अन-नूर · 55/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِي الْأَرْضِ كَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ دِينَهُمُ الَّذِي ارْتَضَىٰ لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُم مِّن بَعْدِ خَوْفِهِمْ أَمْنًا ۚ يَعْبُدُونَنِي لَا يُشْرِكُونَ بِي شَيْئًا ۚ وَمَن كَفَرَ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ ۝٥٥
Wa`adal laahul lazeena aamanoo minkum wa `amilus saalihaati la yastakhlifan nahum fil ardi kamastakh lafal lazeena min qablihim wa la yumakkinanna lahum deenahumul lazir tadaa lahum wa la yubaddilannahum mim ba`di khawfihim amnaa; ya`budoonanee laayushrikoona bee shai`aa; wa man kafara ba`da zaalika fa ulaaa`ika humul faasiqoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ ईमानदारों) तुम में से जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उन से ख़ुदा ने वायदा किया कि उन को (एक न एक) दिन रुए ज़मीन पर ज़रुर (अपना) नाएब मुक़र्रर करेगा जिस तरह उन लोगों को नाएब बनाया जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं और जिस दीन को उसने उनके लिए पसन्द फरमाया है (इस्लाम) उस पर उन्हें ज़रुर ज़रुर पूरी क़ुदरत देगा और उनके ख़ाएफ़ होने के बाद (उनकी हर आस को) अमन से ज़रुर बदल देगा कि वह (इत्मेनान से) मेरी ही इबादत करेंगे और किसी को हमारा शरीक न बनाएँगे और जो शख्स इसके बाद भी नाशुक्री करे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ – अल्लाह उन्हें धरती का उत्तराधिकारी बनाएगा।
  • لَيُمَكِّنَنَّ – अवश्य स्थापित करेगा, शक्ति और स्थिरता प्रदान करेगा।
  • ارْتَضَى – जिसे उसने पसंद किया और चुना।
  • لَيُبَدِّلَنَّهُم – अवश्य बदल देगा (उनकी स्थिति)।
  • الْفَاسِقُونَ – आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, अवज्ञाकारी।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने अपने सच्चे और ईमानवाले बंदों से एक पवित्र वादा किया है—वह वादा जो कभी टूटता नहीं। जो लोग सच्चे दिल से ईमान लाए और अपने अमल को सुधारकर अच्छे कर्म किए, उनसे अल्लाह ने चार महान नेमतों का वादा किया है:

पहला वादा: अल्लाह उन्हें धरती का उत्तराधिकारी बनाएगा, जैसे उसने पहले के ईमानवालों को बनाया था—जैसे हज़रत दाऊद, सुलेमान और बनी इसराईल को। यानी जब ईमान और अमल-ए-सालिह की शर्त पूरी होगी, तो अल्लाह अपने बंदों को ज़मीन की बागडोर सौंप देता है।

दूसरा वादा: अल्लाह उनके दीन को—जो उसने खुद उनके लिए पसंद किया है, यानी इस्लाम को—शक्ति और स्थिरता प्रदान करेगा। दीन को इस कदर मज़बूत करेगा कि कोई ताकत उसे हिला न सके।

तीसरा वादा: अल्लाह उनके डर को अमन में बदल देगा। याद कीजिए, नबी करीम ﷺ और उनके साथियों ने मक्का में दस साल खौफ की ज़िंदगी बिताई, फिर हिजरत के बाद भी वे हथियारों के साथ सोते थे। लेकिन जब अल्लाह का वादा पूरा हुआ, तो उनका खौफ अमन में बदल गया और दीन ग़ालिब आ गया।

चौथी शर्त: यह सब कुछ उस हालत में मिलेगा जब वे अल्लाह की इबादत करें, उसके साथ किसी को शरीक न करें। यानी तौहीद और इख़लास ही असली कुंजी है।

फिर अल्लाह ने सख्त तनबीह की—जो इन नेमतों के बाद कुफ्र करे (यानी अल्लाह की नेमतों का इनकार करे या उसकी नाफ़रमानी में पड़ जाए), तो वह अल्लाह की आज्ञा से निकल जाने वाला फ़ासिक़ है।


दावती पहलू:

यह आयत हर उस मुसलमान के लिए उम्मीद की किरण है जो अल्लाह पर भरोसा रखता है। यह सिखाती है कि अल्लाह का वादा सच्चा है—बशर्ते हम ईमान और अमल-ए-सालिह की शर्त पूरी करें। आज अगर उम्मत कमज़ोर है, तो इसका हल यही है—ईमान को मज़बूत करो, अमल को सुधारो, और अल्लाह से वादा पूरा कराने का हक़ रखो। यह आयत हमें सिखाती है कि असली इज़्ज़त अल्लाह के पास है, और वह अपने नेक बंदों को कभी अकेला नहीं छोड़ता। अल्लाह से जुड़े रहो, उसकी इबादत को खालिस करो, और देखो कैसे वह तुम्हारे हालात बदल देता है—खौफ को अमन में, कमज़ोरी को ताकत में, और ज़िल्लत को इज़्ज़त में।



📜 आयत 53-57 — अन-नूर

53۞ وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ لَئِنْ أَمَرْتَهُمْ لَيَخْرُجُنَّ ۖ قُل لَّا تُقْسِمُوا ۖ طَاعَةٌ مَّعْرُوفَةٌ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ
और (ऐ रसूल) उन (मुनाफेक़ीन) ने तुम्हारी इताअत की ख़ुदा की सख्त से सख्त क़समें खाई कि अगर तुम उन्हें हुक्म दो तो बिला उज़्र (घर बार छोड़कर) निकल खडे हों- तुम कह दो कि क़समें न खाओ दस्तूर के मुवाफिक़ इताअत (इससे बेहतर) और बेशक तुम जो कुछ करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है
54قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا عَلَيْهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيْكُم مَّا حُمِّلْتُمْ ۖ وَإِن تُطِيعُوهُ تَهْتَدُوا ۚ وَمَا عَلَى الرَّسُولِ إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ख़ुदा की इताअत करो और रसूल की इताअत करो इस पर भी अगर तुम सरताबी करोगे तो बस रसूल पर इतना ही (तबलीग़) वाजिब है जिसके वह ज़िम्मेदार किए गए हैं और जिसके ज़िम्मेदार तुम बनाए गए हो तुम पर वाजिब है और अगर तुम उसकी इताअत करोगे तो हिदायत पाओगे और रसूल पर तो सिर्फ साफ तौर पर (एहकाम का) पहुँचाना फर्ज है
55وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِي الْأَرْضِ كَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ دِينَهُمُ الَّذِي ارْتَضَىٰ لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُم مِّن بَعْدِ خَوْفِهِمْ أَمْنًا ۚ يَعْبُدُونَنِي لَا يُشْرِكُونَ بِي شَيْئًا ۚ وَمَن كَفَرَ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ
(ऐ ईमानदारों) तुम में से जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उन से ख़ुदा ने वायदा किया कि उन को (एक न एक) दिन रुए ज़मीन पर ज़रुर (अपना) नाएब मुक़र्रर करेगा जिस तरह उन लोगों को नाएब बनाया जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं और जिस दीन को उसने उनके लिए पसन्द फरमाया है (इस्लाम) उस पर उन्हें ज़रुर ज़रुर पूरी क़ुदरत देगा और उनके ख़ाएफ़ होने के बाद (उनकी हर आस को) अमन से ज़रुर बदल देगा कि वह (इत्मेनान से) मेरी ही इबादत करेंगे और किसी को हमारा शरीक न बनाएँगे और जो शख्स इसके बाद भी नाशुक्री करे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं
56وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
और (ऐ ईमानदारों) नमाज़ पाबन्दी से पढ़ा करो और ज़कात दिया करो और (दिल से) रसूल की इताअत करो ताकि तुम पर रहम किया जाए
57لَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا مُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ ۚ وَمَأْوَاهُمُ النَّارُ ۖ وَلَبِئْسَ الْمَصِيرُ
और (ऐ रसूल) तुम ये ख्याल न करो कि कुफ्फार (इधर उधर) ज़मीन मे (फैल कर हमें) आजिज़ कर देगें (ये ख़ुद आजिज़ हो जाएगें) और उनका ठिकाना तो जहन्नुम है और क्या बुरा ठिकाना है
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अनुवाद — अन-नूर 55

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Tuesday, August 18, 2026

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