अल-माइदा · 107/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
فَإِنْ عُثِرَ عَلَىٰ أَنَّهُمَا اسْتَحَقَّا إِثْمًا فَآخَرَانِ يَقُومَانِ مَقَامَهُمَا مِنَ الَّذِينَ اسْتَحَقَّ عَلَيْهِمُ الْأَوْلَيَانِ فَيُقْسِمَانِ بِاللَّهِ لَشَهَادَتُنَا أَحَقُّ مِن شَهَادَتِهِمَا وَمَا اعْتَدَيْنَا إِنَّا إِذًا لَّمِنَ الظَّالِمِينَ ۝١٠٧
Fa in `usira `alaaa annahumas tahaqqaaa isman fa aakharaani yaqoomaani maqaamahumaa minal lazeenas tahaqqa `alaihimul awlayaani fa yuqsimaani billaahi lashahaadatunaaa ahaqqu min shahaadatihimaaa wa ma`tadainaaa innaaa izal laminaz zaalimeen
📖 हिंदी अर्थ
अगर इस पर मालूम हो जाए कि वह दोनों (दरोग़ हलफ़ी (झूठी कसम) से) गुनाह के मुस्तहक़ हो गए तो दूसरे दो आदमी उन लोगों में से जिनका हक़ दबाया गया है और (मय्यत) के ज्यादा क़राबतदार हैं (उनकी तरवीद में) उनकी जगह खड़े हो जाएँ फिर दो नए गवाह ख़ुदा की क़सम खाएँ कि पहले दो गवाहों की निस्बत हमारी गवाही ज्यादा सच्ची है और हमने (हक़) नहीं छुपाया और अगर ऐसा किया हो तो उस वक्त बेशक हम ज़ालिम हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • عُثِرَ (उसिरा): पता चलना, भेद खुलना, किसी बात का पर्दाफाश हो जाना।
  • اسْتَحَقَّا إِثْمًا (इस्तहक़्क़ा इस्मन): उन्होंने गुनाह कमाया, यानी झूठी गवाही या ख़ियानत के ज़रिए गुनाह के हक़दार बने।
  • يَقُومَانِ مَقَامَهُمَا (यक़ूमानि मक़ामहुमा): उनकी जगह खड़े हों, उनका स्थान लें।
  • اسْتَحَقَّ عَلَيْهِمُ الْأَوْلَيَانِ (इस्तहक़्क़ा अलैहिमुल अवलयानि): जिनके मामले में पहले दो गवाहों ने गुनाह कमाया, यानी मृतक के वारिस।
  • اعْتَدَيْنَا (इ'तदैना): हमने हद से तजावुज़ किया, ज़ुल्म किया।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में शहादत (गवाही) के मामले की एक और बारीक स्थिति बयान कर रहे हैं। जब वसीयत के सिलसिले में दो गवाहों की गवाही ली जाती है और बाद में यह बात खुल जाए कि उन दोनों ने झूठी गवाही दी थी, या उन्होंने वसीयत में ख़ियानत की थी और इस तरह वे गुनाह के हक़दार बने, तो क्या किया जाए?

इसका हल यह है कि मृतक के वारिसों में से दो और नेक लोग उठें और उन दोनों झूठे गवाहों की जगह खड़े हों। ये दोनों वारिस अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दें कि "हमारी गवाही उन दोनों की गवाही से ज़्यादा सच्ची और हक़ पर है, और हमने कोई ज़ुल्म या हद से तजावुज़ नहीं किया। अगर हमने झूठी गवाही दी या ज़ुल्म किया, तो हम भी उन्हीं ज़ालिमों में से होंगे।"

यानी अल्लाह तआला ने हक़ और इंसाफ़ के लिए एक पूरा सिस्टम बनाया है। अगर गवाही में ख़ियानत हो जाए, तो उसे भी बेनक़ाब किया जा सकता है। यह इस्लाम का वह अदालती निज़ाम है जो हर हाल में सच्चाई को उजागर करने का तरीक़ा सिखाता है।

इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि गवाही में सच्चाई पर क़ायम रहना कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है। झूठी गवाही देना और ख़ियानत करना बड़े गुनाह हैं, और अल्लाह के यहाँ इसकी सख़्त सज़ा है। साथ ही, अगर किसी को पता चले कि गवाही में धोखा हुआ है, तो उसे चुप नहीं बैठना चाहिए, बल्कि हक़ के लिए खड़ा होना चाहिए।

यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि हमेशा सच बोलें, चाहे मामला किसी का भी हो। अल्लाह तआला सच्चों के साथ है और झूठे लोगों का अंजाम बुरा है। इस्लाम का दीन हमें इंसाफ़, सच्चाई और अमानतदारी की तालीम देता है, ताकि समाज में भरोसा और सुकून क़ायम रहे।



📜 आयत 105-109 — अल-माइदा

105يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا عَلَيْكُمْ أَنفُسَكُمْ ۖ لَا يَضُرُّكُم مَّن ضَلَّ إِذَا اهْتَدَيْتُمْ ۚ إِلَى اللَّهِ مَرْجِعُكُمْ جَمِيعًا فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
ऐ ईमान वालों तुम अपनी ख़बर लो जब तुम राहे रास्त पर हो तो कोई गुमराह हुआ करे तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकता तुम सबके सबको ख़ुदा ही की तरफ लौट कर जाना है तब (उस वक्त नेक व बद) जो कुछ (दुनिया में) करते थे तुम्हें बता देगा
106يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا شَهَادَةُ بَيْنِكُمْ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ حِينَ الْوَصِيَّةِ اثْنَانِ ذَوَا عَدْلٍ مِّنكُمْ أَوْ آخَرَانِ مِنْ غَيْرِكُمْ إِنْ أَنتُمْ ضَرَبْتُمْ فِي الْأَرْضِ فَأَصَابَتْكُم مُّصِيبَةُ الْمَوْتِ ۚ تَحْبِسُونَهُمَا مِن بَعْدِ الصَّلَاةِ فَيُقْسِمَانِ بِاللَّهِ إِنِ ارْتَبْتُمْ لَا نَشْتَرِي بِهِ ثَمَنًا وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبَىٰ ۙ وَلَا نَكْتُمُ شَهَادَةَ اللَّهِ إِنَّا إِذًا لَّمِنَ الْآثِمِينَ
ऐ ईमान वालों जब तुममें से किसी (के सर) पर मौत खड़ी हो तो वसीयत के वक्त तुम (मोमिन) में से दो आदिलों की गवाही होनी ज़रुरी है और जब तुम इत्तेफाक़न कहीं का सफर करो और (सफर ही में) तुमको मौत की मुसीबत का सामना हो तो (भी) दो गवाह ग़ैर (मोमिन) सही (और) अगर तुम्हें शक़ हो तो उन दोनों को नमाज़ के बाद रोक लो फिर वह दोनों ख़ुदा की क़सम खाएँ कि हम इस (गवाही) के (ऐवज़ कुछ दाम नहीं लेंगे अगरचे हम जिसकी गवाही देते हैं हमारा अज़ीज़ ही क्यों न) हो और हम खुदा लगती गवाही न छुपाएँगे अगर ऐसा करें तो हम बेशक गुनाहगार हैं
107فَإِنْ عُثِرَ عَلَىٰ أَنَّهُمَا اسْتَحَقَّا إِثْمًا فَآخَرَانِ يَقُومَانِ مَقَامَهُمَا مِنَ الَّذِينَ اسْتَحَقَّ عَلَيْهِمُ الْأَوْلَيَانِ فَيُقْسِمَانِ بِاللَّهِ لَشَهَادَتُنَا أَحَقُّ مِن شَهَادَتِهِمَا وَمَا اعْتَدَيْنَا إِنَّا إِذًا لَّمِنَ الظَّالِمِينَ
अगर इस पर मालूम हो जाए कि वह दोनों (दरोग़ हलफ़ी (झूठी कसम) से) गुनाह के मुस्तहक़ हो गए तो दूसरे दो आदमी उन लोगों में से जिनका हक़ दबाया गया है और (मय्यत) के ज्यादा क़राबतदार हैं (उनकी तरवीद में) उनकी जगह खड़े हो जाएँ फिर दो नए गवाह ख़ुदा की क़सम खाएँ कि पहले दो गवाहों की निस्बत हमारी गवाही ज्यादा सच्ची है और हमने (हक़) नहीं छुपाया और अगर ऐसा किया हो तो उस वक्त बेशक हम ज़ालिम हैं
108ذَٰلِكَ أَدْنَىٰ أَن يَأْتُوا بِالشَّهَادَةِ عَلَىٰ وَجْهِهَا أَوْ يَخَافُوا أَن تُرَدَّ أَيْمَانٌ بَعْدَ أَيْمَانِهِمْ ۗ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاسْمَعُوا ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ
ये ज्यादा क़रीन क़यास है कि इस तरह पर (आख़ेरत के डर से) ठीक ठीक गवाही दें या (दुनिया की रूसवाई का) अन्देशा हो कि कहीं हमारी क़समें दूसरे फरीक़ की क़समों के बाद रद न कर दी जाएँ मुसलमानों ख़ुदा से डरो और (जी लगा कर) सुन लो और ख़ुदा बदचलन लोगों को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाता
109۞ يَوْمَ يَجْمَعُ اللَّهُ الرُّسُلَ فَيَقُولُ مَاذَا أُجِبْتُمْ ۖ قَالُوا لَا عِلْمَ لَنَا ۖ إِنَّكَ أَنتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ
(उस वक्त क़ो याद करो) जिस दिन ख़ुदा अपने पैग़म्बरों को जमा करके पूछेगा कि (तुम्हारी उममत की तरफ से तबलीग़े एहकाम का) क्या जवाब दिया गया तो अर्ज क़रेगें कि हम तो (चन्द ज़ाहिरी बातों के सिवा) कुछ नहीं जानते तू तो खुद बड़ा ग़ैब वॉ है
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अनुवाद — अल-माइदा 107

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Tuesday, August 18, 2026

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