अर-रहमान · 34/78
अनुवाद उच्चारण — अर-रहमान
فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ۝٣٤
Fabi ayyi aalaaa`i Rabbikumaa tukazzibaan
📖 हिंदी अर्थ
तो तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • आलाअ (آلاء): अल्लाह की अनगिनत नेमतें और उपकार।
  • तुकज़्ज़िबान: तुम दोनों (जिन्न और इंसान) झुठलाते हो।

तफ़सीर:

ऐ जिन्न और इंसान की जमात! अल्लाह तआला ने तुम पर जो अनगिनत नेमतें नाज़िल की हैं—ज़िंदगी, सेहत, रिज़्क़, हिदायत, माफ़ी, और दुनिया-आख़िरत की हर भलाई—उनमें से कौन सी नेमत को तुम झुठलाओगे? क्या तुम्हारे पास कोई ऐसी नेमत है जो अल्लाह की बख़्शिश न हो? क्या तुम्हारी साँसें, तुम्हारा दिल, तुम्हारी आँखें, तुम्हारे कान—ये सब उसी की देन नहीं? फिर इतने एहसानों के बावजूद तुम उसे न पहचानो, यह कैसी नाशुक्री है?

यह आयत एक प्यार भरा सवाल है जो रहमान की तरफ से उठाया गया है—जैसे कोई पिता अपने बच्चे से पूछे कि "मैंने तुझे इतना कुछ दिया, फिर भी तू मुझसे मुँह मोड़ता है?" यह सवाल दिल को झिंझोड़ने वाला है, ताकि इंसान और जिन्न अपनी ग़फ़लत से जागें और अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करें।

अल्लाह की नेमतें इतनी ज़्यादा हैं कि उन्हें गिनना मुमकिन नहीं। हर सुबह उठना, हर साँस लेना, हर लुक़्मा खाना—सब उसी का करम है। फिर भी कुछ लोग उसके वजूद को झुठलाते हैं, उसकी आयतों को झुठलाते हैं, और उसके रसूलों को झुठलाते हैं। यह आयत उन्हें चेतावनी देती है कि इन नेमतों का हिसाब ज़रूर होगा।

लेकिन साथ ही यह आयत मोमिनों के लिए खुशखबरी भी है—कि अल्लाह की रहमत और नेमतें उन पर बरस रही हैं, और वे जितना शुक्र करें, उतना कम है। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करे, उसकी नेमतों को पहचाने, और उन नेमतों का सही इस्तेमाल करके उसकी रज़ा हासिल करे। याद रखो, जो शुक्रगुज़ार बंदा होता है, अल्लाह उसे और नेमतें देता है, और जो नाशुक्री करता है, उससे नेमतें छीन ली जाती हैं।

तो आओ, हम सब अपने रब की नेमतों को दिल से पहचानें, ज़ुबान से उसका शुक्र करें, और अपने आमाल से उसे राज़ी करें। यही कामयाबी की राह है।



📜 आयत 32-36 — अर-रहमान

32فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने पालने वाले की किस किस नेअमत को न मानोगे
33يَا مَعْشَرَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ إِنِ اسْتَطَعْتُمْ أَن تَنفُذُوا مِنْ أَقْطَارِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ فَانفُذُوا ۚ لَا تَنفُذُونَ إِلَّا بِسُلْطَانٍ
ऐ गिरोह जिन व इन्स अगर तुममें क़ुदरत है कि आसमानों और ज़मीन के किनारों से (होकर कहीं) निकल (कर मौत या अज़ाब से भाग) सको तो निकल जाओ (मगर) तुम तो बग़ैर क़ूवत और ग़लबे के निकल ही नहीं सकते (हालॉ कि तुममें न क़ूवत है और न ही ग़लबा)
34فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे
35يُرْسَلُ عَلَيْكُمَا شُوَاظٌ مِّن نَّارٍ وَنُحَاسٌ فَلَا تَنتَصِرَانِ
(गुनाहगार जिनों और आदमियों जहन्नुम में) तुम दोनो पर आग का सब्ज़ शोला और सियाह धुऑं छोड़ दिया जाएगा तो तुम दोनों (किस तरह) रोक नहीं सकोगे
36فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
फिर तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
अर-रहमानकुरान सूची
78आयत
मदनीRevelation
34आयत

अनुवाद — अर-रहमान 34

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Tuesday, August 18, 2026

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