अन-नूर · 56/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ۝٥٦
Wa aqeemus Salaata wa aatuz Zakaata wa atee`ur Rasoola la`allakum turhamoon
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ ईमानदारों) नमाज़ पाबन्दी से पढ़ा करो और ज़कात दिया करो और (दिल से) रसूल की इताअत करो ताकि तुम पर रहम किया जाए
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَقِيمُوا الصَّلَاةَ: नमाज़ को पूरी व्यवस्था के साथ, उसके अदब और शर्तों का पालन करते हुए अदा करो।
  • آتُوا الزَّكَاةَ: ज़कात (अनिवार्य दान) उसके हक़दारों को दो।
  • أَطِيعُوا الرَّسُولَ: रसूल (ﷺ) की आज्ञा का पालन करो, जो कुछ वे आदेश दें उसे मानो और जिससे रोकें उससे बचो।
  • لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ: ताकि तुम पर रहम किया जाए।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस पवित्र आयत में अपने बंदों को तीन ऐसे महत्वपूर्ण आदेश दे रहा है जो उनकी दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई की कुंजी हैं। पहला आदेश नमाज़ क़ायम करने का है, यानी नमाज़ को सिर्फ़ पढ़ना ही नहीं, बल्कि उसे पूरी पाबंदी, ख़ुशू-ओ-ख़ुज़ू (विनम्रता और एकाग्रता) के साथ, उसके नियत समय पर अदा करना। नमाज़ ही वह रिश्ता है जो बंदे को उसके रब से जोड़ता है, और यही वह अमल है जो इंसान को बुराईयों और गुनाहों से रोकती है। दूसरा आदेश ज़कात अदा करने का है, यानी अपने माल में से अल्लाह का हक़ निकालकर उसे मुस्तहिक़ (हक़दार) लोगों तक पहुँचाना। ज़कात माल को पाक करती है, उसमें बरकत देती है और समाज में ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के प्रति हमदर्दी और भाईचारे का जज़्बा पैदा करती है। तीसरा आदेश रसूल (ﷺ) की इताअत (आज्ञापालन) का है, क्योंकि रसूल की इताअत ही अल्लाह की इताअत है। जो उनकी सुन्नत पर चलता है, वह सीधे रास्ते पर चलता है।

इन तीनों आदेशों का नतीजा बताते हुए अल्लाह फ़रमाता है कि ऐसा करो "ताकि तुम पर रहम किया जाए"। यानी ये सारे अमल रहमत-ए-इलाही हासिल करने का ज़रिया हैं। जब बंदा नमाज़ के ज़रिए अल्लाह से जुड़ता है, ज़कात के ज़रिए बंदों से जुड़ता है, और रसूल (ﷺ) की इताअत के ज़रिए उनके नक़्शे-क़दम पर चलता है, तो अल्लाह की रहमत उस पर नाज़िल होती है। यह रहमत ही उसे दुनिया में सुकून और आख़िरत में जन्नत तक पहुँचाने वाली है।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें बता रही है कि अल्लाह की रहमत पाने का रास्ता बहुत आसान है — बस नमाज़ क़ायम करो, ज़कात दो, और रसूल (ﷺ) की इताअत करो। यही तीन चीज़ें इंसान को मोमिन बनाती हैं, उसके दिल को साफ़ करती हैं, उसके माल को पाक करती हैं और उसकी ज़िंदगी को बरकतों से भर देती हैं। अगर हम इन तीनों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लें, तो हमें कभी किसी चीज़ की कमी नहीं रहेगी, और अल्लाह की रहमत हमारे साथ होगी। याद रखिए, यह रहमत ही वह चीज़ है जो हमें जहन्नुम की आग से बचाएगी और जन्नत की राह दिखाएगी। आइए, हम सब इस आयत पर अमल करने का पक्का इरादा करें और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रहमत से भर लें।

🎧 सुनें

📜 आयत 54-58 — अन-नूर

54قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا عَلَيْهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيْكُم مَّا حُمِّلْتُمْ ۖ وَإِن تُطِيعُوهُ تَهْتَدُوا ۚ وَمَا عَلَى الرَّسُولِ إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ख़ुदा की इताअत करो और रसूल की इताअत करो इस पर भी अगर तुम सरताबी करोगे तो बस रसूल पर इतना ही (तबलीग़) वाजिब है जिसके वह ज़िम्मेदार किए गए हैं और जिसके ज़िम्मेदार तुम बनाए गए हो तुम पर वाजिब है और अगर तुम उसकी इताअत करोगे तो हिदायत पाओगे और रसूल पर तो सिर्फ साफ तौर पर (एहकाम का) पहुँचाना फर्ज है
55وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِي الْأَرْضِ كَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ دِينَهُمُ الَّذِي ارْتَضَىٰ لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُم مِّن بَعْدِ خَوْفِهِمْ أَمْنًا ۚ يَعْبُدُونَنِي لَا يُشْرِكُونَ بِي شَيْئًا ۚ وَمَن كَفَرَ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ
(ऐ ईमानदारों) तुम में से जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उन से ख़ुदा ने वायदा किया कि उन को (एक न एक) दिन रुए ज़मीन पर ज़रुर (अपना) नाएब मुक़र्रर करेगा जिस तरह उन लोगों को नाएब बनाया जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं और जिस दीन को उसने उनके लिए पसन्द फरमाया है (इस्लाम) उस पर उन्हें ज़रुर ज़रुर पूरी क़ुदरत देगा और उनके ख़ाएफ़ होने के बाद (उनकी हर आस को) अमन से ज़रुर बदल देगा कि वह (इत्मेनान से) मेरी ही इबादत करेंगे और किसी को हमारा शरीक न बनाएँगे और जो शख्स इसके बाद भी नाशुक्री करे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं
56وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
और (ऐ ईमानदारों) नमाज़ पाबन्दी से पढ़ा करो और ज़कात दिया करो और (दिल से) रसूल की इताअत करो ताकि तुम पर रहम किया जाए
57لَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا مُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ ۚ وَمَأْوَاهُمُ النَّارُ ۖ وَلَبِئْسَ الْمَصِيرُ
और (ऐ रसूल) तुम ये ख्याल न करो कि कुफ्फार (इधर उधर) ज़मीन मे (फैल कर हमें) आजिज़ कर देगें (ये ख़ुद आजिज़ हो जाएगें) और उनका ठिकाना तो जहन्नुम है और क्या बुरा ठिकाना है
58يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لِيَسْتَأْذِنكُمُ الَّذِينَ مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ وَالَّذِينَ لَمْ يَبْلُغُوا الْحُلُمَ مِنكُمْ ثَلَاثَ مَرَّاتٍ ۚ مِّن قَبْلِ صَلَاةِ الْفَجْرِ وَحِينَ تَضَعُونَ ثِيَابَكُم مِّنَ الظَّهِيرَةِ وَمِن بَعْدِ صَلَاةِ الْعِشَاءِ ۚ ثَلَاثُ عَوْرَاتٍ لَّكُمْ ۚ لَيْسَ عَلَيْكُمْ وَلَا عَلَيْهِمْ جُنَاحٌ بَعْدَهُنَّ ۚ طَوَّافُونَ عَلَيْكُم بَعْضُكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآيَاتِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
ऐ ईमानदारों तुम्हारी लौन्डी ग़ुलाम और वह लड़के जो अभी तक बुलूग़ की हद तक नहीं पहुँचे हैं उनको भी चाहिए कि (दिन रात में) तीन मरतबा (तुम्हारे पास आने की) तुमसे इजाज़त ले लिया करें तब आएँ (एक) नमाज़ सुबह से पहले और (दूसरे) जब तुम (गर्मी से) दोपहर को (सोने के लिए मामूलन) कपड़े उतार दिया करते हो (तीसरी) नमाजे इशा के बाद (ये) तीन (वक्त) तुम्हारे परदे के हैं इन अवक़ात के अलावा (बे अज़न आने मे) न तुम पर कोई इल्ज़ाम है-न उन पर (क्योंकि) उन अवक़ात के अलावा (ब ज़रुरत या बे ज़रुरत) लोग एक दूसरे के पास चक्कर लगाया करते हैं- यँ ख़ुदा (अपने) एहकाम तुम से साफ साफ बयान करता है और ख़ुदा तो बड़ा वाकिफ़कार हकीम है
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अनुवाद — अन-नूर 56

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सूरा आयत 56/64 — अन-नूर النور (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अन-नूर सुनें, अन-नूर अनुवाद, अन-नूर mp3, अन-नूर pdf. आयत 54–58. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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