अल-माइदा · 43/120
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-माइदा
وَكَيْفَ يُحَكِّمُونَكَ وَعِندَهُمُ التَّوْرَاةُ فِيهَا حُكْمُ اللَّهِ ثُمَّ يَتَوَلَّوْنَ مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ ۚ وَمَا أُولَٰئِكَ بِالْمُؤْمِنِينَ ۝٤٣
Wa kaifa yuhakkimoonaka wa `indahumut Tawraatu feehaa hukmul laahi summa yatawallawna mim ba`di zaalik; wa maaa ulaaa`ika bilmu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
और जब ख़ुद उनके पास तौरेत है और उसमें ख़ुदा का हुक्म (मौजूद) है तो फिर तुम्हारे पास फैसला कराने को क्यों आते हैं और (लुत्फ़ तो ये है कि) इसके बाद फिर (तुम्हारे हुक्म से) फिर जाते हैं ओर सच तो यह है कि यह लोग ईमानदार ही नहीं हैं

🎧 सुनें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُحَكِّمُونَكَ: वे आपको निर्णायक/मध्यस्थ बनाते हैं।
  • يَتَوَلَّوْنَ: वे मुँह मोड़ लेते हैं, पीछे हट जाते हैं।
  • بِالْمُؤْمِنِينَ: सच्चे ईमानवाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन यहूदियों की अजीब और विरोधाभासी स्थिति पर अचरज व्यक्त करती है जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास अपने झगड़ों का फ़ैसला कराने आते थे, जबकि वे न आप पर ईमान रखते थे, न आपकी लाई हुई किताब (क़ुरआन) पर। उनके पास अपनी किताब 'तौरात' मौजूद थी, जिसमें अल्लाह का स्पष्ट हुक्म (जैसे व्यभिचार के लिए रज्म/पत्थर मारने की सज़ा) मौजूद था। लेकिन जब आप उन्हीं के शास्त्र के अनुसार सच्चा और न्यायपूर्ण फ़ैसला सुना देते, तो वे उसे स्वीकार करने के बजाय मुँह मोड़ लेते, क्योंकि उनका उद्देश्य न्याय पाना नहीं, बल्कि अपनी मनमानी और स्वार्थ को पूरा करना था। इस प्रकार उन्होंने दोहरा अपराध किया: एक तो उन्होंने अपनी ही किताब (तौरात) के हुक्म को नकारा, और दूसरे आपके न्यायपूर्ण फ़ैसले को ठुकरा दिया। ऐसे लोग कदापि सच्चे ईमानवाले नहीं हो सकते, क्योंकि सच्चा ईमान अल्लाह के हुक्म के आगे सिर झुकाने का नाम है, न कि अपनी इच्छाओं को हुक्म बनाने का।

फ़ायदे (सीख):

  1. सच्चा ईमान सिर्फ़ ज़ुबानी दावा नहीं, बल्कि अल्लाह के हुक्म को बिना किसी शर्त के स्वीकार करना है। जो व्यक्ति अल्लाह के फ़ैसले को अपनी इच्छा के अनुसार मोड़ने की कोशिश करता है, उसका ईमान अधूरा और कमज़ोर है।
  2. किताब (आसमानी ग्रंथ) का होना और उस पर विश्वास का दावा करना पर्याप्त नहीं है; जब तक उसके हुक्मों पर अमल न किया जाए, वह ईमान बेकार है।
  3. न्याय और सच्चाई को हर हाल में स्वीकार करना चाहिए, चाहे वह हमारी पसंद के ख़िलाफ़ ही क्यों न हो। अपनी मनमानी को सच्चाई पर तरजीह देना मुनाफ़िक़ों (दोगलों) की निशानी है।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि किसी भी विवाद में अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का फ़ैसला ही अंतिम और सच्चा होता है, और उसे खुशी-खुशी क़बूल करना ही सच्चे मोमिन की पहचान है।


📜 आयत 41-45 — सूरा अल-माइदा

41۞ يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ لَا يَحْزُنكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ مِنَ الَّذِينَ قَالُوا آمَنَّا بِأَفْوَاهِهِمْ وَلَمْ تُؤْمِن قُلُوبُهُمْ ۛ وَمِنَ الَّذِينَ هَادُوا ۛ سَمَّاعُونَ لِلْكَذِبِ سَمَّاعُونَ لِقَوْمٍ آخَرِينَ لَمْ يَأْتُوكَ ۖ يُحَرِّفُونَ الْكَلِمَ مِن بَعْدِ مَوَاضِعِهِ ۖ يَقُولُونَ إِنْ أُوتِيتُمْ هَٰذَا فَخُذُوهُ وَإِن لَّمْ تُؤْتَوْهُ فَاحْذَرُوا ۚ وَمَن يُرِدِ اللَّهُ فِتْنَتَهُ فَلَن تَمْلِكَ لَهُ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا ۚ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ لَمْ يُرِدِ اللَّهُ أَن يُطَهِّرَ قُلُوبَهُمْ ۚ لَهُمْ فِي الدُّنْيَا خِزْيٌ ۖ وَلَهُمْ فِي الْآخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌ
ऐ रसूल जो लोग कुफ़्र की तरफ़ लपक के चले जाते हैं तुम उनका ग़म न खाओ उनमें बाज़ तो ऐसे हैं कि अपने मुंह से बे तकल्लुफ़ कह देते हैं कि हम ईमान लाए हालॉकि उनके दिल बेईमान हैं और बाज़ यहूदी ऐसे हैं कि (जासूसी की ग़रज़ से) झूठी बातें बहुत (शौक से) सुनते हैं ताकि कुफ्फ़ार के दूसरे गिरोह को जो (अभी तक) तुम्हारे पास नहीं आए हैं सुनाएं ये लोग (तौरैत के) अल्फ़ाज़ की उनके असली मायने (मालूम होने) के बाद भी तहरीफ़ करते हैं (और लोगों से) कहते हैं कि (ये तौरैत का हुक्म है) अगर मोहम्मद की तरफ़ से (भी) तुम्हें यही हुक्म दिया जाय तो उसे मान लेना और अगर यह हुक्म तुमको न दिया जाए तो उससे अलग ही रहना और (ऐ रसूल) जिसको ख़ुदा ख़राब करना चाहता है तो उसके वास्ते ख़ुदा से तुम्हारा कुछ ज़ोर नहीं चल सकता यह लोग तो वही हैं जिनके दिलों को ख़ुदा ने (गुनाहों से) पाक करने का इरादा ही नहीं किया (बल्कि) उनके लिए तो दुनिया में भी रूसवाई है और आख़ेरत में भी (उनके लिए) बड़ा (भारी) अज़ाब होगा
42سَمَّاعُونَ لِلْكَذِبِ أَكَّالُونَ لِلسُّحْتِ ۚ فَإِن جَاءُوكَ فَاحْكُم بَيْنَهُمْ أَوْ أَعْرِضْ عَنْهُمْ ۖ وَإِن تُعْرِضْ عَنْهُمْ فَلَن يَضُرُّوكَ شَيْئًا ۖ وَإِنْ حَكَمْتَ فَاحْكُم بَيْنَهُم بِالْقِسْطِ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ
ये (कम्बख्त) झूठी बातों को बड़े शौक़ से सुनने वाले और बड़े ही हरामख़ोर हैं तो (ऐ रसूल) अगर ये लोग तुम्हारे पास (कोई मामला लेकर) आए तो तुमको इख्तेयार है ख्वाह उनके दरमियान फैसला कर दो या उनसे किनाराकशी करो और अगर तुम किनाराकश रहोगे तो (कुछ ख्याल न करो) ये लोग तुम्हारा हरगिज़ कुछ बिगाड़ नहीं सकते और अगर उनमें फैसला करो तो इन्साफ़ से फैसला करो क्योंकि ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है
43وَكَيْفَ يُحَكِّمُونَكَ وَعِندَهُمُ التَّوْرَاةُ فِيهَا حُكْمُ اللَّهِ ثُمَّ يَتَوَلَّوْنَ مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ ۚ وَمَا أُولَٰئِكَ بِالْمُؤْمِنِينَ
और जब ख़ुद उनके पास तौरेत है और उसमें ख़ुदा का हुक्म (मौजूद) है तो फिर तुम्हारे पास फैसला कराने को क्यों आते हैं और (लुत्फ़ तो ये है कि) इसके बाद फिर (तुम्हारे हुक्म से) फिर जाते हैं ओर सच तो यह है कि यह लोग ईमानदार ही नहीं हैं
44إِنَّا أَنزَلْنَا التَّوْرَاةَ فِيهَا هُدًى وَنُورٌ ۚ يَحْكُمُ بِهَا النَّبِيُّونَ الَّذِينَ أَسْلَمُوا لِلَّذِينَ هَادُوا وَالرَّبَّانِيُّونَ وَالْأَحْبَارُ بِمَا اسْتُحْفِظُوا مِن كِتَابِ اللَّهِ وَكَانُوا عَلَيْهِ شُهَدَاءَ ۚ فَلَا تَخْشَوُا النَّاسَ وَاخْشَوْنِ وَلَا تَشْتَرُوا بِآيَاتِي ثَمَنًا قَلِيلًا ۚ وَمَن لَّمْ يَحْكُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ
बेशक हम ने तौरेत नाज़िल की जिसमें (लोगों की) हिदायत और नूर (ईमान) है उसी के मुताबिक़ ख़ुदा के फ़रमाबरदार बन्दे (अम्बियाए बनी इसराईल) यहूदियों को हुक्म देते रहे और अल्लाह वाले और उलेमाए (यहूद) भी किताबे ख़ुदा से (हुक्म देते थे) जिसके वह मुहाफ़िज़ बनाए गए थे और वह उसके गवाह भी थे पस (ऐ मुसलमानों) तुम लोगों से (ज़रा भी) न डरो (बल्कि) मुझ ही से डरो और मेरी आयतों के बदले में (दुनिया की दौलत जो दर हक़ीक़त बहुत थोड़ी क़ीमत है) न लो और (समझ लो कि) जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब) के मुताबिक़ हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग काफ़िर हैं
45وَكَتَبْنَا عَلَيْهِمْ فِيهَا أَنَّ النَّفْسَ بِالنَّفْسِ وَالْعَيْنَ بِالْعَيْنِ وَالْأَنفَ بِالْأَنفِ وَالْأُذُنَ بِالْأُذُنِ وَالسِّنَّ بِالسِّنِّ وَالْجُرُوحَ قِصَاصٌ ۚ فَمَن تَصَدَّقَ بِهِ فَهُوَ كَفَّارَةٌ لَّهُ ۚ وَمَن لَّمْ يَحْكُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
और हम ने तौरेत में यहूदियों पर यह हुक्म फर्ज क़र दिया था कि जान के बदले जान और ऑख के बदले ऑख और नाक के बदले नाक और कान के बदले कान और दॉत के बदले दॉत और जख्म के बदले (वैसा ही) बराबर का बदला (जख्म) है फिर जो (मज़लूम ज़ालिम की) ख़ता माफ़ कर दे तो ये उसके गुनाहों का कफ्फ़ारा हो जाएगा और जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब) के मुवाफ़िक़ हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं
अल-माइदाकुरान सूची
120आयत
मदनीRevelation
43आयत

अनुवाद — अल-माइदा 43

सूरा अल-माइदा आयत 43 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और जब ख़ुद उनके पास तौरेत है और उसमें ख़ुदा…

सूरा आयत 43/120 — सूरा अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-माइदा सुनें, सूरा अल-माइदा अनुवाद, सूरा अल-माइदा mp3, सूरा अल-माइदा pdf. आयत 41–45. हिंदी अर्थ: اردو.




पवित्र क़ुरआन


Tuesday, September 8, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए