आल-इमरान · 105/200
अनुवाद उच्चारण — सूरा आल-इमरान
وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَاخْتَلَفُوا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُ ۚ وَأُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ ۝١٠٥
Wa laa takoonoo kallazeena tafarraqoo wakhtalafoo mim ba`di maa jaaa`ahumul baiyinaat; wa ulaaa`ika lahum `azaabun `azeem
📖 हिंदी अर्थ
और तुम (कहीं) उन लोगों के ऐसे न हो जाना जो आपस में फूट डाल कर बैठ रहे और रौशन (दलील) आने के बाद भी एक मुंह एक ज़बान न रहे और ऐसे ही लोगों के वास्ते बड़ा (भारी) अज़ाब है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
0:00
0:00
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَفَرَّقُوا: अलग-अलग हो गए, टुकड़ों में बंट गए।
  • وَاخْتَلَفُوا: आपस में मतभेद किया, विरोधाभास किया।
  • الْبَيِّنَاتُ: स्पष्ट प्रमाण, खुले निशानियाँ और स्पष्ट आयतें।

व्याख्या:

हे ईमानवालों! तुम उन लोगों की तरह मत बनो, जो (अहले-किताब) अपने धर्म में फूट डालकर अलग-अलग गुटों और दलों में बँट गए, और उनके बीच आपसी दुश्मनी और नफरत फैल गई। यह सब उन्होंने उसके बाद किया, जब उनके पास अल्लाह की ओर से स्पष्ट प्रमाण और खुले निशानियाँ आ चुकी थीं, जो सत्य को उजागर कर रही थीं। उन्होंने जानबूझकर सत्य को छोड़कर अपनी मनमानी और हवस की پیروی की, और अपने धर्म के मूल सिद्धांतों में मतभेद किया। ऐसे लोगों के लिए अल्लाह की ओर से बहुत बड़ा और दर्दनाक अज़ाब तैयार है। यह एक सख्त चेतावनी है कि जो लोग सत्य स्पष्ट होने के बाद भी फूट डालते हैं और आपस में लड़ते हैं, उनका अंजाम बहुत बुरा होगा।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि इस्लाम में एकता और भाईचारे की कितनी अहमियत है। अल्लाह ने हमें फूट डालने और आपसी मतभेद से सख्त मना किया है, क्योंकि यह पिछली उम्मतों की बर्बादी का कारण बना।
  2. यह आयत हमें बताती है कि जब सत्य स्पष्ट हो जाए, तो उसे मान लेना चाहिए और उस पर अमल करना चाहिए। सत्य के बाद भी जिद और हठ करना अल्लाह की नाराज़गी का कारण बनता है।
  3. हमें चाहिए कि हम अपने धर्म में एकजुट रहें, छोटे-छोटे मतभेदों को बढ़ाकर आपसी दुश्मनी न पालें, बल्कि जो चीज़ें हमें एक करती हैं — जैसे तौहीद, रिसालत और आख़िरत पर ईमान — उन पर ध्यान दें।
  4. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हमें अहले-किताब की गलतियों से सबक लेना चाहिए, ताकि हम वही गलतियाँ न दोहराएँ जिनके कारण उन्हें अल्लाह का क्रोध और बड़ा अज़ाब मिला।
  5. अंत में, यह आयत हमें अल्लाह के दीन पर स्थिर रहने और उसकी रस्सी (क़ुरआन और सुन्नत) को मज़बूती से थामे रहने की तरग़ीब देती है, क्योंकि यही हमारी कामयाबी और निजात का ज़रिया है।


📜 आयत 103-107 — सूरा आल-इमरान

103وَاعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللَّهِ جَمِيعًا وَلَا تَفَرَّقُوا ۚ وَاذْكُرُوا نِعْمَتَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ كُنتُمْ أَعْدَاءً فَأَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِكُمْ فَأَصْبَحْتُم بِنِعْمَتِهِ إِخْوَانًا وَكُنتُمْ عَلَىٰ شَفَا حُفْرَةٍ مِّنَ النَّارِ فَأَنقَذَكُم مِّنْهَا ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ
और तुम सब के सब (मिलकर) ख़ुदा की रस्सी मज़बूती से थामे रहो और आपस में (एक दूसरे) के फूट न डालो और अपने हाल (ज़ार) पर ख़ुदा के एहसान को तो याद करो जब तुम आपस में (एक दूसरे के) दुश्मन थे तो ख़ुदा ने तुम्हारे दिलों में (एक दूसरे की) उलफ़त पैदा कर दी तो तुम उसके फ़ज़ल से आपस में भाई भाई हो गए और तुम गोया सुलगती हुईआग की भट्टी (दोज़ख) के लब पर (खडे) थे गिरना ही चाहते थे कि ख़ुदा ने तुमको उससे बचा लिया तो ख़ुदा अपने एहकाम यूं वाजेए करके बयान करता है ताकि तुम राहे रास्त पर आ जाओ
104وَلْتَكُن مِّنكُمْ أُمَّةٌ يَدْعُونَ إِلَى الْخَيْرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
और तुमसे एक गिरोह ऐसे (लोगों का भी) तो होना चाहिये जो (लोगों को) नेकी की तरफ़ बुलाए अच्छे काम का हुक्म दे और बुरे कामों से रोके और ऐसे ही लोग (आख़ेरत में) अपनी दिली मुरादें पायेंगे
105وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَاخْتَلَفُوا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُ ۚ وَأُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ
और तुम (कहीं) उन लोगों के ऐसे न हो जाना जो आपस में फूट डाल कर बैठ रहे और रौशन (दलील) आने के बाद भी एक मुंह एक ज़बान न रहे और ऐसे ही लोगों के वास्ते बड़ा (भारी) अज़ाब है
106يَوْمَ تَبْيَضُّ وُجُوهٌ وَتَسْوَدُّ وُجُوهٌ ۚ فَأَمَّا الَّذِينَ اسْوَدَّتْ وُجُوهُهُمْ أَكَفَرْتُم بَعْدَ إِيمَانِكُمْ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
(उस दिन से डरो) जिस दिन कुछ लोगों के चेहरे तो सफैद नूरानी होंगे और कुछ (लोगो) के चेहरे सियाह जिन लोगों के मुहॅ में कालिक होगी (उनसे कहा जायेगा) हाए क्यों तुम तो ईमान लाने के बाद काफ़िर हो गए थे अच्छा तो (लो) (अब) अपने कुफ़्र की सज़ा में अज़ाब (के मजे) चखो
107وَأَمَّا الَّذِينَ ابْيَضَّتْ وُجُوهُهُمْ فَفِي رَحْمَةِ اللَّهِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
और जिनके चेहरे पर नूर बरसता होगा वह तो ख़ुदा की रहमत(बहिश्त) में होंगे (और) उसी में सदा रहेंगे
आल-इमरानकुरान सूची
200आयत
मदनीअवतरण स्थान
105आयत

अनुवाद — आल-इमरान 105

सूरा आल-इमरान आयत 105 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और तुम (कहीं) उन लोगों के ऐसे न हो जाना…

सूरा आयत 105/200 — सूरा आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा आल-इमरान सुनें, सूरा आल-इमरान अनुवाद, सूरा आल-इमरान mp3, सूरा आल-इमरान pdf. आयत 103–107. हिंदी अर्थ: اردو.





पवित्र क़ुरआन


Friday, October 2, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए