Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- الْأَحْبَارُ: विद्वान (यहूदी धर्मगुरु), इसका एकवचन 'حِبْر' या 'حَبْر' है।
- الرَّبَّانِيُّونَ: वे धर्मगुरु जो लोगों को धर्म की शिक्षा देते थे और उनका पालन-पोषण करते थे।
- اسْتُحْفِظُوا: उन्हें अमानत में दिया गया, यानी उन्हें इसका संरक्षक बनाया गया।
- ثَمَنًا قَلِيلًا: थोड़ा सा मूल्य, यानी सांसारिक लाभ, रिश्वत या प्रतिष्ठा।
व्याख्या:
अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने ही तौरात (तोराह) को उतारा था, जिसमें लोगों के लिए मार्गदर्शन (हिदायत) और प्रकाश (नूर) था। यह किताब अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाने वाली थी और उसमें हलाल-हराम, अच्छे-बुरे का स्पष्ट विवरण था। इसी तौरात के अनुसार अल्लाह के नबी—जो अल्लाह के आगे पूरी तरह समर्पित थे—यहूदियों के बीच न्याय करते थे। ये नबी अल्लाह के हुक्म से बाहर नहीं जाते थे और न ही उसमें कोई बदलाव करते थे।
इसके बाद अल्लाह ने 'रब्बानियों' (धर्मगुरुओं) और 'अहबार' (विद्वानों) का ज़िक्र किया, जो अल्लाह की किताब की अमानत के संरक्षक थे। उन्हें यह ज़िम्मेदारी दी गई थी कि वे तौरात को बदलने और छेड़छाड़ से बचाए रखें, और वे उस पर गवाह थे कि यह अल्लाह की किताब है। उनका कर्तव्य था कि वे इसी किताब के अनुसार लोगों के बीच फैसले करें।
फिर अल्लाह तआला यहूदी विद्वानों को संबोधित करते हुए फ़रमाता है: "लोगों से मत डरो, केवल मुझसे डरो। मेरी आयतों (हुक्मों) को बेचकर थोड़ा सा सांसारिक लाभ मत कमाओ।" यानी सच्चाई छिपाकर, हुक्म बदलकर या रिश्वत लेकर दुनिया का माल मत कमाओ। जो व्यक्ति अल्लाह के उतारे हुए हुक्म के अनुसार न्याय नहीं करता, उसे हलाल समझकर या उसका इनकार करके, या उसके बजाय किसी और चीज़ को प्राथमिकता देता है, तो ऐसे लोग ही सच्चे काफ़िर हैं।
फ़ायदे और सबक:
- अल्लाह की किताब का सम्मान: तौरात जैसी पिछली किताबें भी अल्लाह की ओर से थीं और उनमें हिदायत थी। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की हर उतारी हुई किताब का सम्मान करना चाहिए, और क़ुरआन जो आख़िरी किताब है, उस पर सबसे ज़्यादा अमल करना चाहिए।
- अल्लाह का डर सबसे बड़ा: इंसान को किसी इंसान से डरकर सच्चाई नहीं छिपानी चाहिए। अल्लाह का डर ही असली डर है, और जो अल्लाह से डरता है, अल्लाह उसे दुनिया और आख़िरत में इज़्ज़त देता है।
- सच्चाई को बेचना बड़ा गुनाह: दुनिया के थोड़े से फ़ायदे के लिए सच्चाई छिपाना या अल्लाह के हुक्म को बदलना बहुत बड़ा पाप है। यह ईमान की कमज़ोरी की निशानी है।
- अल्लाह के हुक्म से न्याय: हर हाल में अल्लाह के उतारे हुए हुक्म के अनुसार फैसला करना चाहिए। चाहे वह किसी के ख़िलाफ़ जाए या किसी के पक्ष में हो। यही इंसाफ़ है और यही ईमान का तक़ाज़ा है।
- इल्म वालों की ज़िम्मेदारी: जिन्हें अल्लाह ने इल्म दिया है, उन पर और ज़्यादा ज़िम्मेदारी है कि वे अल्लाह की किताब को सही रूप में लोगों तक पहुँचाएँ और उसमें कोई बदलाव न करें।
📜 आयत 42-46 — सूरा अल-माइदा
अनुवाद — अल-माइदा 44
सूरा अल-माइदा आयत 44 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : बेशक हम ने तौरेत नाज़िल की जिसमें (लोगों की) हिदायत…सूरा आयत 44/120 — सूरा अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-माइदा सुनें, सूरा अल-माइदा अनुवाद, सूरा अल-माइदा mp3, सूरा अल-माइदा pdf. आयत 42–46. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अल-माइदा
पवित्र क़ुरआन
Thursday, October 1, 2026
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