अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- अम्मत (أمة): एक समूह या जमात।
- ख़ैर (الخير): हर वह अच्छा काम जो अल्लाह को पसंद हो, विशेषकर इस्लाम और ईमान।
- मारूफ़ (المعروف): वह अच्छा काम जिसे शरियत ने अच्छा बताया हो और अक्ल भी उसे अच्छा समझे।
- मुन्कर (المنكر): वह बुरा काम जिसे शरियत ने बुरा बताया हो और अक्ल भी उसे बुरा समझे।
- मुफ़्लिहून (المفلحون): कामयाब और सफल लोग।
आयत की तफसीर:
अल्लाह तआला इस आयत में मोमिनों को निर्देश देता है कि उनमें से एक ऐसा समूह ज़रूर होना चाहिए जो लोगों को भलाई की ओर बुलाए, यानी लोगों को इस्लाम, ईमान और नेक कामों की दावत दे। यह समूह लोगों को अच्छे कामों का आदेश दे और बुरे कामों से रोके। अच्छे कामों से मतलब है वे सारे काम जिन्हें शरियत ने अच्छा करार दिया है और अक्ल भी उन्हें अच्छा समझती है, जैसे नमाज़, ज़कात, सच्चाई, अमानत, हुस्ने-अख़लाक़ आदि। बुरे कामों से मतलब है वे सारे काम जिन्हें शरियत ने बुरा बताया है और अक्ल भी उन्हें बुरा समझती है, जैसे झूठ, धोखा, चोरी, ज़ुल्म, शराब, ज़िना आदि।
यह आदेश सिर्फ़ एक तबके के लिए नहीं है, बल्कि हर मुकल्लफ़ (जिम्मेदार) मुसलमान पर यह फर्ज़ है कि वह अपनी हैसियत के मुताबिक अच्छे कामों का हुक्म दे और बुरे कामों से रोके। अगर किसी में ताकत हो तो हाथ से, वरना ज़ुबान से, और अगर यह भी न हो सके तो दिल से बुराई को बुरा जाने। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यही लोग (जो दावत, अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुन्कर का काम करते हैं) असली कामयाब और सफल लोग हैं, जिन्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में भलाई और सफलता मिलेगी।
फ़ायदे और सबक:
- इस आयत से पता चलता है कि अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुन्कर (अच्छे कामों का हुक्म देना और बुरे कामों से रोकना) इस्लाम का एक बुनियादी फर्ज़ है, जिसके बिना समाज सुधार नहीं सकता।
- यह आयत मुसलमानों को एक ज़िम्मेदारी देती है कि वे सिर्फ़ अपनी भलाई पर ध्यान न दें, बल्कि पूरे समाज की भलाई के लिए काम करें और लोगों को सीधे रास्ते पर लाने की कोशिश करें।
- दावत और अम्र बिल मारूफ़ का काम बड़ी नेकी है, और इस पर अल्लाह की तरफ से कामयाबी और सफलता का वादा है।
- यह आयत मुसलमानों को एकजुट होकर भलाई के कामों में आगे बढ़ने की तरग़ीब देती है, क्योंकि अल्लाह ने "मिन्कुम" (तुम में से) कहकर इस बात पर ज़ोर दिया है कि यह काम सामूहिक तौर पर होना चाहिए।
- इस आयत से यह भी पता चलता है कि इस्लाम सिर्फ़ निजी इबादत का नाम नहीं है, बल्कि यह एक पूरा निज़ाम-ए-हयात है जो समाज को अच्छाई और नेकी पर क़ायम करता है।
📜 आयत 102-106 — आल-इमरान
अनुवाद — आल-इमरान 104
सूरा आल-इमरान आयत 104 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और तुमसे एक गिरोह ऐसे (लोगों का भी) तो होना…सूरा आयत 104/200 — आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: आल-इमरान सुनें, आल-इमरान अनुवाद, आल-इमरान mp3, आल-इमरान pdf. आयत 102–106. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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