अर-रहमान · 54/78
अनुवाद उच्चारण — सूरा अर-रहमान
مُتَّكِئِينَ عَلَىٰ فُرُشٍ بَطَائِنُهَا مِنْ إِسْتَبْرَقٍ ۚ وَجَنَى الْجَنَّتَيْنِ دَانٍ ۝٥٤
Muttaki`eena `alaa furushim bataaa`inuhaa min istabraq; wajanal jannataini daan
📖 हिंदी अर्थ
यह लोग उन फ़र्शों पर जिनके असतर अतलस के होंगे तकिये लगाकर बैठे होंगे तो दोनों बाग़ों के मेवे (इस क़दर) क़रीब होंगे (कि अगर चाहे तो लगे हुए खालें)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مُتَّكِئِينَ: तकिया लगाकर आराम से बैठे हुए।
  • فُرُشٍ: बिछौने, फ़र्श (बिस्तर)।
  • بَطَائِنُهَا: उनकी परत (अस्तर) — यहाँ अंदरूनी तरफ़ की परत।
  • إِسْتَبْرَقٌ: मोटा रेशमी कपड़ा (दीबाज) जो बहुत उच्च कोटि का होता है।
  • جَنَى الْجَنَّتَيْنِ: दोनों जन्नतों के फल (जो तोड़े जाते हैं)।
  • دَانٍ: बहुत करीब (पास)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने उन मुत्तक़ियों (परहेज़गारों) का हाल बयान किया है जो उसके सामने खड़े होने से डरते थे और उसकी रज़ा के लिए दुनिया में अच्छे काम करते थे। उनके लिए दो जन्नतें हैं, जिनमें वे हर तरह की नेअमतों से लबरेज़ होंगे। वे वहाँ तकिया लगाकर ऐसे बिछौनों पर आराम करेंगे जिनके अंदरूनी हिस्से (अस्तर) मोटे और उम्दा रेशम (इस्तबरक़) के होंगे — और यह उनके ऊपरी हिस्से की तो बात ही क्या, जो और भी ज़्यादा नाज़ुक और ख़ूबसूरत होगा। यह उस आराम और ऐश की तस्वीर है जिसकी कोई मिसाल दुनिया में नहीं।

और दोनों जन्नतों के फल उनके बेहद करीब होंगे — इतने करीब कि चाहे वे बैठे हों, लेटे हों या खड़े हों, बिना किसी मेहनत या दूरी के उन तक पहुँच सकेंगे। यह अल्लाह की उस महान दया का प्रतीक है कि जन्नत में न तो कोई तकलीफ़ होगी, न कोई मेहनत, न ही कोई रुकावट — बस जो चाहें, फौरन मिल जाएगा।

यहाँ अल्लाह तआला हमें उस इनाम की झलक दिखा रहे हैं जो उन लोगों के लिए है जो उससे डरते हैं, उसकी इबादत करते हैं और उसके हुक्मों पर चलते हैं। यह एक ऐसी ख़ुशख़बरी है जो हर मोमिन के दिल को सुकून देती है और उसे अच्छे कामों की तरफ़ राग़िब करती है। जो शख्स दुनिया में अल्लाह की राह पर चलता है, उसके लिए आख़िरत में ऐसी जगह है जहाँ हर दर्द और हर ग़म का कोई निशान नहीं, सिर्फ़ खुशी, सुकून और अल्लाह की रहमतें हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की चंद रोज़ की ख़्वाहिशों के पीछे भागने के बजाय, हमें उस हमेशा रहने वाली ज़िंदगी के लिए काम करना चाहिए। जन्नत की नेअमतें उन्हीं को मिलेंगी जो अल्लाह के सामने पेशी से डरें और अपनी ज़िंदगी को उसकी रज़ा के मुताबिक़ बनाएँ। यही सच्ची कामयाबी है — और यही वह चीज़ है जो हमें दुनिया और आख़िरत दोनों में सुकून देती है।



📜 आयत 52-56 — सूरा अर-रहमान

52فِيهِمَا مِن كُلِّ فَاكِهَةٍ زَوْجَانِ
इन दोनों बाग़ों में सब मेवे दो दो किस्म के होंगे
53فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
54مُتَّكِئِينَ عَلَىٰ فُرُشٍ بَطَائِنُهَا مِنْ إِسْتَبْرَقٍ ۚ وَجَنَى الْجَنَّتَيْنِ دَانٍ
यह लोग उन फ़र्शों पर जिनके असतर अतलस के होंगे तकिये लगाकर बैठे होंगे तो दोनों बाग़ों के मेवे (इस क़दर) क़रीब होंगे (कि अगर चाहे तो लगे हुए खालें)
55فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को न मानोगे
56فِيهِنَّ قَاصِرَاتُ الطَّرْفِ لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌ قَبْلَهُمْ وَلَا جَانٌّ
इसमें (पाक दामन ग़ैर की तरफ ऑंख उठा कर न देखने वाली औरतें होंगी जिनको उन से पहले न किसी इन्सान ने हाथ लगाया होगा) और जिन ने
अर-रहमानकुरान सूची
78आयत
मदनीअवतरण स्थान
54आयत

अनुवाद — अर-रहमान 54

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Friday, October 2, 2026

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