Zaalika adnaaa ai yaatoo bishshahaadati `alaa wajhihaaa aw yakhaafooo an turadda aimaanum ba`da aimaanihim; wattaqul laaha wasma`oo; wallaahu laa yahdil qawmal faasiqeen
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
ये ज्यादा क़रीन क़यास है कि इस तरह पर (आख़ेरत के डर से) ठीक ठीक गवाही दें या (दुनिया की रूसवाई का) अन्देशा हो कि कहीं हमारी क़समें दूसरे फरीक़ की क़समों के बाद रद न कर दी जाएँ मुसलमानों ख़ुदा से डरो और (जी लगा कर) सुन लो और ख़ुदा बदचलन लोगों को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाता
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اس طریق سے بہت قریب ہے کہ یہ لوگ صحیح صحیح شہادت دیں یا اس بات سے خوف کریں کہ (ہماری) قسمیں ان کی قسموں کے بعد رد کر دی جائیں گی اور خدا سے ڈرو اور اس کے حکموں کو (گوشِ ہوش سے) سنو اور خدا نافرمان لوگوں کو ہدایت نہیں دیتا
ये ज्यादा क़रीन क़यास है कि इस तरह पर (आख़ेरत के डर से) ठीक ठीक गवाही दें या (दुनिया की रूसवाई का) अन्देशा हो कि कहीं हमारी क़समें दूसरे फरीक़ की क़समों के बाद रद न कर दी जाएँ मुसलमानों ख़ुदा से डरो और (जी लगा कर) सुन लो और ख़ुदा बदचलन लोगों को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाता
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
ذَٰلِكَ: यह (पूर्वोक्त आदेश/नियम)
أَدْنَى: अधिक निकट, अधिक उपयुक्त
عَلَىٰ وَجْهِهَا: उसके सही तरीके से, बिना किसी हेर-फेर के
تُرَدَّ أَيْمَانٌ: क़समें लौटा दी जाएँ (यानी क़सम का अधिकार दूसरे पक्ष को दे दिया जाए)
الْفَاسِقِينَ: आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, अवज्ञाकारी
तफ़सीर:
यह आयत उस पिछले आदेश की ओर संकेत करती है जिसमें वसीयत (विल) के समय गवाहों की शहादत (गवाही) के संबंध में नियम बताया गया था—कि जब गवाहों पर संदेह हो, तो उन्हें नमाज़ के बाद क़सम दिलाई जाए। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यह नियम (क़सम दिलाना और झूठी गवाही पर सख्ती) इस बात के अधिक निकट है कि गवाह अपनी गवाही को उसके सही रूप में पेश करें, बिना उसमें किसी तरह का बदलाव या ख़ियानत किए। या फिर उन्हें यह डर हो कि अगर उन्होंने झूठी क़सम खाई, तो उनकी क़समें लौटा दी जाएँगी और वारिसों की ओर से क़समें दिलाई जाएँगी, जिससे उनका झूठ उजागर हो जाएगा और वे दुनिया में भी रुसवा होंगे और आख़िरत में भी अज़ाब के सज़ावार होंगे।
फिर अल्लाह तआला सभी लोगों को नसीहत करता है कि अल्लाह से डरो और उसकी निगरानी का एहसास रखो—न झूठी क़सम खाओ और न ही क़समों के ज़रिए किसी का हक़ मारो। और उस नसीहत को कान लगाकर सुनो जो तुम्हें दी जा रही है, और उसे क़बूल करो। याद रखो कि अल्लाह तआला उन लोगों को हिदायत नहीं देता जो उसकी आज्ञा से निकल जाते हैं और गुनाहों पर अड़े रहते हैं।
फ़ायदे और सबक:
ईमानदारी और सच्चाई की अहमियत: इस आयत से सीख मिलती है कि गवाही में सच्चाई बेहद ज़रूरी है। अल्लाह ने ऐसे नियम बनाए हैं जो लोगों को सच बोलने पर मजबूर करें और झूठ से रोकें।
अल्लाह का डर सबसे बड़ा ज़रिया: इंसान को चाहिए कि वह अल्लाह से डरे और याद रखे कि अल्लाह हर चीज़ देख रहा है। यह डर उसे झूठ, धोखे और ख़ियानत से बचाता है।
इस्लाम में इंसाफ़ की ताकीद: इस्लाम ने हक़ और इंसाफ़ के लिए ऐसे क़ानून बनाए हैं जो कमज़ोर और ताकतवर सबके हक़ की हिफ़ाज़त करते हैं। यह इस्लाम की पूर्ण न्याय प्रणाली का सबूत है।
गुनाह और अवज्ञा का अंजाम: जो लोग अल्लाह के हुक्मों से निकल जाते हैं और गुनाह पर अड़े रहते हैं, अल्लाह उन्हें हिदायत नहीं देता। यानी हिदायत पाने के लिए अल्लाह की आज्ञा का पालन ज़रूरी है।
इस्लामी शरई अहकाम में हिकमत: हर शरई हुक्म के पीछे कोई न कोई हिकमत (बुद्धिमत्ता) होती है। यह आयत बताती है कि अल्लाह के आदेश इंसान की भलाई और समाज की सुधार के लिए हैं।
ऐ ईमान वालों जब तुममें से किसी (के सर) पर मौत खड़ी हो तो वसीयत के वक्त तुम (मोमिन) में से दो आदिलों की गवाही होनी ज़रुरी है और जब तुम इत्तेफाक़न कहीं का सफर करो और (सफर ही में) तुमको मौत की मुसीबत का सामना हो तो (भी) दो गवाह ग़ैर (मोमिन) सही (और) अगर तुम्हें शक़ हो तो उन दोनों को नमाज़ के बाद रोक लो फिर वह दोनों ख़ुदा की क़सम खाएँ कि हम इस (गवाही) के (ऐवज़ कुछ दाम नहीं लेंगे अगरचे हम जिसकी गवाही देते हैं हमारा अज़ीज़ ही क्यों न) हो और हम खुदा लगती गवाही न छुपाएँगे अगर ऐसा करें तो हम बेशक गुनाहगार हैं
अगर इस पर मालूम हो जाए कि वह दोनों (दरोग़ हलफ़ी (झूठी कसम) से) गुनाह के मुस्तहक़ हो गए तो दूसरे दो आदमी उन लोगों में से जिनका हक़ दबाया गया है और (मय्यत) के ज्यादा क़राबतदार हैं (उनकी तरवीद में) उनकी जगह खड़े हो जाएँ फिर दो नए गवाह ख़ुदा की क़सम खाएँ कि पहले दो गवाहों की निस्बत हमारी गवाही ज्यादा सच्ची है और हमने (हक़) नहीं छुपाया और अगर ऐसा किया हो तो उस वक्त बेशक हम ज़ालिम हैं
ये ज्यादा क़रीन क़यास है कि इस तरह पर (आख़ेरत के डर से) ठीक ठीक गवाही दें या (दुनिया की रूसवाई का) अन्देशा हो कि कहीं हमारी क़समें दूसरे फरीक़ की क़समों के बाद रद न कर दी जाएँ मुसलमानों ख़ुदा से डरो और (जी लगा कर) सुन लो और ख़ुदा बदचलन लोगों को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाता
(उस वक्त क़ो याद करो) जिस दिन ख़ुदा अपने पैग़म्बरों को जमा करके पूछेगा कि (तुम्हारी उममत की तरफ से तबलीग़े एहकाम का) क्या जवाब दिया गया तो अर्ज क़रेगें कि हम तो (चन्द ज़ाहिरी बातों के सिवा) कुछ नहीं जानते तू तो खुद बड़ा ग़ैब वॉ है
(वह वक्त याद करो) जब ख़ुदा फरमाएगा कि ये मरियम के बेटे ईसा हमने जो एहसानात तुम पर और तुम्हारी माँ पर किये उन्हे याद करो जब हमने रूहुलक़ुदूस (जिबरील) से तुम्हारी ताईद की कि तुम झूले में (पड़े पड़े) और अधेड़ होकर (शक़ सा बातें) करने लगे और जब हमने तुम्हें लिखना और अक़ल व दानाई की बातें और (तौरेत व इन्जील (ये सब चीजे) सिखायी और जब तुम मेरे हुक्म से मिट्टी से चिड़िया की मूरत बनाते फिर उस पर कुछ दम कर देते तो वह मेरे हुक्म से (सचमुच) चिड़िया बन जाती थी और मेरे हुक्म से मादरज़ाद (पैदायशी) अंधे और कोढ़ी को अच्छा कर देते थे और जब तुम मेरे हुक्म से मुर्दों को ज़िन्दा (करके क़ब्रों से) निकाल खड़ा करते थे और जिस वक्त तुम बनी इसराईल के पास मौजिज़े लेकर आए और उस वक्त मैने उनको तुम (पर दस्त दराज़ी करने) से रोका तो उनमें से बाज़ कुफ्फ़ार कहने लगे ये तो बस खुला हुआ जादू है
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