अर-रहमान · 53/78
अनुवाद उच्चारण — सूरा अर-रहमान
فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ۝٥٣
Fabi ayyi aalaaa`i Rabbikumaa tukazzibaan
📖 हिंदी अर्थ
तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • آلاء: नेमतें, उपकार, अनगिनत अहसान।
  • تُكَذِّبَان: तुम दोनों झुठलाते हो, इनकार करते हो।

व्याख्या:

अर्थात, हे जिन्न और इंसान! तुम दोनों पर तुम्हारे रब की जो-जो नेमतें और उपकार हैं, उनमें से कौन-सी नेमत को तुम झुठला सकते हो? यह प्रश्न इसलिए है कि अल्लाह तआला ने अपनी रहमत और करम से तुम्हें अनगिनत नेमतें अता की हैं—आसमान, ज़मीन, सूरज, चाँद, पानी, हवा, खाना, पीना, सेहत, अम्न, और सबसे बड़ी नेमत यह कि उसने तुम्हें ईमान और हिदायत का रास्ता दिखाया। इन सबके बावजूद यदि तुम उसे झुठलाओगे या उसके एहसानों से मुँह मोड़ोगे, तो यह तुम्हारी बड़ी नाइंसाफी और नाशुक्री होगी। यह आयत एक सवाल के रूप में है, लेकिन इसका मक़सद लोगों को जगाना है कि वे अपने रब की नेमतों को पहचानें, उसका शुक्र अदा करें और उसकी आयतों को झुठलाने से बचें। यह प्रश्न दिल को झिंझोड़ देने वाला है कि इतने अहसानों के बाद भी क्या कोई उसे झुठला सकता है? यह अल्लाह की महान दया है कि वह हमें बार-बार याद दिलाता है ताकि हम सीधे रास्ते पर चलें और उसकी मोहब्बत और इबादत में जुट जाएँ। यह आयत हमें सिखाती है कि हर पल हमें अपने रब का शुक्रगुज़ार होना चाहिए और उसकी नेमतों को गिनना चाहिए, क्योंकि अगर हम शुक्र करेंगे तो अल्लाह हमें और नेमतें देगा, और अगर हम नाशुक्री करेंगे तो यह हमारे लिए बड़ा नुक़सान है। यही वह प्यारा अंदाज़ है जिससे अल्लाह अपने बंदों को अपनी तरफ खींचता है और उन्हें जन्नत की राह दिखाता है।



📜 आयत 51-55 — सूरा अर-रहमान

51فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से मुकरोगे
52فِيهِمَا مِن كُلِّ فَاكِهَةٍ زَوْجَانِ
इन दोनों बाग़ों में सब मेवे दो दो किस्म के होंगे
53فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
54مُتَّكِئِينَ عَلَىٰ فُرُشٍ بَطَائِنُهَا مِنْ إِسْتَبْرَقٍ ۚ وَجَنَى الْجَنَّتَيْنِ دَانٍ
यह लोग उन फ़र्शों पर जिनके असतर अतलस के होंगे तकिये लगाकर बैठे होंगे तो दोनों बाग़ों के मेवे (इस क़दर) क़रीब होंगे (कि अगर चाहे तो लगे हुए खालें)
55فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को न मानोगे
अर-रहमानकुरान सूची
78आयत
मदनीअवतरण स्थान
53आयत

अनुवाद — अर-रहमान 53

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Thursday, October 1, 2026

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