अश-शूरा · 45/53
अनुवाद उच्चारण — अश-शूरा
وَتَرَاهُمْ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا خَاشِعِينَ مِنَ الذُّلِّ يَنظُرُونَ مِن طَرْفٍ خَفِيٍّ ۗ وَقَالَ الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّ الْخَاسِرِينَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ وَأَهْلِيهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ أَلَا إِنَّ الظَّالِمِينَ فِي عَذَابٍ مُّقِيمٍ ۝٤٥
Wa taraahum yu`radoona `alaihaa khaashi`eena minazzulli yanzuroona min tarfin khaifiyy; wa qaalal lazeena aamanooo innal khaasireenal lazeena khasiroon anfusahum wa ahleehim Yawmal Qiyaamah; alaaa innaz zaalimeena fee`azaabim muqeem
📖 हिंदी अर्थ
और तुम उनको देखोगे कि दोज़ख़ के सामने लाए गये हैं (और) ज़िल्लत के मारे कटे जाते हैं (और) कनक्खियों से देखे जाते हैं और मोमिनीन कहेंगे कि हकीक़त में वही बड़े घाटे में हैं जिन्होने क़यामत के दिन अपने आप को और अपने घर वालों को ख़सारे में डाला देखो ज़ुल्म करने वाले दाएमी अज़ाब में रहेंगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خَاشِعِينَ: झुके हुए, अपमानित, डरे हुए
  • مِنَ الذُّلِّ: अपमान और ज़िल्लत के कारण
  • مِن طَرْفٍ خَفِيٍّ: छिपी नज़र से, चोरी-छिपे देखना (जैसे कोई डर के मारे कत्ल किए जाने वाला जल्लाद की तरफ़ देखता है)
  • خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ: अपने आप को नुक़सान में डाला
  • عَذَابٍ مُّقِيمٍ: स्थायी और कभी न ख़त्म होने वाला अज़ाब

तफ़सीर:

ऐ नबी! आप उस दिन उन ज़ालिमों को देखेंगे जब वे आग के सामने पेश किए जाएँगे। वे इतने अपमानित और दबे हुए होंगे कि उनकी आँखें नीची होंगी, और वे डर के मारे आग की तरफ़ चोरी-छिपे देखेंगे — बिल्कुल उस तरह जैसे कोई मौत की सज़ा पाने वाला जल्लाद की तरफ़ देखता है। उनकी यह हालत देखकर ईमान वाले जो जन्नत में होंगे, वे कहेंगे: "असली नुक़सान उठाने वाले तो वही हैं जिन्होंने आज अपने आप को और अपने घरवालों को जहन्नम की आग में झोंक दिया।" यानी जो लोग दुनिया में ईमान नहीं लाए, उन्होंने अपनी जानें तो ग़ारत की ही, साथ ही उन जन्नती हूरों और नेमतों से भी महरूम रहे जो उनके लिए तैयार थीं अगर वे ईमान लाते।

फिर अल्लाह तआला ख़ुद फ़रमाता है: "सुन लो! यक़ीनन ज़ालिम (काफ़िर और मुशरिक) लोग ऐसे अज़ाब में हैं जो कभी ख़त्म नहीं होगा, न उन्हें उससे राहत मिलेगी और न ही वे उससे बाहर निकल सकेंगे।"


दावती पहलू:

यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आज हम दुनिया की चमक-दमक में इतने खोए हुए हैं कि उस दिन की हक़ीक़त को भूल गए हैं। जिस दिन हर इंसान अपने आमाल के साथ पेश होगा, वहाँ कोई रिश्तेदारी काम नहीं आएगी, न दौलत और न औलाद। आज का हर ज़ालिम — चाहे वह कितना भी ताक़तवर क्यों न हो — उस दिन इतना बेबस और ज़लील होगा कि वह आग की तरफ़ देखने की हिम्मत भी नहीं कर पाएगा।

यह आयत हमें दो चीज़ें सिखाती है: पहली, हमें अपने ईमान की हिफ़ाज़त करनी चाहिए और ज़ुल्म व नाइंसाफ़ी से बचना चाहिए, क्योंकि ज़ुल्म का अंजाम सिर्फ़ उस दिन के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए तबाही है। दूसरी, हमें अपने घरवालों और बच्चों की इस्लाह की फ़िक्र करनी चाहिए, ताकि क़यामत के दिन हम उन लोगों में न हों जो अपने अहल-ओ-अयाल को भी अपने साथ जहन्नम में ले जाएँ।

रहमत के मालिक ने हमें यह दुनिया इम्तिहान के लिए दी है, और रास्ता भी दिखा दिया है। जो लोग उस रास्ते पर चलेंगे, वे उस दिन की रुसवाई से बच जाएँगे और उन्हें वह इनाम मिलेगा जो किसी आँख ने नहीं देखा, किसी कान ने नहीं सुना और किसी दिल ने नहीं सोचा। अल्लाह हमें उन लोगों में शामिल करे जो उस दिन खुशहाल होंगे, न कि उनमें जो पछतावे के सिवा कुछ हासिल नहीं करेंगे। आमीन।



📜 आयत 43-47 — अश-शूरा

43وَلَمَن صَبَرَ وَغَفَرَ إِنَّ ذَٰلِكَ لَمِنْ عَزْمِ الْأُمُورِ
और जो सब्र करे और कुसूर माफ़ कर दे तो बेशक ये बड़े हौसले के काम हैं
44وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِن وَلِيٍّ مِّن بَعْدِهِ ۗ وَتَرَى الظَّالِمِينَ لَمَّا رَأَوُا الْعَذَابَ يَقُولُونَ هَلْ إِلَىٰ مَرَدٍّ مِّن سَبِيلٍ
और जिसको ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसके बाद उसका कोई सरपरस्त नहीं और तुम ज़ालिमों को देखोगे कि जब (दोज़ख़) का अज़ाब देखेंगे तो कहेंगे कि भला (दुनिया में) फिर लौट कर जाने की कोई सबील है
45وَتَرَاهُمْ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا خَاشِعِينَ مِنَ الذُّلِّ يَنظُرُونَ مِن طَرْفٍ خَفِيٍّ ۗ وَقَالَ الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّ الْخَاسِرِينَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ وَأَهْلِيهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ أَلَا إِنَّ الظَّالِمِينَ فِي عَذَابٍ مُّقِيمٍ
और तुम उनको देखोगे कि दोज़ख़ के सामने लाए गये हैं (और) ज़िल्लत के मारे कटे जाते हैं (और) कनक्खियों से देखे जाते हैं और मोमिनीन कहेंगे कि हकीक़त में वही बड़े घाटे में हैं जिन्होने क़यामत के दिन अपने आप को और अपने घर वालों को ख़सारे में डाला देखो ज़ुल्म करने वाले दाएमी अज़ाब में रहेंगे
46وَمَا كَانَ لَهُم مِّنْ أَوْلِيَاءَ يَنصُرُونَهُم مِّن دُونِ اللَّهِ ۗ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِن سَبِيلٍ
और ख़ुदा के सिवा न उनके सरपरस्त ही होंगे जो उनकी मदद को आएँ और जिसको ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसके लिए (हिदायत की) कोई राह नहीं
47اسْتَجِيبُوا لِرَبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا مَرَدَّ لَهُ مِنَ اللَّهِ ۚ مَا لَكُم مِّن مَّلْجَإٍ يَوْمَئِذٍ وَمَا لَكُم مِّن نَّكِيرٍ
(लोगों) उस दिन के पहले जो ख़ुदा की तरफ से आयेगा और किसी तरह (टाले न टलेगा) अपने परवरदिगार का हुक्म मान लो (क्यों कि) उस दिन न तो तुमको कहीं पनाह की जगह मिलेगी और न तुमसे (गुनाह का) इन्कार ही बन पड़ेगा
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अनुवाद — अश-शूरा 45

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सूरा आयत 45/53 — अश-शूरा الشورى (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अश-शूरा सुनें, अश-शूरा अनुवाद, अश-शूरा mp3, अश-शूरा pdf. आयत 43–47. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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