आल-इमरान · 104/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَلْتَكُن مِّنكُمْ أُمَّةٌ يَدْعُونَ إِلَى الْخَيْرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ ۝١٠٤
Waltakum minkum ummatuny yad`oona ilal khairi wa yaamuroona bilma `roofi wa yanhawna `anil munkar; wa ulaaa`ika humul muflihoon
📖 हिंदी अर्थ
और तुमसे एक गिरोह ऐसे (लोगों का भी) तो होना चाहिये जो (लोगों को) नेकी की तरफ़ बुलाए अच्छे काम का हुक्म दे और बुरे कामों से रोके और ऐसे ही लोग (आख़ेरत में) अपनी दिली मुरादें पायेंगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अम्मत (أمة): एक समूह या जमात।
  • ख़ैर (الخير): हर वह अच्छा काम जो अल्लाह को पसंद हो, विशेषकर इस्लाम और ईमान।
  • मारूफ़ (المعروف): वह अच्छा काम जिसे शरियत ने अच्छा बताया हो और अक्ल भी उसे अच्छा समझे।
  • मुन्कर (المنكر): वह बुरा काम जिसे शरियत ने बुरा बताया हो और अक्ल भी उसे बुरा समझे।
  • मुफ़्लिहून (المفلحون): कामयाब और सफल लोग।

आयत की तफसीर:

अल्लाह तआला इस आयत में मोमिनों को निर्देश देता है कि उनमें से एक ऐसा समूह ज़रूर होना चाहिए जो लोगों को भलाई की ओर बुलाए, यानी लोगों को इस्लाम, ईमान और नेक कामों की दावत दे। यह समूह लोगों को अच्छे कामों का आदेश दे और बुरे कामों से रोके। अच्छे कामों से मतलब है वे सारे काम जिन्हें शरियत ने अच्छा करार दिया है और अक्ल भी उन्हें अच्छा समझती है, जैसे नमाज़, ज़कात, सच्चाई, अमानत, हुस्ने-अख़लाक़ आदि। बुरे कामों से मतलब है वे सारे काम जिन्हें शरियत ने बुरा बताया है और अक्ल भी उन्हें बुरा समझती है, जैसे झूठ, धोखा, चोरी, ज़ुल्म, शराब, ज़िना आदि।

यह आदेश सिर्फ़ एक तबके के लिए नहीं है, बल्कि हर मुकल्लफ़ (जिम्मेदार) मुसलमान पर यह फर्ज़ है कि वह अपनी हैसियत के मुताबिक अच्छे कामों का हुक्म दे और बुरे कामों से रोके। अगर किसी में ताकत हो तो हाथ से, वरना ज़ुबान से, और अगर यह भी न हो सके तो दिल से बुराई को बुरा जाने। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यही लोग (जो दावत, अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुन्कर का काम करते हैं) असली कामयाब और सफल लोग हैं, जिन्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में भलाई और सफलता मिलेगी।

फ़ायदे और सबक:

  1. इस आयत से पता चलता है कि अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुन्कर (अच्छे कामों का हुक्म देना और बुरे कामों से रोकना) इस्लाम का एक बुनियादी फर्ज़ है, जिसके बिना समाज सुधार नहीं सकता।
  2. यह आयत मुसलमानों को एक ज़िम्मेदारी देती है कि वे सिर्फ़ अपनी भलाई पर ध्यान न दें, बल्कि पूरे समाज की भलाई के लिए काम करें और लोगों को सीधे रास्ते पर लाने की कोशिश करें।
  3. दावत और अम्र बिल मारूफ़ का काम बड़ी नेकी है, और इस पर अल्लाह की तरफ से कामयाबी और सफलता का वादा है।
  4. यह आयत मुसलमानों को एकजुट होकर भलाई के कामों में आगे बढ़ने की तरग़ीब देती है, क्योंकि अल्लाह ने "मिन्कुम" (तुम में से) कहकर इस बात पर ज़ोर दिया है कि यह काम सामूहिक तौर पर होना चाहिए।
  5. इस आयत से यह भी पता चलता है कि इस्लाम सिर्फ़ निजी इबादत का नाम नहीं है, बल्कि यह एक पूरा निज़ाम-ए-हयात है जो समाज को अच्छाई और नेकी पर क़ायम करता है।


📜 आयत 102-106 — आल-इमरान

102يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِ وَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسْلِمُونَ
ऐ ईमान वालों ख़ुदा से डरो जितना उससे डरने का हक़ है और तुम (दीन) इस्लाम के सिवा किसी और दीन पर हरगिज़ न मरना
103وَاعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللَّهِ جَمِيعًا وَلَا تَفَرَّقُوا ۚ وَاذْكُرُوا نِعْمَتَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ كُنتُمْ أَعْدَاءً فَأَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِكُمْ فَأَصْبَحْتُم بِنِعْمَتِهِ إِخْوَانًا وَكُنتُمْ عَلَىٰ شَفَا حُفْرَةٍ مِّنَ النَّارِ فَأَنقَذَكُم مِّنْهَا ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ
और तुम सब के सब (मिलकर) ख़ुदा की रस्सी मज़बूती से थामे रहो और आपस में (एक दूसरे) के फूट न डालो और अपने हाल (ज़ार) पर ख़ुदा के एहसान को तो याद करो जब तुम आपस में (एक दूसरे के) दुश्मन थे तो ख़ुदा ने तुम्हारे दिलों में (एक दूसरे की) उलफ़त पैदा कर दी तो तुम उसके फ़ज़ल से आपस में भाई भाई हो गए और तुम गोया सुलगती हुईआग की भट्टी (दोज़ख) के लब पर (खडे) थे गिरना ही चाहते थे कि ख़ुदा ने तुमको उससे बचा लिया तो ख़ुदा अपने एहकाम यूं वाजेए करके बयान करता है ताकि तुम राहे रास्त पर आ जाओ
104وَلْتَكُن مِّنكُمْ أُمَّةٌ يَدْعُونَ إِلَى الْخَيْرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
और तुमसे एक गिरोह ऐसे (लोगों का भी) तो होना चाहिये जो (लोगों को) नेकी की तरफ़ बुलाए अच्छे काम का हुक्म दे और बुरे कामों से रोके और ऐसे ही लोग (आख़ेरत में) अपनी दिली मुरादें पायेंगे
105وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَاخْتَلَفُوا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُ ۚ وَأُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ
और तुम (कहीं) उन लोगों के ऐसे न हो जाना जो आपस में फूट डाल कर बैठ रहे और रौशन (दलील) आने के बाद भी एक मुंह एक ज़बान न रहे और ऐसे ही लोगों के वास्ते बड़ा (भारी) अज़ाब है
106يَوْمَ تَبْيَضُّ وُجُوهٌ وَتَسْوَدُّ وُجُوهٌ ۚ فَأَمَّا الَّذِينَ اسْوَدَّتْ وُجُوهُهُمْ أَكَفَرْتُم بَعْدَ إِيمَانِكُمْ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
(उस दिन से डरो) जिस दिन कुछ लोगों के चेहरे तो सफैद नूरानी होंगे और कुछ (लोगो) के चेहरे सियाह जिन लोगों के मुहॅ में कालिक होगी (उनसे कहा जायेगा) हाए क्यों तुम तो ईमान लाने के बाद काफ़िर हो गए थे अच्छा तो (लो) (अब) अपने कुफ़्र की सज़ा में अज़ाब (के मजे) चखो
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अनुवाद — आल-इमरान 104

सूरा आल-इमरान आयत 104 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और तुमसे एक गिरोह ऐसे (लोगों का भी) तो होना…

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Tuesday, August 18, 2026

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