तो है मगर उन ख़ाक़सारों पर (नहीं) जो बख़ूबी जानते हैं
46الَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَاقُو رَبِّهِمْ وَأَنَّهُمْ إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
कि वह अपने परवरदिगार की बारगाह में हाज़िर होंगे और ज़रूर उसकी तरफ लौट जाएँगे
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अनुवाद — अल-बकरा 44

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Tuesday, August 18, 2026

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