Kuntum khaira ummatin ukhrijat linnaasi taamuroona bilma`roofi wa tanhawna `anil munkari wa tu`minoona billaah; wa law aamana Ahlul Kitaabi lakaana khairal lahum minhumul mu`minoona wa aksaruhumul faasiqoon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
तुम क्या अच्छे गिरोह हो कि (लोगों की) हिदायत के वास्ते पैदा किये गए हो तुम (लोगों को) अच्छे काम का हुक्म करते हो और बुरे कामों से रोकते हो और ख़ुदा पर ईमान रखते हो और अगर अहले किताब भी (इसी तरह) ईमान लाते तो उनके हक़ में बहुत अच्छा होता उनमें से कुछ ही तो ईमानदार हैं और अक्सर बदकार
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
(مومنو) جتنی امتیں (یعنی قومیں) لوگوں میں پیدا ہوئیں تم ان سب سے بہتر ہو کہ نیک کام کرنے کو کہتے ہو اور برے کاموں سے منع کرتے ہو اور خدا پر ایمان رکھتے ہو اور اگر اہلِ کتاب بھی ایمان لے آتے تو ان کے لیے بہت اچھا ہوتا ان میں ایمان لانے والے بھی ہیں (لیکن تھوڑے) اور اکثر نافرمان ہیں
الْمَعْرُوف: वह कार्य जिसे शरियत और अक्ल दोनों अच्छा कहें।
الْمُنكَر: वह कार्य जिसे शरियत और अक्ल दोनों बुरा कहें।
الْفَاسِقُونَ: अवज्ञाकारी, जो अल्लाह के हुक्म से बाहर निकल गए।
तफसीर:
अल्लाह तआला इस आयत में उम्मत-ए-मुहम्मदी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की तारीफ़ फ़रमा रहा है। यह आयत उस समय उतरी जब यहूदियों ने मुसलमानों से कहा कि हम तुमसे बेहतर हैं और हमारा दीन तुम्हारे दीन से उत्तम है। अल्लाह ने इसका जवाब दिया कि तुम (मुसलमानों) को लोगों के लिए सबसे उत्तम उम्मत बनाकर निकाला गया है। यह उत्तमता उनके ईमान और अमल की बदौलत है, क्योंकि वे भलाई का हुक्म देते हैं, बुराई से रोकते हैं और अल्लाह पर पक्का ईमान रखते हैं। यही वे गुण हैं जो उन्हें दूसरी उम्मतों से बेहतर बनाते हैं और वे लोगों के लिए सबसे अधिक फायदेमंद हैं।
फिर अल्लाह फ़रमाता है कि अगर अहल-ए-किताब (यहूदी और ईसाई) मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर ईमान ले आते, तो यह उनके लिए दुनिया और आखिरत दोनों में बेहतर होता। लेकिन उनमें से कुछ ही ईमान लाए, जैसे अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके जैसे कुछ लोग, जबकि उनमें से अधिकतर अल्लाह की आज्ञा से बाहर निकल गए और काफिर रहे।
फायदे:
यह आयत उम्मत-ए-मुहम्मदी की फज़ीलत और शान बयान करती है, जिससे मुसलमानों को अपनी पहचान पर गर्व होना चाहिए और इस उत्तमता को कायम रखने के लिए अमल करना चाहिए।
अम्र बिल-मारूफ़ (भलाई का हुक्म देना) और नही अनिल-मुनकर (बुराई से रोकना) इस उम्मत की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, जिसे अदा करना हर मुसलमान का फर्ज़ है।
सच्चा ईमान सिर्फ ज़बानी नहीं, बल्कि अमल से साबित होता है, जैसा कि आयत में ईमान के साथ अमल का जिक्र किया गया है।
अहल-ए-किताब के लिए ईमान ही उनके लिए भलाई का ज़रिया था, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया। इससे सबक लेना चाहिए कि हक़ को कबूल करने में देरी नहीं करनी चाहिए।
यह आयत मुसलमानों को यह भी सिखाती है कि वे दुनिया के लिए रहमत बनें और लोगों को भलाई की तरफ बुलाएं, क्योंकि यही उनकी उत्तमता की निशानी है।
तुम क्या अच्छे गिरोह हो कि (लोगों की) हिदायत के वास्ते पैदा किये गए हो तुम (लोगों को) अच्छे काम का हुक्म करते हो और बुरे कामों से रोकते हो और ख़ुदा पर ईमान रखते हो और अगर अहले किताब भी (इसी तरह) ईमान लाते तो उनके हक़ में बहुत अच्छा होता उनमें से कुछ ही तो ईमानदार हैं और अक्सर बदकार
तुम क्या अच्छे गिरोह हो कि (लोगों की) हिदायत के वास्ते पैदा किये गए हो तुम (लोगों को) अच्छे काम का हुक्म करते हो और बुरे कामों से रोकते हो और ख़ुदा पर ईमान रखते हो और अगर अहले किताब भी (इसी तरह) ईमान लाते तो उनके हक़ में बहुत अच्छा होता उनमें से कुछ ही तो ईमानदार हैं और अक्सर बदकार
(मुसलमानों) ये लोग मामूली अज़ीयत के सिवा तुम्हें हरगिज़ ज़रर नहीं पहुंचा सकते और अगर तुमसे लड़ेंगे तो उन्हें तुम्हारी तरफ़ पीठ ही करनी होगी और फिर उनकी कहीं से मदद भी नहीं पहुंचेगी
और जहॉ कहीं हत्ते चढ़े उनपर रूसवाई की मार पड़ी मगर ख़ुदा के एहद (या) और लोगों के एहद के ज़रिये से (उनको कहीं पनाह मिल गयी) और फिर हेरफेर के खुदा के गज़ब में पड़ गए और उनपर मोहताजी की मार (अलग) पड़ी ये (क्यों) इस सबब से कि वह ख़ुदा की आयतों से इन्कार करते थे और पैग़म्बरों को नाहक़ क़त्ल करते थे ये सज़ा उसकी है कि उन्होंने नाफ़रमानी की और हद से गुज़र गए थे
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