अन-निसा · 52/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ لَعَنَهُمُ اللَّهُ ۖ وَمَن يَلْعَنِ اللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُ نَصِيرًا ۝٥٢
Ulaaa`ikal lazeena la`ana humul laahu wa mai yal`anil laahu falan tajida lahoo naseeraa
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) यही वह लोग हैं जिनपर ख़ुदा ने लानत की है और जिस पर ख़ुदा ने लानत की है तुम उनका मददगार हरगिज़ किसी को न पाओगे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لَعَنَهُمُ اللهُ: अल्लाह ने उन्हें अपनी रहमत से दूर कर दिया और उन पर अपनी यातना का फैसला सुनाया।
  • نَصِيرًا: सहायक, मददगार, कोई जो उन्हें अल्लाह की यातना से बचा सके।

तफ़सीर (व्याख्या):

ये वे लोग हैं जिनके भ्रष्टाचार और गुमराही ने हद से ज़्यादा फैल चुका है—यानी वे लोग जो ईमान और सच्चाई के बजाय कुफ्र और बुराई को अपनाते हैं, और जो अल्लाह की आयतों और उसके रसूल के मार्गदर्शन को ठुकराते हैं। अल्लाह ने उन्हें अपनी रहमत से निकाल दिया है और उन पर अपनी लानत (फिटकार) भेजी है। जब अल्लाह किसी पर लानत भेज देता है, तो उसका अर्थ यह है कि वह व्यक्ति अल्लाह की रहमत, सुरक्षा और भलाई से महरूम हो गया। और जिसे अल्लाह अपनी रहमत से दूर कर दे, उसके लिए दुनिया में कोई मददगार नहीं होता जो उसे अल्लाह की यातना से बचा सके या उसकी भलाई लौटा सके। न कोई रिश्तेदार, न कोई साथी, न कोई ताकतवर—कोई भी उसकी मदद नहीं कर सकता। यह एक गंभीर चेतावनी है कि अल्लाह की पकड़ से बचने वाला कोई नहीं है, और जिसे अल्लाह ने छोड़ दिया, उसे कोई थामने वाला नहीं।

फ़ायदे (सबक):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि सबसे बड़ी सफलता अल्लाह की रहमत और उसकी मोहब्बत पाना है, और सबसे बड़ी नाकामी उसकी लानत और नाराज़गी कमाना है।
  2. हमें अपने आचरण और विश्वास की लगातार जाँच करनी चाहिए कि कहीं हम किसी ऐसे काम या विचार में तो नहीं पड़ रहे जो अल्लाह की नाराज़गी का कारण बने।
  3. यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा सहारा और मददगार नहीं है—इसलिए हर मामले में उसी की तरफ रुजू करना चाहिए और उसी से मदद माँगनी चाहिए।
  4. मुसलमान को चाहिए कि वह उन लोगों के रास्ते से बचे जिन पर अल्लाह की लानत है, और हमेशा ईमान, सच्चाई और अच्छे आचरण को अपनाए ताकि वह अल्लाह की रहमत और उसकी मोहब्बत का हकदार बने।
  5. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है, इसलिए हमें उसके हुक्मों का पालन करने में कोई कोताही नहीं करनी चाहिए और अपनी ज़िंदगी को उसकी रज़ा के मुताबिक ढालना चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 50-54 — अन-निसा

50انظُرْ كَيْفَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ ۖ وَكَفَىٰ بِهِ إِثْمًا مُّبِينًا
(ऐ रसूल) ज़रा देखो तो ये लोग ख़ुदा पर कैसे कैसे झूठ तूफ़ान जोड़ते हैं और खुल्लम खुल्ला गुनाह के वास्ते तो यही काफ़ी है
51أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِّنَ الْكِتَابِ يُؤْمِنُونَ بِالْجِبْتِ وَالطَّاغُوتِ وَيَقُولُونَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا هَٰؤُلَاءِ أَهْدَىٰ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا سَبِيلًا
(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों के (हाल पर) नज़र नहीं की जिन्हें किताबे ख़ुदा का कुछ हिस्सा दिया गया था और (फिर) शैतान और बुतों का कलमा पढ़ने लगे और जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया है उनकी निस्बत कहने लगे कि ये तो ईमान लाने वालों से ज्यादा राहे रास्त पर हैं
52أُولَٰئِكَ الَّذِينَ لَعَنَهُمُ اللَّهُ ۖ وَمَن يَلْعَنِ اللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُ نَصِيرًا
(ऐ रसूल) यही वह लोग हैं जिनपर ख़ुदा ने लानत की है और जिस पर ख़ुदा ने लानत की है तुम उनका मददगार हरगिज़ किसी को न पाओगे
53أَمْ لَهُمْ نَصِيبٌ مِّنَ الْمُلْكِ فَإِذًا لَّا يُؤْتُونَ النَّاسَ نَقِيرًا
क्या (दुनिया) की सल्तनत में कुछ उनका भी हिस्सा है कि इस वजह से लोगों को भूसी भर भी न देंगे
54أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَىٰ مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ ۖ فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَآتَيْنَاهُم مُّلْكًا عَظِيمًا
या ख़ुदा ने जो अपने फ़ज़ल से (तुम) लोगों को (कुरान) अता फ़रमाया है इसके रश्क पर चले जाते हैं (तो उसका क्या इलाज है) हमने तो इबराहीम की औलाद को किताब और अक्ल की बातें अता फ़रमायी हैं और उनको बहुत बड़ी सल्तनत भी दी
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अनुवाद — अन-निसा 52

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Tuesday, August 18, 2026

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