आल-इमरान · 109/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ وَإِلَى اللَّهِ تُرْجَعُ الْأُمُورُ ۝١٠٩
Wa lillaahi maa fissamaawaati wa maa fil ard; wa ilal laahi turja;ul umoor
📖 हिंदी अर्थ
और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (सब) ख़ुदा ही का है और (आख़िर) सब कामों की रूज़ु ख़ुदा ही की तरफ़ है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تُرْجَعُ: लौटाई जाती हैं, वापस की जाती हैं।
  • الأُمُورُ: सारे मामले, सारे कार्य।

तफ़सीर (व्याख्या):

आसमानों और ज़मीन में जो कुछ भी है, वह सब अकेले अल्लाह ही का है। उसी ने इन सबको पैदा किया है और उसी के इख्तियार (अधिकार) में इनका प्रबंधन है। कोई भी चीज़ उसकी मिल्कियत (स्वामित्व) से बाहर नहीं है, न छोटी और न बड़ी। यही नहीं, बल्कि सृष्टि के सारे मामलों की लौट भी उसी की ओर है। यानी हर इंसान, हर जिन्न, हर मख़लूक़ (प्राणी) को एक दिन उसी के सामने हाज़िर होना है, और उसी के सामने हर काम का फैसला होगा। वहाँ वह हर शख्स को उसके किए हुए अमल (कर्मों) के मुताबिक बदला देगा — अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा। इसलिए इस दुनिया में इंसान को यह समझ लेना चाहिए कि उसका रब (पालनहार) हर चीज़ पर क़ादिर (सक्षम) है, और उसे अपनी ज़िंदगी के हर पहलू में इसी हक़ीक़त (सत्य) के मुताबिक चलना चाहिए।

फ़ायदे (लाभ):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि सारी कायनात (ब्रह्मांड) का मालिक सिर्फ अल्लाह है, इसलिए हमें अपना दिल किसी और से नहीं लगाना चाहिए और न ही किसी और से डरना चाहिए। जिसके पास सब कुछ है, उसी पर भरोसा करना सबसे अच्छा है।
  2. यह आयत हमें यक़ीन दिलाती है कि इस दुनिया का कोई काम बेकार नहीं जाएगा। हर अच्छाई और हर बुराई का हिसाब अल्लाह के यहाँ ज़रूर होगा। यह सोच इंसान को नेकी पर चलने की ताक़त देती है और गुनाह से बचाती है।
  3. जब हमें मालूम हो कि सब कुछ अल्लाह का है और सब कुछ उसी की तरफ लौटना है, तो हमारे दिल में अल्लाह की मुहब्बत और उसकी इबादत (भक्ति) का जज़्बा पैदा होता है। हम समझते हैं कि हमारी ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ उसी की रज़ा (प्रसन्नता) हासिल करना है।
  4. इस आयत से इंसान को यह तसल्ली मिलती है कि अगर दुनिया में किसी ज़ालिम (अत्याचारी) से उसे नाइंसाफ़ी मिली है, तो अल्लाह के यहाँ उसका इंसाफ़ ज़रूर होगा। यह ईमानवालों के लिए सबसे बड़ी दिलासा है।
🎧 सुनें

📜 आयत 107-111 — आल-इमरान

107وَأَمَّا الَّذِينَ ابْيَضَّتْ وُجُوهُهُمْ فَفِي رَحْمَةِ اللَّهِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
और जिनके चेहरे पर नूर बरसता होगा वह तो ख़ुदा की रहमत(बहिश्त) में होंगे (और) उसी में सदा रहेंगे
108تِلْكَ آيَاتُ اللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِالْحَقِّ ۗ وَمَا اللَّهُ يُرِيدُ ظُلْمًا لِّلْعَالَمِينَ
(ऐ रसूल) ये ख़ुदा की आयतें हैं जो हम तुमको ठीक (ठीक) पढ़ के सुनाते हैं और ख़ुदा सारे जहॉन के लोगों (से किसी) पर जुल्म करना नहीं चाहता
109وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ وَإِلَى اللَّهِ تُرْجَعُ الْأُمُورُ
और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (सब) ख़ुदा ही का है और (आख़िर) सब कामों की रूज़ु ख़ुदा ही की तरफ़ है
110كُنتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ وَتُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ ۗ وَلَوْ آمَنَ أَهْلُ الْكِتَابِ لَكَانَ خَيْرًا لَّهُم ۚ مِّنْهُمُ الْمُؤْمِنُونَ وَأَكْثَرُهُمُ الْفَاسِقُونَ
तुम क्या अच्छे गिरोह हो कि (लोगों की) हिदायत के वास्ते पैदा किये गए हो तुम (लोगों को) अच्छे काम का हुक्म करते हो और बुरे कामों से रोकते हो और ख़ुदा पर ईमान रखते हो और अगर अहले किताब भी (इसी तरह) ईमान लाते तो उनके हक़ में बहुत अच्छा होता उनमें से कुछ ही तो ईमानदार हैं और अक्सर बदकार
111لَن يَضُرُّوكُمْ إِلَّا أَذًى ۖ وَإِن يُقَاتِلُوكُمْ يُوَلُّوكُمُ الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ
(मुसलमानों) ये लोग मामूली अज़ीयत के सिवा तुम्हें हरगिज़ ज़रर नहीं पहुंचा सकते और अगर तुमसे लड़ेंगे तो उन्हें तुम्हारी तरफ़ पीठ ही करनी होगी और फिर उनकी कहीं से मदद भी नहीं पहुंचेगी
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अनुवाद — आल-इमरान 109

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Tuesday, August 18, 2026

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