अन-निसा · 53/176
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-निसा
أَمْ لَهُمْ نَصِيبٌ مِّنَ الْمُلْكِ فَإِذًا لَّا يُؤْتُونَ النَّاسَ نَقِيرًا ۝٥٣
Am lahum naseebum minal mulki fa izal laa yu`toonan naasa naqeeraa
📖 हिंदी अर्थ
क्या (दुनिया) की सल्तनत में कुछ उनका भी हिस्सा है कि इस वजह से लोगों को भूसी भर भी न देंगे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • नसीब (نَصِيبٌ): हिस्सा या भाग।
  • मुल्क (الْمُلْكِ): राज्य, शासन या अधिकार।
  • नक़ीर (نَقِيرًا): खजूर की गुठली के पीछे का वह छोटा सा गड्ढा या निशान जो बहुत ही तुच्छ और बेहद कम मात्रा को दर्शाता है।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला यहूदियों के उस दावे का खंडन कर रहे हैं जिसमें वे कहते थे कि उन्हें राज्य और अधिकार में कोई हिस्सा मिला हुआ है। अल्लाह फ़रमाता है: क्या उन्हें राज्य में कोई हिस्सा मिला है? हरगिज़ नहीं! यह उनका झूठा दावा है। अगर उन्हें राज्य में कुछ भी हिस्सा मिलता, तो भी वे अपनी कंजूसी, हसद और बुराई की वजह से लोगों को कुछ भी न देते—यहाँ तक कि खजूर की गुठली के पीछे वाला बेहद छोटा सा निशान भी नहीं। यानी वे इतने बखील (कंजूस) हैं कि दूसरों को कुछ भी देने के लिए तैयार नहीं हैं, चाहे वह चीज़ कितनी ही तुच्छ और मामूली क्यों न हो। यह आयत उनके दावे की बेबुनियादी और उनकी कंजूसी दोनों को साबित करती है।

फ़ायदे (सबक):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया के किसी भी अधिकार या राज्य पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि असली मालिक तो अल्लाह ही है। जिसे जितना मिलता है, अल्लाह की देन से मिलता है।
  2. कंजूसी और हसद (ईर्ष्या) बुरे गुण हैं। मुसलमान को सिखाया गया है कि वह दिल खोलकर खर्च करे और दूसरों की भलाई चाहे, क्योंकि अल्लाह उदार लोगों को पसंद करता है।
  3. इस आयत से यह भी पता चलता है कि जो लोग अल्लाह के दीन (इस्लाम) से दूर हैं, उनके दावे और वादे झूठे होते हैं। सच्चाई सिर्फ अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) के पास है।
  4. एक मुसलमान को चाहिए कि वह दूसरों के साथ भलाई करे, चाहे वह छोटी सी ही क्यों न हो। अल्लाह छोटे-बड़े हर अच्छे काम का अज्र देता है।


📜 आयत 51-55 — सूरा अन-निसा

51أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِّنَ الْكِتَابِ يُؤْمِنُونَ بِالْجِبْتِ وَالطَّاغُوتِ وَيَقُولُونَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا هَٰؤُلَاءِ أَهْدَىٰ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا سَبِيلًا
(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों के (हाल पर) नज़र नहीं की जिन्हें किताबे ख़ुदा का कुछ हिस्सा दिया गया था और (फिर) शैतान और बुतों का कलमा पढ़ने लगे और जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया है उनकी निस्बत कहने लगे कि ये तो ईमान लाने वालों से ज्यादा राहे रास्त पर हैं
52أُولَٰئِكَ الَّذِينَ لَعَنَهُمُ اللَّهُ ۖ وَمَن يَلْعَنِ اللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُ نَصِيرًا
(ऐ रसूल) यही वह लोग हैं जिनपर ख़ुदा ने लानत की है और जिस पर ख़ुदा ने लानत की है तुम उनका मददगार हरगिज़ किसी को न पाओगे
53أَمْ لَهُمْ نَصِيبٌ مِّنَ الْمُلْكِ فَإِذًا لَّا يُؤْتُونَ النَّاسَ نَقِيرًا
क्या (दुनिया) की सल्तनत में कुछ उनका भी हिस्सा है कि इस वजह से लोगों को भूसी भर भी न देंगे
54أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَىٰ مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ ۖ فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَآتَيْنَاهُم مُّلْكًا عَظِيمًا
या ख़ुदा ने जो अपने फ़ज़ल से (तुम) लोगों को (कुरान) अता फ़रमाया है इसके रश्क पर चले जाते हैं (तो उसका क्या इलाज है) हमने तो इबराहीम की औलाद को किताब और अक्ल की बातें अता फ़रमायी हैं और उनको बहुत बड़ी सल्तनत भी दी
55فَمِنْهُم مَّنْ آمَنَ بِهِ وَمِنْهُم مَّن صَدَّ عَنْهُ ۚ وَكَفَىٰ بِجَهَنَّمَ سَعِيرًا
फिर कुछ लोग तो इस (किताब) पर ईमान लाए और कुछ लोगों ने उससे इन्कार किया और इसकी सज़ा के लिए जहन्नुम की दहकती हुई आग काफ़ी है
अन-निसाकुरान सूची
176आयत
मदनीअवतरण स्थान
53आयत

अनुवाद — अन-निसा 53

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Monday, September 28, 2026

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