अर-रहमान · 55/78
अनुवाद उच्चारण — अर-रहमान
فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ۝٥٥
Fabi ayyi aalaaa`i Rabbikumaa tukazzibaan
📖 हिंदी अर्थ
तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को न मानोगे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آلاء: अल्लाह की अनगिनत नेमतें और एहसान।
  • تُكَذِّبَان: तुम दोनों झुठलाते हो (यहाँ जिन्न और इंसान दोनों को सम्बोधित किया गया है)।

तफ़सीर:

ऐ जिन्न और इंसान की जमात! अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने तुम पर जो अनगिनत नेमतें नाज़िल की हैं—ज़िंदगी दी, स्वास्थ्य दिया, रिज़्क़ दिया, हिदायत दी, और तुम्हें दुनिया और आख़िरत की भलाइयाँ अता कीं—तो इनमें से कौन सी नेमत को तुम झुठलाओगे? क्या तुम्हारे पास कोई ऐसी नेमत है जो अल्लाह की तरफ से न हो? क्या तुम्हारी साँसें, तुम्हारा दिल, तुम्हारी आँखें, तुम्हारे कान—ये सब उसी की देन नहीं? फिर भला किस मुँह से तुम उसके एहसानों का इनकार करोगे?

यह आयत अपने अन्दर एक गहरा सबक़ रखती है। अल्लाह तआला बार-बार अपनी नेमतें गिनाता है और हर नेमत के बाद यही सवाल दोहराता है—"तो तुम कौन सी नेमत को झुठलाओगे?" यह एक प्यार भरा एहसान जताना है, ताकि इंसान और जिन्न दोनों अपने रब की मेहरबानियों को पहचानें और शुक्रगुज़ार बनें।

अगर हम अपने चारों ओर देखें, तो हर तरफ अल्लाह की रहमतें बिखरी पड़ी हैं। सूरज जो रोशनी देता है, बारिश जो ज़मीन को सींचती है, फल जो पेड़ों से लटकते हैं, और वो इल्म जो हमें सही रास्ता दिखाता है—ये सब उसी की देन हैं। तो क्या हमें चुप रहकर उसका शुक्र अदा नहीं करना चाहिए? क्या हमें अपनी ज़बान से "अल्हम्दुलिल्लाह" नहीं कहना चाहिए?

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नेमतों का इनकार करना सबसे बड़ी नाइंशुक्री है। और शुक्र करना नेमतों को बढ़ाने का ज़रिया है, जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया: "अगर तुम शुक्र करोगे तो मैं तुम्हें और ज़्यादा दूँगा।"

तो ऐ अल्लाह के बन्दों! आओ हम सब मिलकर अपने रब की नेमतों को पहचानें, उनका ज़िक्र करें, और अपनी ज़िंदगी को उसकी इताअत में गुज़ारें। यही हमारी कामयाबी है, यही हमारी नजात है। और जब हम अपने रब के एहसानों को गिनेंगे, तो हमारा दिल उसकी मुहब्बत से भर जाएगा और हमारी ज़बान से निकलेगा—"सुब्हानल्लाह! वल्हम्दुलिल्लाह! वला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर!"

🎧 सुनें

📜 आयत 53-57 — अर-रहमान

53فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
54مُتَّكِئِينَ عَلَىٰ فُرُشٍ بَطَائِنُهَا مِنْ إِسْتَبْرَقٍ ۚ وَجَنَى الْجَنَّتَيْنِ دَانٍ
यह लोग उन फ़र्शों पर जिनके असतर अतलस के होंगे तकिये लगाकर बैठे होंगे तो दोनों बाग़ों के मेवे (इस क़दर) क़रीब होंगे (कि अगर चाहे तो लगे हुए खालें)
55فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को न मानोगे
56فِيهِنَّ قَاصِرَاتُ الطَّرْفِ لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌ قَبْلَهُمْ وَلَا جَانٌّ
इसमें (पाक दामन ग़ैर की तरफ ऑंख उठा कर न देखने वाली औरतें होंगी जिनको उन से पहले न किसी इन्सान ने हाथ लगाया होगा) और जिन ने
57فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे
अर-रहमानकुरान सूची
78आयत
मदनीRevelation
55आयत

अनुवाद — अर-रहमान 55

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Tuesday, August 18, 2026

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