अल-माइदा · 44/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
إِنَّا أَنزَلْنَا التَّوْرَاةَ فِيهَا هُدًى وَنُورٌ ۚ يَحْكُمُ بِهَا النَّبِيُّونَ الَّذِينَ أَسْلَمُوا لِلَّذِينَ هَادُوا وَالرَّبَّانِيُّونَ وَالْأَحْبَارُ بِمَا اسْتُحْفِظُوا مِن كِتَابِ اللَّهِ وَكَانُوا عَلَيْهِ شُهَدَاءَ ۚ فَلَا تَخْشَوُا النَّاسَ وَاخْشَوْنِ وَلَا تَشْتَرُوا بِآيَاتِي ثَمَنًا قَلِيلًا ۚ وَمَن لَّمْ يَحْكُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ ۝٤٤
Innaaa anzalnat Tawraata feehaa hudanw wa noor; yahkumu bihan Nabiyyoonal lazeena aslamoo lillazeena haadoo war rabbaaniyyoona wal ahbaaru bimas tuhfizoo min Kitaabil laahi wa kaanoo `alaihi shuhadaaa`; falaa takhshawun naasa wakhshawni wa laa tashtaroo bi aayaatee samanan qaleelaa; wa mal lam yahkum bimaaa anzalal laahu fa ulaaa`ika humul kaafiroon
📖 हिंदी अर्थ
बेशक हम ने तौरेत नाज़िल की जिसमें (लोगों की) हिदायत और नूर (ईमान) है उसी के मुताबिक़ ख़ुदा के फ़रमाबरदार बन्दे (अम्बियाए बनी इसराईल) यहूदियों को हुक्म देते रहे और अल्लाह वाले और उलेमाए (यहूद) भी किताबे ख़ुदा से (हुक्म देते थे) जिसके वह मुहाफ़िज़ बनाए गए थे और वह उसके गवाह भी थे पस (ऐ मुसलमानों) तुम लोगों से (ज़रा भी) न डरो (बल्कि) मुझ ही से डरो और मेरी आयतों के बदले में (दुनिया की दौलत जो दर हक़ीक़त बहुत थोड़ी क़ीमत है) न लो और (समझ लो कि) जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब) के मुताबिक़ हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग काफ़िर हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْأَحْبَارُ: विद्वान (यहूदी धर्मगुरु), इसका एकवचन 'حِبْر' या 'حَبْر' है।
  • الرَّبَّانِيُّونَ: वे धर्मगुरु जो लोगों को धर्म की शिक्षा देते थे और उनका पालन-पोषण करते थे।
  • اسْتُحْفِظُوا: उन्हें अमानत में दिया गया, यानी उन्हें इसका संरक्षक बनाया गया।
  • ثَمَنًا قَلِيلًا: थोड़ा सा मूल्य, यानी सांसारिक लाभ, रिश्वत या प्रतिष्ठा।

व्याख्या:

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने ही तौरात (तोराह) को उतारा था, जिसमें लोगों के लिए मार्गदर्शन (हिदायत) और प्रकाश (नूर) था। यह किताब अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाने वाली थी और उसमें हलाल-हराम, अच्छे-बुरे का स्पष्ट विवरण था। इसी तौरात के अनुसार अल्लाह के नबी—जो अल्लाह के आगे पूरी तरह समर्पित थे—यहूदियों के बीच न्याय करते थे। ये नबी अल्लाह के हुक्म से बाहर नहीं जाते थे और न ही उसमें कोई बदलाव करते थे।

इसके बाद अल्लाह ने 'रब्बानियों' (धर्मगुरुओं) और 'अहबार' (विद्वानों) का ज़िक्र किया, जो अल्लाह की किताब की अमानत के संरक्षक थे। उन्हें यह ज़िम्मेदारी दी गई थी कि वे तौरात को बदलने और छेड़छाड़ से बचाए रखें, और वे उस पर गवाह थे कि यह अल्लाह की किताब है। उनका कर्तव्य था कि वे इसी किताब के अनुसार लोगों के बीच फैसले करें।

फिर अल्लाह तआला यहूदी विद्वानों को संबोधित करते हुए फ़रमाता है: "लोगों से मत डरो, केवल मुझसे डरो। मेरी आयतों (हुक्मों) को बेचकर थोड़ा सा सांसारिक लाभ मत कमाओ।" यानी सच्चाई छिपाकर, हुक्म बदलकर या रिश्वत लेकर दुनिया का माल मत कमाओ। जो व्यक्ति अल्लाह के उतारे हुए हुक्म के अनुसार न्याय नहीं करता, उसे हलाल समझकर या उसका इनकार करके, या उसके बजाय किसी और चीज़ को प्राथमिकता देता है, तो ऐसे लोग ही सच्चे काफ़िर हैं।


फ़ायदे और सबक:

  1. अल्लाह की किताब का सम्मान: तौरात जैसी पिछली किताबें भी अल्लाह की ओर से थीं और उनमें हिदायत थी। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की हर उतारी हुई किताब का सम्मान करना चाहिए, और क़ुरआन जो आख़िरी किताब है, उस पर सबसे ज़्यादा अमल करना चाहिए।
  2. अल्लाह का डर सबसे बड़ा: इंसान को किसी इंसान से डरकर सच्चाई नहीं छिपानी चाहिए। अल्लाह का डर ही असली डर है, और जो अल्लाह से डरता है, अल्लाह उसे दुनिया और आख़िरत में इज़्ज़त देता है।
  3. सच्चाई को बेचना बड़ा गुनाह: दुनिया के थोड़े से फ़ायदे के लिए सच्चाई छिपाना या अल्लाह के हुक्म को बदलना बहुत बड़ा पाप है। यह ईमान की कमज़ोरी की निशानी है।
  4. अल्लाह के हुक्म से न्याय: हर हाल में अल्लाह के उतारे हुए हुक्म के अनुसार फैसला करना चाहिए। चाहे वह किसी के ख़िलाफ़ जाए या किसी के पक्ष में हो। यही इंसाफ़ है और यही ईमान का तक़ाज़ा है।
  5. इल्म वालों की ज़िम्मेदारी: जिन्हें अल्लाह ने इल्म दिया है, उन पर और ज़्यादा ज़िम्मेदारी है कि वे अल्लाह की किताब को सही रूप में लोगों तक पहुँचाएँ और उसमें कोई बदलाव न करें।


📜 आयत 42-46 — अल-माइदा

42سَمَّاعُونَ لِلْكَذِبِ أَكَّالُونَ لِلسُّحْتِ ۚ فَإِن جَاءُوكَ فَاحْكُم بَيْنَهُمْ أَوْ أَعْرِضْ عَنْهُمْ ۖ وَإِن تُعْرِضْ عَنْهُمْ فَلَن يَضُرُّوكَ شَيْئًا ۖ وَإِنْ حَكَمْتَ فَاحْكُم بَيْنَهُم بِالْقِسْطِ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ
ये (कम्बख्त) झूठी बातों को बड़े शौक़ से सुनने वाले और बड़े ही हरामख़ोर हैं तो (ऐ रसूल) अगर ये लोग तुम्हारे पास (कोई मामला लेकर) आए तो तुमको इख्तेयार है ख्वाह उनके दरमियान फैसला कर दो या उनसे किनाराकशी करो और अगर तुम किनाराकश रहोगे तो (कुछ ख्याल न करो) ये लोग तुम्हारा हरगिज़ कुछ बिगाड़ नहीं सकते और अगर उनमें फैसला करो तो इन्साफ़ से फैसला करो क्योंकि ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है
43وَكَيْفَ يُحَكِّمُونَكَ وَعِندَهُمُ التَّوْرَاةُ فِيهَا حُكْمُ اللَّهِ ثُمَّ يَتَوَلَّوْنَ مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ ۚ وَمَا أُولَٰئِكَ بِالْمُؤْمِنِينَ
और जब ख़ुद उनके पास तौरेत है और उसमें ख़ुदा का हुक्म (मौजूद) है तो फिर तुम्हारे पास फैसला कराने को क्यों आते हैं और (लुत्फ़ तो ये है कि) इसके बाद फिर (तुम्हारे हुक्म से) फिर जाते हैं ओर सच तो यह है कि यह लोग ईमानदार ही नहीं हैं
44إِنَّا أَنزَلْنَا التَّوْرَاةَ فِيهَا هُدًى وَنُورٌ ۚ يَحْكُمُ بِهَا النَّبِيُّونَ الَّذِينَ أَسْلَمُوا لِلَّذِينَ هَادُوا وَالرَّبَّانِيُّونَ وَالْأَحْبَارُ بِمَا اسْتُحْفِظُوا مِن كِتَابِ اللَّهِ وَكَانُوا عَلَيْهِ شُهَدَاءَ ۚ فَلَا تَخْشَوُا النَّاسَ وَاخْشَوْنِ وَلَا تَشْتَرُوا بِآيَاتِي ثَمَنًا قَلِيلًا ۚ وَمَن لَّمْ يَحْكُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ
बेशक हम ने तौरेत नाज़िल की जिसमें (लोगों की) हिदायत और नूर (ईमान) है उसी के मुताबिक़ ख़ुदा के फ़रमाबरदार बन्दे (अम्बियाए बनी इसराईल) यहूदियों को हुक्म देते रहे और अल्लाह वाले और उलेमाए (यहूद) भी किताबे ख़ुदा से (हुक्म देते थे) जिसके वह मुहाफ़िज़ बनाए गए थे और वह उसके गवाह भी थे पस (ऐ मुसलमानों) तुम लोगों से (ज़रा भी) न डरो (बल्कि) मुझ ही से डरो और मेरी आयतों के बदले में (दुनिया की दौलत जो दर हक़ीक़त बहुत थोड़ी क़ीमत है) न लो और (समझ लो कि) जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब) के मुताबिक़ हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग काफ़िर हैं
45وَكَتَبْنَا عَلَيْهِمْ فِيهَا أَنَّ النَّفْسَ بِالنَّفْسِ وَالْعَيْنَ بِالْعَيْنِ وَالْأَنفَ بِالْأَنفِ وَالْأُذُنَ بِالْأُذُنِ وَالسِّنَّ بِالسِّنِّ وَالْجُرُوحَ قِصَاصٌ ۚ فَمَن تَصَدَّقَ بِهِ فَهُوَ كَفَّارَةٌ لَّهُ ۚ وَمَن لَّمْ يَحْكُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
और हम ने तौरेत में यहूदियों पर यह हुक्म फर्ज क़र दिया था कि जान के बदले जान और ऑख के बदले ऑख और नाक के बदले नाक और कान के बदले कान और दॉत के बदले दॉत और जख्म के बदले (वैसा ही) बराबर का बदला (जख्म) है फिर जो (मज़लूम ज़ालिम की) ख़ता माफ़ कर दे तो ये उसके गुनाहों का कफ्फ़ारा हो जाएगा और जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब) के मुवाफ़िक़ हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं
46وَقَفَّيْنَا عَلَىٰ آثَارِهِم بِعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ التَّوْرَاةِ ۖ وَآتَيْنَاهُ الْإِنجِيلَ فِيهِ هُدًى وَنُورٌ وَمُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ التَّوْرَاةِ وَهُدًى وَمَوْعِظَةً لِّلْمُتَّقِينَ
और हम ने उन्हीं पैग़म्बरों के क़दम ब क़दम मरियम के बेटे ईसा को चलाया और वह इस किताब तौरैत की भी तस्दीक़ करते थे जो उनके सामने (पहले से) मौजूद थी और हमने उनको इन्जील (भी) अता की जिसमें (लोगों के लिए हर तरह की) हिदायत थी और नूर (ईमान) और वह इस किताब तौरेत की जो वक्ते नुज़ूले इन्जील (पहले से) मौजूद थी तसदीक़ करने वाली और परहेज़गारों की हिदायत व नसीहत थी
अल-माइदाकुरान सूची
120आयत
मदनीRevelation
44आयत

अनुवाद — अल-माइदा 44

सूरा अल-माइदा आयत 44 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : बेशक हम ने तौरेत नाज़िल की जिसमें (लोगों की) हिदायत…

सूरा आयत 44/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 42–46. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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