सबा · 27/54
अनुवाद उच्चारण — सूरा सबा
قُلْ أَرُونِيَ الَّذِينَ أَلْحَقْتُم بِهِ شُرَكَاءَ ۖ كَلَّا ۚ بَلْ هُوَ اللَّهُ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ ۝٢٧
Qul arooniyal lazeena alhaqtum bihee shurakaaa`a kallaa; bal Huwal Laahul `Azeezul Hakeem
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल तुम कह दो कि जिनको तुम ने खुदा का शरीक बनाकर) खुदा के साथ मिलाया है ज़रा उन्हें मुझे भी तो दिखा दो हरगिज़ (कोई शरीक नहीं) बल्कि खुदा ग़ालिब हिकमत वाला है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَرُونِي: मुझे दिखाओ, मेरे सामने प्रस्तुत करो (प्रमाण और दलील के साथ)।
  • أَلْحَقْتُم: तुमने जोड़ा, शामिल किया।
  • شُرَكَاء: साझीदार, भागीदार।
  • كَلَّا: हरगिज़ नहीं, ऐसा नहीं है।
  • الْعَزِيزُ: वह शक्तिशाली जिसे कोई हरा न सके, जो सब पर ग़ालिब हो।
  • الْحَكِيمُ: वह जो हर काम में पूर्ण ज्ञान और हिकमत (समझदारी) से काम करता है।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप इन मुशरिकों से कहिए: "मुझे दिखाओ और साबित करके बताओ कि वे कौन हैं जिन्हें तुमने अल्लाह के साथ साझीदार बनाया है? क्या उन्होंने कुछ पैदा किया है? क्या वे कोई रिज़्क़ देते हैं? क्या वे किसी चीज़ के मालिक हैं?"

यह एक चुनौती है — अगर सच में वे साझीदार हैं, तो उनकी कोई न कोई खूबी, कोई क्षमता, कोई शक्ति तो होनी चाहिए जो उन्हें पूजा के योग्य बनाए। लेकिन हक़ीक़त यह है कि ये सब मूर्तियाँ, देवता, या पूज्य व्यक्ति — सब कुछ असमर्थ हैं। वे न किसी को फायदा पहुँचा सकते हैं, न नुकसान। वे न जान बना सकते हैं, न मार सकते हैं, न जिला सकते हैं।

फिर अल्लाह तआला खुद इस ग़लतफ़हमी को रद्द करते हुए फ़रमाता है: "कल्ला" — हरगिज़ नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है जैसा तुम समझते हो। यह बात सरासर झूठ और बुनियादी भूल है।

असल हक़ीक़त यह है कि अल्लाह ही एकमात्र पूजा के योग्य है। वही अल-अज़ीज़ है — वह शक्तिशाली जिसकी शक्ति के आगे हर ताकत बेबस है, जो अपने दुश्मनों से बदला लेने में भी पूर्ण सक्षम है। और वही अल-हकीम है — वह जो हर बात में, हर काम में, हर फ़ैसले में गहरी समझदारी और हिकमत से काम करता है। उसकी तदबीर (योजना) में कोई कमी नहीं, उसके हुक्म में कोई बेवजह बात नहीं।

जब वह इतना शक्तिशाली और इतना हकीम है, तो क्या उसे किसी साझीदार की ज़रूरत है? क्या उसकी सल्तनत में कोई और हिस्सेदार हो सकता है? हरगिज़ नहीं! यह तो उसकी शान के खिलाफ है।


दावत और नसीहत (उपदेश):

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि तौहीद (एकेश्वरवाद) ही असली सच्चाई है। अल्लाह ने हमें बनाया, हमें रिज़्क़ दिया, हमें ज़िंदगी दी — तो क्या हमें उसी की इबादत नहीं करनी चाहिए? क्या हम उसी के आगे सिर नहीं झुकाना चाहिए?

याद रखिए! जो लोग अल्लाह के साथ किसी और को शरीक करते हैं, वे दरअसल अपनी ही नुकसान करते हैं। क्योंकि वे उन चीज़ों से मदद माँगते हैं जो खुद बेबस हैं — वे न सुन सकती हैं, न देख सकती हैं, न किसी काम आ सकती हैं।

अल्लाह तआला हम पर बहुत मेहरबान है कि उसने हमें सीधा रास्ता दिखाया। हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी के हर पल में सिर्फ अल्लाह को याद करें, सिर्फ उसी से मदद माँगें, और उसी की राह पर चलें। यही हमारी कामयाबी है — दुनिया में भी और आख़िरत में भी।

अल्लाह हमें सच्ची तौहीद पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 25-29 — सूरा सबा

25قُل لَّا تُسْأَلُونَ عَمَّا أَجْرَمْنَا وَلَا نُسْأَلُ عَمَّا تَعْمَلُونَ
(ऐ रसूल) तुम (उनसे) कह दो न हमारे गुनाहों की तुमसे पूछ गछ होगी और न तुम्हारी कारस्तानियों की हम से बाज़ पुर्स
26قُلْ يَجْمَعُ بَيْنَنَا رَبُّنَا ثُمَّ يَفْتَحُ بَيْنَنَا بِالْحَقِّ وَهُوَ الْفَتَّاحُ الْعَلِيمُ
(ऐ रसूल) तुम (उनसे) कह दो कि हमारा परवरदिगार (क़यामत में) हम सबको इकट्ठा करेगा फिर हमारे दरमियान (ठीक) फैसला कर देगा और वह तो ठीक-ठीक फैसला करने वाला वाक़िफकार है
27قُلْ أَرُونِيَ الَّذِينَ أَلْحَقْتُم بِهِ شُرَكَاءَ ۖ كَلَّا ۚ بَلْ هُوَ اللَّهُ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
(ऐ रसूल तुम कह दो कि जिनको तुम ने खुदा का शरीक बनाकर) खुदा के साथ मिलाया है ज़रा उन्हें मुझे भी तो दिखा दो हरगिज़ (कोई शरीक नहीं) बल्कि खुदा ग़ालिब हिकमत वाला है
28وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا كَافَّةً لِّلنَّاسِ بَشِيرًا وَنَذِيرًا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल) हमने तुमको तमाम (दुनिया के) लोगों के लिए (नेकों को बेहश्त की) खुशखबरी देने वाला और (बन्दों को अज़ाब से) डराने वाला (पैग़म्बर) बनाकर भेजा मगर बहुतेरे लोग (इतना भी) नहीं जानते
29وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
और (उलटे) कहते हैं कि अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो तो (आख़िर) ये क़यामत का वायदा कब पूरा होगा
सबाकुरान सूची
54आयत
मक्कीअवतरण स्थान
27आयत

अनुवाद — सबा 27

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Friday, October 2, 2026

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