अन-नूर · 57/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
لَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا مُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ ۚ وَمَأْوَاهُمُ النَّارُ ۖ وَلَبِئْسَ الْمَصِيرُ ۝٥٧
Laa tahsabannal lazeena kafaroo mu`jizeena fil ard; wa maawaahumun Naaru wa labi`sal maseer
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) तुम ये ख्याल न करो कि कुफ्फार (इधर उधर) ज़मीन मे (फैल कर हमें) आजिज़ कर देगें (ये ख़ुद आजिज़ हो जाएगें) और उनका ठिकाना तो जहन्नुम है और क्या बुरा ठिकाना है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • مُعْجِزِينَ: अल्लाह को विवश करने वाले, यानी उसकी पकड़ से बच निकलने वाले।
  • مَأْوَاهُمُ: उनका ठिकाना, उनका आश्रय स्थल।
  • مَصِيرُ: अंतिम परिणाम, जहाँ वे जाकर रुकेंगे।

तफसीर:

ऐ नबी! आप कभी यह ख़याल न करें कि जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार किया है, वे धरती में अल्लाह को मात देने वाले या उसकी पकड़ से बच निकलने वाले हैं। यह उनका भ्रम है कि वे अपनी ताक़त, साज़िशों या संसाधनों के बल पर अल्लाह के इरादे को विफल कर देंगे। अल्लाह उन पर पूरी तरह क़ाबू रखता है, और जब चाहेगा उन्हें पकड़ लेगा। उनकी यह अस्थायी सफलता और सांसारिक शक्ति उन्हें अल्लाह की पकड़ से नहीं बचा सकती।

उनका असली ठिकाना आख़िरत में आग है — जहन्नुम की भयानक आग। वही उनका अंतिम पड़ाव होगा, और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है। जो व्यक्ति अपने रब को ठुकरा दे, उसके लिए इससे बुरा अंजाम और क्या हो सकता है कि उसे हमेशा के लिए आग में झोंक दिया जाए।

यह आयत सिर्फ़ नबी ﷺ को संबोधित नहीं है, बल्कि पूरी उम्मत के लिए एक सबक़ और तसल्ली है। जब आप देखें कि बुराई करने वाले लोग दुनिया में फल-फूल रहे हैं और सच्चाई के पैरोकारों पर मुसीबतें आ रही हैं, तो घबराइए नहीं। यह दुनिया इम्तिहान की जगह है, इंसाफ़ की जगह नहीं। अल्लाह ने अपने वादे को सच कर दिखाना है — अच्छाई की जीत होगी और बुराई का अंत तय है।

इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी अल्लाह की ताक़त पर शक नहीं करना चाहिए। चाहे हालात कितने भी विपरीत क्यों न हों, अल्लाह का दीन बुलंद होकर रहेगा। और जो लोग इस दीन के खिलाफ साज़िशें रचते हैं, उनका अंजाम तय है — जहन्नुम की आग। यह हमारे लिए एक चेतावनी भी है कि हम खुद को उन लोगों में न पाएँ जिनका ठिकाना आग है, बल्कि हम उन लोगों में हों जो अल्लाह की रहमत और जन्नत के हक़दार बनें।

याद रखिए, अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है, और उसका फैसला कभी टलता नहीं। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह सब्र और यक़ीन के साथ अपने दीन पर क़ायम रहे, और अल्लाह से डरते हुए उसकी इबादत करे। जो लोग अल्लाह के रास्ते में सब्र करते हैं, उनके लिए बड़ी खुशखबरी है — उनका अंजाम जन्नत है, और जन्नत से बेहतर कोई ठिकाना नहीं।



📜 आयत 55-59 — अन-नूर

55وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِي الْأَرْضِ كَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ دِينَهُمُ الَّذِي ارْتَضَىٰ لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُم مِّن بَعْدِ خَوْفِهِمْ أَمْنًا ۚ يَعْبُدُونَنِي لَا يُشْرِكُونَ بِي شَيْئًا ۚ وَمَن كَفَرَ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ
(ऐ ईमानदारों) तुम में से जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उन से ख़ुदा ने वायदा किया कि उन को (एक न एक) दिन रुए ज़मीन पर ज़रुर (अपना) नाएब मुक़र्रर करेगा जिस तरह उन लोगों को नाएब बनाया जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं और जिस दीन को उसने उनके लिए पसन्द फरमाया है (इस्लाम) उस पर उन्हें ज़रुर ज़रुर पूरी क़ुदरत देगा और उनके ख़ाएफ़ होने के बाद (उनकी हर आस को) अमन से ज़रुर बदल देगा कि वह (इत्मेनान से) मेरी ही इबादत करेंगे और किसी को हमारा शरीक न बनाएँगे और जो शख्स इसके बाद भी नाशुक्री करे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं
56وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
और (ऐ ईमानदारों) नमाज़ पाबन्दी से पढ़ा करो और ज़कात दिया करो और (दिल से) रसूल की इताअत करो ताकि तुम पर रहम किया जाए
57لَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا مُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ ۚ وَمَأْوَاهُمُ النَّارُ ۖ وَلَبِئْسَ الْمَصِيرُ
और (ऐ रसूल) तुम ये ख्याल न करो कि कुफ्फार (इधर उधर) ज़मीन मे (फैल कर हमें) आजिज़ कर देगें (ये ख़ुद आजिज़ हो जाएगें) और उनका ठिकाना तो जहन्नुम है और क्या बुरा ठिकाना है
58يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لِيَسْتَأْذِنكُمُ الَّذِينَ مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ وَالَّذِينَ لَمْ يَبْلُغُوا الْحُلُمَ مِنكُمْ ثَلَاثَ مَرَّاتٍ ۚ مِّن قَبْلِ صَلَاةِ الْفَجْرِ وَحِينَ تَضَعُونَ ثِيَابَكُم مِّنَ الظَّهِيرَةِ وَمِن بَعْدِ صَلَاةِ الْعِشَاءِ ۚ ثَلَاثُ عَوْرَاتٍ لَّكُمْ ۚ لَيْسَ عَلَيْكُمْ وَلَا عَلَيْهِمْ جُنَاحٌ بَعْدَهُنَّ ۚ طَوَّافُونَ عَلَيْكُم بَعْضُكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآيَاتِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
ऐ ईमानदारों तुम्हारी लौन्डी ग़ुलाम और वह लड़के जो अभी तक बुलूग़ की हद तक नहीं पहुँचे हैं उनको भी चाहिए कि (दिन रात में) तीन मरतबा (तुम्हारे पास आने की) तुमसे इजाज़त ले लिया करें तब आएँ (एक) नमाज़ सुबह से पहले और (दूसरे) जब तुम (गर्मी से) दोपहर को (सोने के लिए मामूलन) कपड़े उतार दिया करते हो (तीसरी) नमाजे इशा के बाद (ये) तीन (वक्त) तुम्हारे परदे के हैं इन अवक़ात के अलावा (बे अज़न आने मे) न तुम पर कोई इल्ज़ाम है-न उन पर (क्योंकि) उन अवक़ात के अलावा (ब ज़रुरत या बे ज़रुरत) लोग एक दूसरे के पास चक्कर लगाया करते हैं- यँ ख़ुदा (अपने) एहकाम तुम से साफ साफ बयान करता है और ख़ुदा तो बड़ा वाकिफ़कार हकीम है
59وَإِذَا بَلَغَ الْأَطْفَالُ مِنكُمُ الْحُلُمَ فَلْيَسْتَأْذِنُوا كَمَا اسْتَأْذَنَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
और (ऐ ईमानदारों) जब तुम्हारे लड़के हदे बुलूग को पहुँचें तो जिस तरह उन के कब्ल (बड़ी उम्र) वाले (घर में आने की) इजाज़त ले लिया करते थे उसी तरह ये लोग भी इजाज़त ले लिया करें-यूँ ख़ुदा अपने एहकाम साफ साफ बयान करता है और ख़ुदा तो बड़ा वाकिफकार हकीम है
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अनुवाद — अन-नूर 57

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Tuesday, August 18, 2026

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