अश-शूरा · 46/53
अनुवाद उच्चारण — अश-शूरा
وَمَا كَانَ لَهُم مِّنْ أَوْلِيَاءَ يَنصُرُونَهُم مِّن دُونِ اللَّهِ ۗ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِن سَبِيلٍ ۝٤٦
Wa maa kaana lahum min awliyaaa`a yansuroonahum min doonil laah; wa mai yudlilil laahu famaa lahoo min sabeel
📖 हिंदी अर्थ
और ख़ुदा के सिवा न उनके सरपरस्त ही होंगे जो उनकी मदद को आएँ और जिसको ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसके लिए (हिदायत की) कोई राह नहीं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَوْلِيَاء (औलिया): सहायक, मददगार, संरक्षक मित्र।
  • يَنصُرُونَهُم (यन्सुरूनहुम): वे उनकी मदद करें।
  • مِن دُونِ اللَّهِ (मिन दूनिल्लाह): अल्लाह के सिवा, अल्लाह की पकड़ से बचाने वाला।
  • يُضْلِلِ اللَّهُ (युज़लिलिल्लाह): जिसे अल्लाह गुमराह कर दे (उसकी हिदायत छीन ले)।
  • سَبِيلٍ (सबील): रास्ता, मार्ग, उपाय।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला क़यामत के दिन काफ़िरों की बदकिस्मती और बेबसी का हाल बयान कर रहा है। वह फ़रमाता है कि जिस दिन अल्लाह उन्हें अज़ाब में डालेगा, उस दिन उनका कोई साथी, कोई रिश्तेदार, कोई मददगार नहीं होगा जो उन्हें अल्लाह की पकड़ से बचा सके। दुनिया में जिन लोगों पर वे भरोसा करते थे, जिन्हें अपना हिमायती समझते थे, वे सब उनसे किनारा कर लेंगे। न कोई सिफ़ारिशी होगा, न कोई बचाने वाला। यह उन लोगों के लिए सबसे बड़ी रुसवाई और निहायती मायूसी का दिन होगा।

फिर अल्लाह तआला एक अहम हक़ीक़त बयान करता है: "और जिसे अल्लाह गुमराह कर दे, उसके लिए कोई रास्ता नहीं।" यानी जिस इंसान ने खुद अपने कुफ़्र और ज़ुल्म से अल्लाह की हिदायत को ठुकरा दिया, और अल्लाह ने उसे उसकी हालत पर छोड़ दिया, तो उसके लिए हिदायत का कोई रास्ता बाकी नहीं रहता। न दुनिया में उसे सच्चाई का रास्ता मिलता है, न आख़िरत में जन्नत का। सारे दरवाज़े उस पर बंद कर दिए जाते हैं। क्योंकि हिदायत और गुमराही का मालिक सिर्फ अल्लाह है। जिसे अल्लाह हिदायत दे, कोई उसे गुमराह नहीं कर सकता, और जिसे अल्लाह गुमराह कर दे, कोई उसे हिदायत नहीं दे सकता।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी हक़ीक़त से आगाह करती है कि हमारी नजात (मुक्ति) और कामयाबी सिर्फ अल्लाह के हाथ में है। हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी में अल्लाह की राह को पकड़ें, उसकी इबादत करें और उसके बताए हुए रास्ते पर चलें। जो लोग अल्लाह से मुँह मोड़ते हैं और दुनिया के झूठे सहारों पर भरोसा करते हैं, वे क़यामत के दिन बिल्कुल अकेले होंगे। इसलिए आज ही अपने रब से रिश्ता जोड़ लें, उसकी रहमत और हिदायत के तलबगार बनें, क्योंकि अल्लाह की रहमत के दरवाज़े हमेशा खुले हैं। जो उसकी तरफ एक कदम बढ़ाता है, अल्लाह उसकी तरफ दौड़कर आता है। यही हमारी सबसे बड़ी कामयाबी है कि हम अल्लाह के बताए रास्ते पर चलें और उस दिन की शर्मिंदगी से बचें।



📜 आयत 44-48 — अश-शूरा

44وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِن وَلِيٍّ مِّن بَعْدِهِ ۗ وَتَرَى الظَّالِمِينَ لَمَّا رَأَوُا الْعَذَابَ يَقُولُونَ هَلْ إِلَىٰ مَرَدٍّ مِّن سَبِيلٍ
और जिसको ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसके बाद उसका कोई सरपरस्त नहीं और तुम ज़ालिमों को देखोगे कि जब (दोज़ख़) का अज़ाब देखेंगे तो कहेंगे कि भला (दुनिया में) फिर लौट कर जाने की कोई सबील है
45وَتَرَاهُمْ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا خَاشِعِينَ مِنَ الذُّلِّ يَنظُرُونَ مِن طَرْفٍ خَفِيٍّ ۗ وَقَالَ الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّ الْخَاسِرِينَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ وَأَهْلِيهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ أَلَا إِنَّ الظَّالِمِينَ فِي عَذَابٍ مُّقِيمٍ
और तुम उनको देखोगे कि दोज़ख़ के सामने लाए गये हैं (और) ज़िल्लत के मारे कटे जाते हैं (और) कनक्खियों से देखे जाते हैं और मोमिनीन कहेंगे कि हकीक़त में वही बड़े घाटे में हैं जिन्होने क़यामत के दिन अपने आप को और अपने घर वालों को ख़सारे में डाला देखो ज़ुल्म करने वाले दाएमी अज़ाब में रहेंगे
46وَمَا كَانَ لَهُم مِّنْ أَوْلِيَاءَ يَنصُرُونَهُم مِّن دُونِ اللَّهِ ۗ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِن سَبِيلٍ
और ख़ुदा के सिवा न उनके सरपरस्त ही होंगे जो उनकी मदद को आएँ और जिसको ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसके लिए (हिदायत की) कोई राह नहीं
47اسْتَجِيبُوا لِرَبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا مَرَدَّ لَهُ مِنَ اللَّهِ ۚ مَا لَكُم مِّن مَّلْجَإٍ يَوْمَئِذٍ وَمَا لَكُم مِّن نَّكِيرٍ
(लोगों) उस दिन के पहले जो ख़ुदा की तरफ से आयेगा और किसी तरह (टाले न टलेगा) अपने परवरदिगार का हुक्म मान लो (क्यों कि) उस दिन न तो तुमको कहीं पनाह की जगह मिलेगी और न तुमसे (गुनाह का) इन्कार ही बन पड़ेगा
48فَإِنْ أَعْرَضُوا فَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا ۖ إِنْ عَلَيْكَ إِلَّا الْبَلَاغُ ۗ وَإِنَّا إِذَا أَذَقْنَا الْإِنسَانَ مِنَّا رَحْمَةً فَرِحَ بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَإِنَّ الْإِنسَانَ كَفُورٌ
फिर अगर मुँह फेर लें तो (ऐ रसूल) हमने तुमको उनका निगेहबान बनाकर नहीं भेजा तुम्हारा काम तो सिर्फ (एहकाम का) पहुँचा देना है और जब हम इन्सान को अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं तो वह उससे ख़ुश हो जाता है और अगर उनको उन्हीं के हाथों की पहली करतूतों की बदौलत कोई तकलीफ पहुँचती (सब एहसान भूल गए) बेशक इन्सान बड़ा नाशुक्रा है
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अनुवाद — अश-शूरा 46

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Tuesday, August 18, 2026

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