अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- أَقِيمُوا الصَّلَاةَ: नमाज़ को पूरी व्यवस्था के साथ, उसके अदब और शर्तों का पालन करते हुए अदा करो।
- آتُوا الزَّكَاةَ: ज़कात (अनिवार्य दान) उसके हक़दारों को दो।
- أَطِيعُوا الرَّسُولَ: रसूल (ﷺ) की आज्ञा का पालन करो, जो कुछ वे आदेश दें उसे मानो और जिससे रोकें उससे बचो।
- لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ: ताकि तुम पर रहम किया जाए।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस पवित्र आयत में अपने बंदों को तीन ऐसे महत्वपूर्ण आदेश दे रहा है जो उनकी दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई की कुंजी हैं। पहला आदेश नमाज़ क़ायम करने का है, यानी नमाज़ को सिर्फ़ पढ़ना ही नहीं, बल्कि उसे पूरी पाबंदी, ख़ुशू-ओ-ख़ुज़ू (विनम्रता और एकाग्रता) के साथ, उसके नियत समय पर अदा करना। नमाज़ ही वह रिश्ता है जो बंदे को उसके रब से जोड़ता है, और यही वह अमल है जो इंसान को बुराईयों और गुनाहों से रोकती है। दूसरा आदेश ज़कात अदा करने का है, यानी अपने माल में से अल्लाह का हक़ निकालकर उसे मुस्तहिक़ (हक़दार) लोगों तक पहुँचाना। ज़कात माल को पाक करती है, उसमें बरकत देती है और समाज में ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के प्रति हमदर्दी और भाईचारे का जज़्बा पैदा करती है। तीसरा आदेश रसूल (ﷺ) की इताअत (आज्ञापालन) का है, क्योंकि रसूल की इताअत ही अल्लाह की इताअत है। जो उनकी सुन्नत पर चलता है, वह सीधे रास्ते पर चलता है।
इन तीनों आदेशों का नतीजा बताते हुए अल्लाह फ़रमाता है कि ऐसा करो "ताकि तुम पर रहम किया जाए"। यानी ये सारे अमल रहमत-ए-इलाही हासिल करने का ज़रिया हैं। जब बंदा नमाज़ के ज़रिए अल्लाह से जुड़ता है, ज़कात के ज़रिए बंदों से जुड़ता है, और रसूल (ﷺ) की इताअत के ज़रिए उनके नक़्शे-क़दम पर चलता है, तो अल्लाह की रहमत उस पर नाज़िल होती है। यह रहमत ही उसे दुनिया में सुकून और आख़िरत में जन्नत तक पहुँचाने वाली है।
प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें बता रही है कि अल्लाह की रहमत पाने का रास्ता बहुत आसान है — बस नमाज़ क़ायम करो, ज़कात दो, और रसूल (ﷺ) की इताअत करो। यही तीन चीज़ें इंसान को मोमिन बनाती हैं, उसके दिल को साफ़ करती हैं, उसके माल को पाक करती हैं और उसकी ज़िंदगी को बरकतों से भर देती हैं। अगर हम इन तीनों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लें, तो हमें कभी किसी चीज़ की कमी नहीं रहेगी, और अल्लाह की रहमत हमारे साथ होगी। याद रखिए, यह रहमत ही वह चीज़ है जो हमें जहन्नुम की आग से बचाएगी और जन्नत की राह दिखाएगी। आइए, हम सब इस आयत पर अमल करने का पक्का इरादा करें और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रहमत से भर लें।
📜 आयत 54-58 — अन-नूर
अनुवाद — अन-नूर 56
सूरा अन-नूर आयत 56 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और (ऐ ईमानदारों) नमाज़ पाबन्दी से पढ़ा करो और ज़कात…सूरा आयत 56/64 — अन-नूर النور (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अन-नूर सुनें, अन-नूर अनुवाद, अन-नूर mp3, अन-नूर pdf. आयत 54–58. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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